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Editorial: दिवालिया समाधान से CSR और ऑडिट सुधार तक बड़े बदलाव

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केंद्र सरकार ने हाल ही में लोक सभा में कॉरपोरेट कानून (संशोधन) विधेयक 2026 प्रस्तुत किया ताकि तेजी से बदलते कारोबारी माहौल में संबंधित कानूनों को प्रासंगिक बनाए रखा जा सके

Last Updated- March 26, 2026 | 9:56 PM IST
Regulatory reforms

केंद्र सरकार ने हाल ही में लोक सभा में कॉरपोरेट कानून (संशोधन) विधेयक 2026 प्रस्तुत किया ताकि तेजी से बदलते कारोबारी माहौल में संबंधित कानूनों को प्रासंगिक बनाए रखा जा सके। हालांकि विधेयक को परीक्षण के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया है लेकिन कुछ प्रस्तावित संशोधन ऐसे हैं जिन पर यहां चर्चा की जानी चाहिए।

बिल में प्रस्तावित सबसे महत्त्वपूर्ण संशोधनों में से एक राष्ट्रपति को यह अधिकार देगा कि वे राष्ट्रीय कंपनी विधि पंचाट (एनसीएलटी) की एक या अधिक विशेष पीठ गठित कर सकें, ताकि कंपनी अधिनियम या दिवालिया और ऋणशोधन अक्षमता संहिता, 2016 के अंतर्गत किसी भी मामले का निपटारा किया जा सके।

विशेषज्ञों ने, जिनमें इस समाचार पत्र में लिखने वाले भी शामिल हैं, एनसीएलटी में क्षमता संबंधी बाधाओं को उजागर किया है। तार्किक रूप से देखें तो यही दिवालिया मामलों के समाधान में देरी का सबसे बड़ा कारण है, जो वर्तमान में औसतन अनुमानित समय से दोगुना अधिक वक्त लेता है। संकट में फंसी परिसंपत्तियों के समाधान में देरी से मूल्य का अनावश्यक नुकसान हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि संसद दिवालिया और ऋणशोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 पर भी चर्चा कर रही है, जिसका उद्देश्य दिवालिया समाधान की प्रक्रिया को तेज करना है। यदि दोनों विधेयक पारित हो जाते हैं तो दिवालिया समाधान ढांचे को बड़ा प्रोत्साहन मिल सकता है। इसके अलावा विधेयक विलय आवेदन को एक ही एनसीएलटी पीठ में केंद्रीकृत करने का प्रस्ताव करता है। इससे संबंधित संस्थाओं पर दबाव कम होगा और विलय की प्रक्रिया तेज होगी।

कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के संदर्भ में, संशोधन अनिवार्य शुद्ध लाभ सीमा को 5 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव करता है। यद्यपि सीएसआर पर कानूनी अनिवार्यता स्वयं विवादास्पद है। बढ़ी हुई सीमा अपेक्षाकृत छोटी कंपनियों के लिए राहत होगी। अन्य संशोधन छोटे उद्यमों पर अनुपालन का बोझ कम करने के साथ-साथ प्रमुख प्रबंधकीय व्यक्तियों के लिए जवाबदेही मानकों को सख्त करने का इरादा रखते हैं।

कई वर्षों से इस बात पर चिंता रही है कि अंकेक्षण फर्म जिस तरह से काम करती हैं उसमें हितों का टकराव होता है। ऐसी फर्में गैर अंकेक्षण सेवाएं भी देती हैं, जो अंकेक्षण की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं। एक संशोधन प्रस्तावित करता है कि निर्धारित श्रेणी की कंपनियों के ऑडिटर या अंकेक्षण फर्में, कंपनी या उसकी होल्डिंग या सहायक कंपनियों को कोई भी गैर-अंकेक्षण सेवा प्रदान नहीं करेंगी।

यह शर्त अंकेक्षण फर्म के कार्यकाल समाप्त होने के बाद तीन वर्षों तक लागू रहेगी। इससे अंकेक्षण गुणवत्ता को लेकर बाजार की चिंताओं का बड़े पैमाने पर समाधान होगा। संशोधन कुछ श्रेणी की कंपनियों के लिए बायबैक यानी पुनर्खरीद की शर्तों को भी आसान बनाने का प्रयास करता है। ऐसी कंपनियां, कुछ बुनियादी शर्तों के अधीन, अब एक वर्ष में दो प्रस्ताव ला सकेंगी। इससे कंपनियों को बाजार की परिस्थितियों के अनुसार ऐसे प्रस्तावों का समय तय करने में अधिक लचीलापन मिलेगा।

महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि, विधेयक में राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (एनएफआरए) को अन्य नियामकों के बराबर लाने का प्रावधान है। इससे एनएफआरए को लेखा फर्मों के कामकाज को नियंत्रित करने वाले विनियम बनाने की शक्ति मिलेगी। इससे समय के साथ देश में लेखा मानकों में सुधार होने की उम्मीद है। एनएफआरए ने अपनी हालिया रिपोर्टों में लेखा फर्मों के कामकाज में महत्त्वपूर्ण खामियों को उजागर किया है। वित्तीय रिपोर्टिंग की गुणवत्ता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारत बड़े निवेश आकर्षित करने का प्रयास कर रहा है।

इसके अलावा, अनुपालन में सुधार के लिए विधेयक वैकल्पिक निवेश कोषों (जो न्यास के रूप में संरचित हैं) को सीमित दायित्व साझेदारी (एलएलपी) में बदलने की सुविधा देने का प्रस्ताव करता है। उल्लेखनीय है कि विधेयक कुछ शर्तों के अधीन, कंपनियों को वार्षिक आम बैठक (एजीएम) और असाधारण आम बैठक (ईजीएम) वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या अन्य दृश्य-श्रव्य माध्यमों से आयोजित करने की अनुमति देने का प्रस्ताव करता है। विधेयक में कई प्रावधान हैं जो कंपनियों को सक्षम बनाने और समग्र व्यावसायिक वातावरण को सुधारने की दिशा में हैं।

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First Published - March 26, 2026 | 9:34 PM IST

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