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Editorial: जनगणना की शुरुआत

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हर एक दशक में होने वाली जनगणना 2020 में होनी थी लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण यह उस समय नहीं हो सकी

Last Updated- April 01, 2026 | 9:38 PM IST
Census

देश में बहुप्रतीक्षित जनगणना की औपचारिक शुरुआत एक अप्रैल को हो गई। हर एक दशक में होने वाली जनगणना 2020 में होनी थी लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण यह उस समय नहीं हो सकी। परंतु आर्थिक गतिविधियां सामान्य होने के बाद भी इसे क्यों अंजाम नहीं दिया गया इस बारे में कोई स्पष्टीकरण मौजूद नहीं है। खैर जो भी हो, इस तथ्य का स्वागत किया जाना चाहिए कि जनगणना की प्रक्रिया अब शुरू हो गई है।

नियमित जनगणना की आवश्यकता को कम करके नहीं आंका जा सकता, विशेष रूप से भारत जैसे देश के लिए जो तेजी से बढ़ और बदल रहा है। उदाहरण के लिए, सर्वेक्षण डेटा और विश्लेषणात्मक मॉडल बताते हैं कि भारत में जन्म दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है, और कुछ राज्यों में यह प्रतिस्थापन दर से भी नीचे चली गई है। वास्तविक जनगणना डेटा वास्तविक स्थिति की पुष्टि करेगा। इसके अलावा, यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि भारत का शहरीकरण पहले के आधिकारिक आंकड़ों की तुलना में कहीं तेजी से हुआ है। नई जनगणना इस पर और अधिक प्रकाश डाल सकेगी।

जनगणना का काम दो चरणों में पू रा किया जाएगा। पहला चरण होगा मकानों की सूची बनाना और आवास जनगणना, जिसे अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच 30 दिनों की अवधि में किया जाएगा। यह हर राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन की प्राथमिकता पर निर्भर करेगा। दूसरा चरण होगा जनसंख्या गणना, जिसे फरवरी 2027 में पूरा किया जाएगा। पहाड़ी और बर्फ से ढके क्षेत्रों जैसे लद्दाख, जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में यह चरण सितंबर 2026 में पूरा किया जाएगा।

जनगणना की संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 होगी। इस बार दो बातें एकदम खास होंगी। पहली बार एक समर्पित पोर्टल के माध्यम से स्वयं गणना की इजाजत दी जाएगी। दूसरे, यह काम डिजिटल प्रारूप में किया जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि इससे संकलन की गति बहुत तेज हो जाएगी। उन्होंने यह भी दोहराया है कि डेटा सुरक्षित रहेगा और किसी अन्य सरकारी इकाई के साथ उसे साझा नहीं किया जाएगा।

जनगणना का परिणाम जब भी जारी होगा उस पर गहन नजर रखी जाएगी लेकिन दो संबंधित बाते हैं जिन्हें सावधानीपूर्वक संभालना होगा। पहला, 2027 की जनगणना में 1931 के बाद पहली बार जाति की गणना भी की जाएगी। जाति भारत की सामाजिक संरचना का एक अहम पहलू है और इसका बहुत अधिक राजनीतिक महत्त्व है। इस पहले से जुड़े प्रश्नों को अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया गया है।

जनगणना के जाति संबंधी पहलू को शुरू से ही बहुत सावधानी से संभालना होगा। यानी पूछे जाने वाले सवालों और उत्तर दर्ज करने के तरीके पर ध्यान देना होगा। इस चरण से आपत्तियां सामने आ सकती हैं। इसके अलावा, अंतिम परिणाम को कैसे संभाला जाता है, यह भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा। संभावना है कि इसका उपयोग विभिन्न मांगों के साथ राजनीतिक वजहों के लिए किया जाएगा। यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि कहीं इसका नतीजा देश की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना को अस्थिर करने के रूप में न आए।

दूसरा, 2027 की जनगणना लोक सभा में सीटों के परिसीमन का आधार भी बन सकती है। इससे विधायिका में महिलाओं के आरक्षण को लागू करना भी संभव होगा। यह भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है, जिसका भारत की संघीय संरचना पर प्रभाव पड़ेगा। दक्षिण भारत के राज्य तर्क देते हैं कि लोक सभा में उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा क्योंकि उनकी जनसंख्या वृद्धि उत्तरी भारत के राज्यों की तुलना में धीमी रही है।

यह तर्क उचित है और इसलिए बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि परिसीमन का कार्य कैसे किया जाता है। सैद्धांतिक रूप से देखें तो संतुलन बनाए रखना आवश्यक होगा और राज्यों को जनसंख्या वृद्धि को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने और जीवन स्तर सुधारने के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार, शुद्ध आर्थिक दृष्टिकोण से, 2027 की जनगणना के आंकड़े सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को बेहतर निर्णय लेने में मदद करेंगे। हालांकि इसका एक राजनीतिक पहलू भी है जिसे बेहतर ढंग से संभालना होगा।

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First Published - April 1, 2026 | 9:34 PM IST

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