गत सप्ताह नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में निवेश के वादों की बाढ़ आ गई। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई और डेटा अधोसंरचना विकास) में 110 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया जबकि अदाणी एंटरप्राइजेज ने कहा कि वह अगले एक दशक में हरित ऊर्जा संचालित डेटा सेंटर्स में 100 अरब डॉलर का निवेश करेगी। कुछ विदेशी कंपनियों ने भी कहा कि वे भारत में तथा अन्य विकासशील देशों में इस क्षेत्र में भारी पूंजी निवेश करना चाहती हैं।
उदाहरण के लिए माइक्रोसॉफ्ट ने गत वर्ष 17.5 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था और अब उसने संकेत दिया है कि वह विकासशील देशों में एआई अधोसंरचना विकास में 50 अरब डॉलर की निवेश प्रतिबद्धता का इरादा रखती है। यह कम से कम आंशिक रूप से कुछ गहरे संरचनात्मक कारणों की प्रतिक्रिया है।
भारत पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े डेटा उपभोक्ताओं में से एक है, और यह वार्षिक रूप से दो अंकों की दर से बढ़ रहा है। जैसे-जैसे हम देश डेटा संरक्षण और संप्रभुता के कुछ पहलुओं को लागू करने की ओर बढ़ रहे हैं, यह सुनिश्चित करना उचित है कि स्थानीय डेटा केंद्र बनाए जाएं ताकि वे वर्तमान और भविष्य की नियामक आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।
एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जो व्यापक तौर पर निजी निवेश की कमी की शिकार हो, वहां इस क्षेत्र में ऐसे आंकड़ों का सामने आना राहत दे सकता है। शायद यही वजह है कि वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में उन कंपनियों को 20 वर्ष तक की कर राहत देने का प्रस्ताव रखा है जो भारत में क्लाउड क्षमता का इस्तेमाल करेंगी। यह अत्यंत आवश्यक है कि भारत का व्यापक निजी क्षेत्र भी इस बात पर गंभीरता से विचार करे कि यदि और जब यह अधोसंरचना विकसित होती है, तो वे इसका प्रभावी उपयोग किस प्रकार कर सकते हैं। इसके लाभ केवल विदेशी कंपनियों तक ही सीमित नहीं रहने चाहिए।
उस लिहाज से देखें तो इस अनुमानित उत्साह के साथ ही कुछ उचित प्रश्न भी पूछे जाने चाहिए। उदाहरण के लिए पानी और बिजली की उपलब्धता का प्रश्न डेटा सेंटर को लेकर होने वाली हर बहस में शामिल रहता है। बिजली आपूर्ति पर होने वाला व्यय किसी डेटा सेंटर के परिचालन का 20 से 40 फीसदी तक हो सकता है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी बिजली दरें प्रतिस्पर्धी हों या कैप्टिव बिजली संयंत्रों की स्थापना करना और रखरखाव करना आसान हो।
इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकनॉमिक्स ऐंड फाइनैंशियल एनालिसिस के अनुसार देश में मौजूद डेटा सेंटर्स की क्षमता को 1.4 गीगावॉट से बढ़ाकर 9 गीगावॉट करने में देश की कुल बिजली का करीब 3 फीसदी खप जाएगा। यह औद्योगिक बिजली की मांग में बहुत बड़ा इजाफा है। पानी की खपत कहीं अधिक बड़ी चुनौती होगी क्योंकि कई क्षेत्रों में पानी के औद्योगिक, शहरी और कृषि इस्तेमाल को लेकर पहले से विवाद हैं।
महाराष्ट्र और तमिलनाडु सहित विभिन्न राज्यों ने भारत में डेटा सेंटर निर्माण को आकर्षित करने का प्रयास किया है। हालांकि, यह याद रखना अत्यंत आवश्यक है कि बड़े पैमाने पर निवेश तभी सफल होगा जब ऐसा खर्च लाभकारी माना जाएगा। कुछ बड़ी वैश्विक कंपनियां मसलन, रिलायंस और अदाणी आदि जो कंप्यूट क्षमता की संभावित खरीदार हैं, वे पिछले वर्ष में अपने निवेश को इतना बढ़ा चुकी हैं कि विश्लेषक अब यह प्रश्न उठाने लगे हैं कि वे पर्याप्त लाभ कब और कैसे अर्जित करेंगी। यह आवश्यक है कि वित्तीय क्षेत्र, जिसमें राज्य नियंत्रित बैंक भी शामिल हैं, और सामान्य रूप से सरकार, संभावित जोखिमों के प्रति सजग रहें।
ऐसे निवेश उन्हीं को करने देना चाहिए जिनके पास अरबों डॉलर के दांव लगाने के लिए नकदी उपलब्ध है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी महत्त्वपूर्ण है कि यह निवेश किसी एक भौगोलिक क्षेत्र पर आर्थिक निर्भरता में न बदल जाए। चाहे वे देश हों जो डेटा सेंटरों में प्रयुक्त चिप और महत्त्वपूर्ण खनिज उपलब्ध कराते हैं, या वे देश जहां क्षमता खरीदने वाली कंपनियां स्थित हैं। यह निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी है। हालांकि, यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि यह टिकाऊ भी हो।