दुनिया के वित्तीय बाजार एक बार फिर बेचैनी के दौर में हैं। सतह पर सब सामान्य दिख सकता है, लेकिन भीतर कई परतों में दबाव बन रहा है। टैरिफ की राजनीति, प्राइवेट क्रेडिट में दरारें, एआई से बदलती अर्थव्यवस्था और अमेरिका में बढ़ता कर्ज बोझ, ये सभी संकेत एक साथ उभर रहे हैं। वैश्विक ब्रोकरेज फर्म जेफरीज की ताजा रिपोर्ट इसी बदलती तस्वीर को सामने रखती है।
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद टैरिफ का मुद्दा फिर से सुर्खियों में है। इसके तुरंत बाद राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने 150 दिनों के लिए 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ लगाने का फैसला किया। इससे साफ है कि व्यापार नीति एक बार फिर राजनीतिक हथियार बन रही है।
लेकिन यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है। सर्वे बताते हैं कि बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक टैरिफ नीति से असहमत हैं और मानते हैं कि इससे रोजमर्रा के खर्च बढ़े हैं। यानी जो नीति घरेलू उद्योग की रक्षा के नाम पर लाई गई, वही अब महंगाई और असंतोष का कारण बन रही है।
रिपोर्ट का दूसरा अहम बिंदु प्राइवेट क्रेडिट बाजार से जुड़ा है। अमेरिकी लेंडर ब्लू आउल ने अपने एक रिटेल फंड में निवेशकों के पैसे निकालने पर स्थायी रोक लगा दी है। अब भुगतान तभी होगा जब कर्ज वसूली या संपत्ति बिक्री से नकदी आएगी।
यह कदम बाजार को 2007 के सबप्राइम संकट की याद दिलाता है, जब कुछ फंडों ने लेनदेन रोक दिया था। चिंता यह है कि अगर फंड दबाव में अच्छे लोन बेच दें और कमजोर लोन बचा लें, तो जोखिम और बढ़ सकता है। इस खबर के बाद कंपनी के शेयरों में तेज गिरावट देखी गई, हालांकि बाद में कुछ ठहराव भी आया।
जेफरीज की रिपोर्ट कहती है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिर्फ अवसर नहीं, बल्कि जोखिम भी लेकर आ रहा है। खासकर सॉफ्टवेयर कंपनियों के ऊंचे वैल्यूएशन और प्राइवेट इक्विटी के महंगे सौदे आगे चलकर दबाव बना सकते हैं।
भारत के लिए तस्वीर अलग है। दिल्ली में हुए एआई सम्मेलन में दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों की मौजूदगी ने संकेत दिया कि भारत एआई को लेकर आक्रामक रुख अपना रहा है। सरकार ने डेटा सेंटर और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए लॉन्गटर्म टैक्स इंसेंटिव की घोषणा की है। सैकड़ों स्टार्टअप एआई आधारित समाधान विकसित कर रहे हैं। यहां तक कि सरकार की ओर से सस्ती दरों पर जीपीयू उपलब्ध कराने की पहल भी की गई है।
हालांकि रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि एआई का असर आईटी सर्विस सेक्टर पर पड़ेगा और रोजगार स्ट्रक्चर में बदलाव आ सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कामकाज के नियमों को आसान बनाने की कोशिश हो रही है। श्रम कानूनों में बदलाव किए गए हैं, जिससे कंपनियों को कर्मचारियों की भर्ती और कॉन्ट्रैक्ट पर रखने में पहले से ज्यादा सुविधा मिली है। यानी अब कंपनियों को नियुक्ति और नौकरी की शर्तों में थोड़ा ज्यादा लचीलापन मिला है। साथ ही, सरकार लाइसेंस और अनुमति से जुड़े जटिल नियमों को कम करने की दिशा में भी कदम उठा रही है, ताकि कारोबार करना आसान हो सके। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने पर काम हो रहा है। दुनिया में बढ़ते टैरिफ और व्यापार तनाव के बीच ऐसे समझौते को और अहम माना जा रहा है।
भारतीय बाजार ने हाल के महीनों में उभरते बाजारों की तुलना में कमजोर प्रदर्शन किया है। दिलचस्प बात यह है कि सोने के एक्सचेंज ट्रेडेड फंड में मजबूत निवेश देखा गया है। निवेशक अनिश्चित माहौल में सुरक्षित विकल्प तलाशते दिख रहे हैं।
जर्मनी में फैक्ट्री ऑर्डर में सुधार के संकेत मिले हैं, जिससे उम्मीद जगी है कि प्रोत्साहन नीतियों का असर दिख सकता है। फिर भी औद्योगिक उत्पादन अभी दबाव में है और व्यापक सुधार एजेंडा पर अमल की राह आसान नहीं दिखती।
अमेरिका में रोजगार आंकड़ों में बड़े संशोधन ने संकेत दिया है कि नौकरी बाजार उतना मजबूत नहीं है जितना पहले समझा जा रहा था। उपभोक्ता कर्ज, खासकर क्रेडिट कार्ड और स्टूडेंट लोन में देरी और डिफॉल्ट बढ़ रहे हैं। क्रेडिट कार्ड बकाया रिकॉर्ड स्तर पर है। हाउसिंग सेक्टर भी सुस्ती दिखा रहा है।
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रिपोर्ट यह भी बताती है कि अमेरिकी आर्थिक वृद्धि का बड़ा हिस्सा अभी एआई से जुड़े निवेश पर टिका है, जबकि पारंपरिक पूंजीगत खर्च में कमजोरी है।
जेफरीज की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया की आर्थिक हालत इस समय आसान नहीं है। एक तरफ देशों के बीच व्यापार को लेकर तनाव है और टैरिफ का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार की तरह हो रहा है। दूसरी तरफ कर्ज का बाजार कमजोर दिख रहा है और वहां जोखिम बढ़ते नजर आ रहे हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नई तकनीक और नए मौके लेकर आया है, लेकिन इससे नौकरियों पर असर पड़ सकता है और कई कंपनियों के शेयर दाम जरूरत से ज्यादा ऊंचे हो सकते हैं।
अभी बाजार खुद को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हालात धीरे धीरे सामान्य हो जाएंगे, या फिर कोई अचानक घटना बड़ा आर्थिक झटका दे सकती है।