अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया है। ये हमला शनिवार, 28 फरवरी को हुआ, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। इस कार्रवाई से पूरे इलाके में तनाव और बढ़ गया है, क्योंकि ईरान ने भी जवाबी हमले किए हैं। व्हाइट हाउस और उसके साथी देश इसे जंग नहीं मान रहे, बल्कि सिर्फ एक सैन्य ऑपरेशन या अभियान बता रहे हैं। ये नाम रखने का तरीका राजनीतिक है और अमेरिकी कानून से भी जुड़ा हुआ है, जहां कांग्रेस और राष्ट्रपति के बीच जंग छेड़ने की ताकत बंटी हुई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान पर हुए हमलों को “मेजर कॉम्बैट ऑपरेशन” कहा है, जंग नहीं। उन्होंने इसे एक बड़े और लगातार चलने वाले अभियान के रूप में बताया, जिसका मकसद ईरान की सैन्य ताकत और परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से तोड़ना है। ट्रंप का कहना है कि ये हमले किसी संप्रभु देश पर हैं, लेकिन फिर भी इसे जंग का नाम नहीं दे रहे। इससे साफ है कि वो कानूनी पचड़ों से बचना चाहते हैं, जहां कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होती है।
अमेरिकी संविधान के आर्टिकल वन के मुताबिक, कांग्रेस को जंग घोषित करने का अधिकार है, जबकि राष्ट्रपति सेना का कमांडर-इन-चीफ होता है। असल में, ये दोनों शाखाओं के बीच लंबे समय से झगड़ा चल रहा है कि कौन लड़ाई शुरू कर सकता है और कब। 1973 में कांग्रेस ने वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन पास किया, जिसमें कहा गया कि अमेरिकी सेना को लड़ाई में सिर्फ तब भेजा जा सकता है जब कांग्रेस जंग घोषित करे, फोर्स इस्तेमाल की मंजूरी दे या अमेरिका या उसके इलाकों पर हमला होकर राष्ट्रीय आपातकाल बने।
लेकिन कार्यकारी शाखा यानी राष्ट्रपति वाले हमेशा कहते हैं कि हर तरह की सैन्य कार्रवाई को संविधान के हिसाब से जंग नहीं माना जाता। वो सीमित हमलों और पूर्ण पैमाने की जंग के बीच फर्क बताते हैं, जहां बड़े युद्ध के लिए कांग्रेस की जरूरत पड़ती है। इसी खाली जगह में राष्ट्रपति बिना औपचारिक मंजूरी के हवाई हमले करवाते हैं।
प्रोजेक्ट ऑन गवर्नमेंट ओवरसाइट के द कॉन्स्टिट्यूशन प्रोजेक्ट के ऐक्टिंग डायरेक्टर डेविड जानोव्स्की ने टाइम मैगजीन को बताया कि राष्ट्रपति की एकतरफा ताकत सिर्फ असली आपात स्थिति तक सीमित है, जैसे हमला हो रहा हो और उसे रोकना पड़े या कोई साफ खतरा हो। चूंकि कांग्रेस ने अभी जंग की मंजूरी नहीं दी और अमेरिका पर कोई सीधा हमला नहीं हुआ, जानोव्स्की ने इन हमलों को गैरकानूनी बताया। उनका कहना है कि अगर ट्रंप इसे जंग कहना चाहें तो कांग्रेस से मंजूरी लेनी पड़ेगी।
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ट्रंप प्रशासन ने हमलों से पहले “गैंग ऑफ 8” को सूचना दी, जो कांग्रेस के दोनों दलों के बड़े नेताओं का ग्रुप है। BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के स्पीकर माइक जॉनसन, जो रिपब्लिकन हैं, ने ये बताया। लेकिन पूरे कांग्रेस से मंजूरी क्यों नहीं ली गई? शायद इसलिए क्योंकि कांग्रेस सैन्य कार्रवाई के लिए फंडिंग रोक सकती है और वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन लाकर राष्ट्रपति की ताकत सीमित कर सकती है।
ये रिजॉल्यूशन 1973 में वियतनाम जंग के दौरान बना था। इसमें राष्ट्रपति को विदेश में सेना भेजने से पहले “हर मुमकिन हालत में” कांग्रेस से सलाह लेनी पड़ती है। साथ ही, सेना भेजने के 48 घंटे में रिपोर्ट देनी होती है। अगर कांग्रेस मंजूरी न दे तो 60 दिनों में ऑपरेशन खत्म करना पड़ता है। डेमोक्रेट्स ने इस कार्रवाई की आलोचना की है और वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन लाने की मांग की है, लेकिन अभी इसके पास होने की संभावना कम लगती है।
ऐसा पहली बार नहीं हो रहा। इसी साल ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला में ऑपरेशन चलाया, जिसमें वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया गया। पिछले साल भी ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका ने ईरान की परमाणु सुविधाओं पर हमला किया। दोनों ही मामलों में कांग्रेस की मंजूरी नहीं ली गई।
ट्रंप से पहले भी कई राष्ट्रपति ऐसा कर चुके हैं। इससे पहले हैरी ट्रूमैन से लेकर बराक ओबामा तक ने कोरिया, पनामा और लीबिया जैसे देशों में सेना भेजी थी। वहां भी उन लोगों ने उसे जंग नहीं बताया था और कांग्रेस से अनुमति भी नहीं ली थी। ये सब बिना औपचारिक मंजूरी के हुए थे।
ये सब कुछ होने के बावजूद मुख्य झगड़ा वही है: कब लगातार हमले, बढ़ते निशाने और जवाबी कार्रवाई असल में जंग बन जाते हैं, भले ही औपचारिक घोषणा न हो। कॉन्स्टिट्यूशन एनोटेटेड, जो अमेरिकी संविधान की व्याख्या करता है, के मुताबिक अदालतें ऐसे आधुनिक वॉर पावर्स के झगड़ों को सुलझाने से बचती हैं। वो अक्सर केस खारिज कर देती हैं, कहकर कि इसमें स्टैंडिंग या पॉलिटिकल क्वेश्चन जैसी वजहें हैं। नतीजा ये कि ये विवाद राजनीति में लड़ा जाता है, अदालतों में नहीं।