पिछले 20 वर्षों से अधिक समय से भारत की आर्थिक समीक्षाओं और वित्त मंत्रियों के सालाना बजट भाषणों में एक मजबूत एवं तरल (लिक्विड) कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार तैयार करने का बार-बार जिक्र हुआ है। भारत के वित्त एवं इनसे जुड़े पहलुओं पर नजर रखने वाले पर्यवेक्षक कई बार ऐसे वादों का गवाह रह चुके हैं। एक दर्जन से अधिक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समितियों एवं अनगिनत कार्य समूहों की तरफ से आए ढेरों सुझावों के बावजूद कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार का विकास पूरी तरह नहीं हो पाया है। यहां अब भी कारोबार कम होता है और कुछ शीर्ष गिनी-चुनी कंपनियों की ही ज्यादतर मौजूदगी दिखती है।
इस गतिरोध को समझने के लिए भारत के इक्विटी बाजारों के साथ इसके स्पष्ट अंतर को देखना आवश्यक है। पिछले 35 वर्षों में भारत ने लगभग विश्वस्तरीय शेयर (इक्विटी) बाजार तैयार कर लिया है। देश ने पूंजी निर्गम नियंत्रक की समाप्ति से लेकर टी+1 निपटान तक एक आधुनिक, प्रौद्योगिकी-संचालित ढांचा तैयार करने तक का सफर तय किया है। अब सवाल है कि शेयर बाजार को चमकाने के बाद भी भारत बॉन्ड बाजार को गहरा एवं परिपक्व क्यों नहीं बना पाया है?
इसका उत्तर स्टांप शुल्क या दिवालियापन की प्रक्रियाओं जैसी तकनीकी सूक्ष्म बातों में नहीं बल्कि राजकोषीय प्रभुत्व की राजनीतिक अर्थव्यवस्था, राज्य के संस्थागत प्रोत्साहनों और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) में सुधार की राजनीति में निहित है। ये सभी वास्तविक राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव को दर्शाते हैं। इस लिहाज से ‘नदारद’ बॉन्ड बाजार हमारी वित्तीय प्रणाली की एक खामी नहीं बल्कि एक खूबी है।
कॉरपोरेट बॉन्ड बाजारों को समझने के लिए हमें सबसे पहले भारतीय सरकारी प्रतिभूति (जी-सेक) बाजार में विरोधाभास को समझना होगा। मानक वित्त सिद्धांत के अनुसार बढ़ते ऋण स्तर से साख (क्रेडिट) से जुड़े जोखिम बढ़ते हैं जिनसे उधार लेने की लागत बढ़ जाती है। इससे क्रेडिट रेटिंग यानी साख में गिरावट की आशंका बढ़ जाती है। हालांकि, आईआईटी रुड़की के प्राध्यापक मनीष सिंह के हालिया शोध से पता चलता है कि भारत इस सिद्धांत से अलग एक दिलचस्प अपवाद है। केंद्र और राज्यों के संयुक्त ऋण का अनुमान 2024-25 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 81.92 फीसदी तक पहुंचने का लगाया गया है जो 2000-01 में 72 फीसदी था। हालांकि, केंद्र सरकार की नई प्रतिभूतियों पर यील्ड वास्तव में 2000-01 के 11.77फीसदी से गिरकर 2025 में 6.96 फीसदी हो गई।
साथ ही, कई राज्य दिवालिया होने के कगार पर हैं, वेतन और पेंशन में देरी हो रही है और भारत की दीर्घकालिक विदेशी मुद्रा क्रेडिट रेटिंग ‘जंक’ श्रेणी से बस एक पायदान ऊपर है। फिर भी सरकारी उधार की लागत उल्लेखनीय रूप से स्थिर बनी हुई है या उसमें कमी देखी जा रही है।
ब्रिटेन में 2022 के ‘लिज ट्रस’ प्रकरण के उलट (जहां गिल्ट बाजार ने बिना वित्त पोषित कर कटौती का विरोध किया और केवल 44 दिनों में एक प्रधानमंत्री को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा) भारतीय बॉन्ड बाजार राजकोषीय ज्यादती पर दंड लगाने में विफल रहता है। ऋण स्तरों और मूल्य निर्धारण के बीच यह असंतुलन ‘वित्तीय दमन’ के माध्यम से बरकरार रखा जाता है जहां सरकार अपने लिए सस्ते ऋण की गारंटी देने को वित्तीय प्रणाली का ढांचा तैयार करती है।
इस तरह, सरकार अपने ऋण के लिए एक ‘बंधुआ’ ग्राहक सुनिश्चित करके इसे प्रबंधित करती है। सरकारी उधार का 85 फीसदी से अधिक हिस्सा राज्य के स्वामित्व वाले बैंकों, बीमा कंपनियों जैसे जीवन बीमा निगम और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन जैसे पेंशन फंडों से आता होता है। राज्य इन वित्तीय संस्थानों को जी-सेक रखने के लिए बाध्य करने के लिए सूक्ष्म और वृहद-विवेकपूर्ण दोनों प्रकार के नियमों का उपयोग करता है। विदेशी भागीदारी को प्रतिबंधित करके और विदेशी मुद्रा उधार को सीमित कर घरेलू बाजार वैश्विक बाजार अनुशासन से अछूता रहता है। एक्सकेडीआर के चिटगुपी एवं अन्य के हालिया शोध से पता चलता है कि सरकारी बॉन्ड खरीदने वालों में से केवल 5 फीसदी ही स्वेच्छा से इन्हें खरीदते हैं और बाकी सभी सरकारी दबाव में आकर रकम उपलब्ध कराते हैं।
कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार का अल्पविकास इस विकृत सरकारी प्रतिभूति बाजार का प्रत्यक्ष नतीजा है। यह संरचना राज्य को बाजार की शक्तियों को बेअसर करने की अनुमति देती है मगर व्यापक अर्थव्यवस्था को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। इसके तीन निहितार्थ हैं-
भारी मात्रा में घरेलू पूंजी सरकारी बॉन्ड में जाने से निजी क्षेत्र निवेश से वंचित हो जाता है। इससे विविध कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार का विकास लगातार बाधित होता है क्योंकि निजी जारीकर्ताओं के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं बचते।
एक कार्यशील कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार विश्वसनीय, जोखिम-मुक्त मानक के रूप में सॉवरिन यील्ड कर्व पर निर्भर करता है। चूंकि, सरकारी बॉन्ड यील्ड कृत्रिम रूप से कम कर दी जाती है इसलिए मानक स्वयं ही विकृत हो जाता है जिससे कॉरपोरेट क्रेडिट जोखिम का सटीक मूल्यांकन करना असंभव हो जाता है।
बॉन्ड बाजार राजकोषीय अपव्यय पर दंड लगाने से वंचित है, इसलिए आर्थिक दबाव अन्यत्र प्रकट होता है। आंकड़े दर्शाते हैं कि भारी भरकम उच्च ऋण से भारतीय रुपये का अवमूल्यन अधिक होता है। मुद्रा से जुड़ा यह जोखिम भारतीय उद्यमों के लिए बाहरी स्रोतों से उधार लेना कहीं अधिक महंगा बना देता है, जिससे उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता और भी बाधित होती है।
एक गहरे एवं निर्बाध रूप से कारोबार करने वाला बॉन्ड बाजार भारत को बैंक-केंद्रित प्रणाली से बाजार-केंद्रित प्रणाली में तब्दील करेगा जिससे संस्थागत शक्ति में एक बड़ा बदलाव आएगा। मौजूदा बैंक-प्रधान प्रणाली में सरकार को काफी अधिकार मिले हुए हैं। सरकारी बैंकों के ‘आपसी सहयोग’ के कारण कार्यपालिका राजनीतिक रूप से सुविधाजनक क्षेत्रों या पसंदीदा संस्थाओं को अप्रत्यक्ष रूप से ऋण दे सकती है। इसके विपरीत बॉन्ड निवेशक ‘जोखिम का कठोर मूल्यांकन’करते हैं। वे इसमें जरा भी नरमी नहीं बरतते और न ही सरकार के दबाव में आकर ऋणों का पुनर्गठन करते हैं।
इसके अलावा, एक समृद्ध बॉन्ड बाजार से नियामकीय शक्ति आरबीआई से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) को स्थानांतरित हो जाएगी। मौजूदा स्थिति वित्त मंत्रालय और आरबीआई दोनों के हक में है। वित्त मंत्रालय को सस्ता वित्त उपलब्ध हो जाता है जबकि आरबीआई ऋण आवंटन पर अपनी पकड़ बनाए रखता है।
अधिकारी यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर हैं और राजनेता भी उनका साथ देते हैं भले ही इससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि को नुकसान क्यों न हो। राज्य की उधार लागत को सुरक्षित रखने के लिए बॉन्ड बाजार को दबाकर विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धात्मकता को नुकसान पहुंचाया गया है। वास्तविक सुधार के लिए राज्य को यह नियंत्रण छोड़ना होगा और आपूर्ति एवं मांग की संयुक्त शक्तियों को यह तय करने देना होगा कि किसे और किस कीमत पर पूंजी प्राप्त होगी। सुधार के लिए दीर्घकालिक रणनीति में तीन महत्त्वपूर्ण कदम शामिल होने चाहिए।
पहला, बॉन्ड बाजार को मुक्त किया जाए और राजकोषीय स्तर पर ज्यादती के लिए कीमत चुकानी पड़े। दूसरा, ऐसे संकेतों की व्यवस्था होनी चाहिए जिनका इस्तेमाल बाजार और नागरिक दोनों सरकार को जवाबदेह ठहराने के लिए कर सकें। तीसरा, विकृत वित्तीय प्रणाली के प्रबंधन के बजाय सरकार वास्तविक रूप से जनता की भलाई से जुड़े प्रावधानों पर ध्यान दे।
जब संकट के समय सरकार को अधिक संसाधनों की जरूरत पड़ती है तो मौजूदा व्यवस्था में उसके पास कोई ठोस विकल्प नहीं होता है। रणनीतिक गहराई और जीडीपी वृद्धि मजबूत करने के लिए वित्तीय एवं आर्थिक नीति में बड़े बदलावों की जरूरत है। जब तक ऋण बाजार पर बेवजह दबाव डालने एवं उसे प्रभावित करने की सरकार की आदत नहीं जाएगी तब तक कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार से जुड़े वादे पूरे नहीं होंगे, बस बार-बार इनका आर्थिक समीक्षाओं में जिक्र होता रहेगा।
(लेखक आइजक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में मानद वरिष्ठ फेलो और पूर्व अफसरशाह हैं)