facebookmetapixel
Advertisement
Page Industries पर ब्रोकरेज बुलिश, प्रीमियम प्रोडक्ट्स और बढ़ती मांग से ग्रोथ तेज; टारगेट प्राइस ₹48,000 तक₹1 लाख करोड़ क्लब हुआ बड़ा: 2026 में 10 नई कंपनियों की एंट्री, 6 हुईं बाहरVivo-Dixon JV को हरी झंडी, डिक्सन के कारोबार में ₹30,000 करोड़ जुड़ने की उम्मीद; ब्रोकरेज बुलिशNFO का क्रेज हुआ ठंडा! 6 साल के निचले स्तर पर पहुंची नई फंड स्कीमों की कमाईHDFC Bank में 9 साल बाद कर्मचारियों की संख्या घटी, AI और टेक्नोलॉजी पर बढ़ा फोकसDatia Bypoll: अचानक सुर्खियों में क्यों आया दतिया उपचुनाव! डैमेज कंट्रोल में जुटी पार्टी भाजपाUS-Iran Conflict: ट्रंप का दावा- कमर्शियल जहाजों के लिए खुला है होर्मुज स्ट्रेट, ईरान पर अमेरिका के नए हवाई हमलेGold-Silver Outlook: सोना-चांदी में गिरावट जारी, अगले हफ्ते कैसी रहेगी चाल? एक्सपर्ट्स ने दी रायडेटा सेंटर, क्लाउड और फाइनेंशियल सर्विसेज होंगे Airtel के अगले ग्रोथ इंजन, 10 साल में ₹3.3 लाख करोड़ का निवेशUpcoming NFO: पैसा रखिए तैयार! अगले हफ्ते खुलेंगे 4 नए फंड, जानें किस स्कीम में क्या है खास?

Explainer: खामेनेई के बाद तेहरान पर किसका शासन? ईरान में सुप्रीम लीडर व्यवस्था की पूरी कहानी

Advertisement

इजरायली-अमेरिकी हमले में खामेनेई की मौत के बाद ईरान में संवैधानिक संकट गहरा गया है। अंतरिम परिषद ने कमान संभाल ली है, लेकिन नए सुप्रीम लीडर की तलाश जारी है

Last Updated- March 02, 2026 | 4:08 PM IST
Ayatollah Ali Khamenei
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देते लोग | फोटो: रॉयटर्स

ईरान की सियासत में एक ऐसा मोड़ आ गया है जिसने पूरी दुनिया की सांसें थाम दी हैं। तेहरान की ओर देखते हुए हर व्यक्ति के मन में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल है कि अब देश की कमान किसके हाथ में जाएगी? अयातुल्लाह अली खामेनेई, वो शख्सियत जो दशकों तक ईरान की तकदीर का आखिरी फैसला लेते रहे, अब इस दुनिया में नहीं हैं। करीब चार दशक तक अयातुल्लाह अली खामेनेई ईरान की सिस्टम का चेहरा रहे। उनकी मौजूदगी ही ईरान की सियासत की दिशा तय करती थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। अमेरिकी-इजरायली हमले में उनकी मौत के बाद सत्ता के गलियारों में हलचल तेज है। बंद कमरों में बैठकों का दौर चल रहा है, अटकलें लग रही हैं और कई नाम चर्चा में हैं। सवाल सिर्फ नए चेहरे का नहीं, बल्कि उस राह का भी है जिस पर ईरान आगे बढ़ेगा।

गौरतलब है कि ईरान में सुप्रीम लीडर का पद महज एक कुर्सी नहीं होता, बल्कि मजहब, फौज और सियासत का वो संगम है जहां से पूरे मिडल ईस्ट की कूटनीतिक दिशा तय होती है। 1979 की इस्लामिक क्रांति की आग से निकला यह सिस्टम आज अपने सबसे बड़े इम्तिहान के दौर से गुजर रहा है। क्या यह विरासत किसी के खून के रिश्ते को मिलेगी या फिर कोई मंझा हुआ धार्मिक चेहरा इस ताकतवर पद की कमान संभालेगा? पर्दे के पीछे नामों की चर्चा तेज है, ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ सक्रिय है और दुनिया की नजरें उस सफेद धुएं पर टिकी हैं जो ईरान के नए मुस्तकबिल का ऐलान करेगा।

सुप्रीम लीडर व्यवस्था की शुरुआत कैसे हुई?

ईरान में ये सिस्टम 1979 की इस्लामिक क्रांति से आया, जब लोगों ने अमेरिका समर्थित शाह मोहम्मद रजा पहलवी की शासन को उखाड़ फेंका। अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने क्रांति की अगुआई की और बाद में खुद को सुप्रीम लीडर बनाया। ये पद शिया इस्लाम की एक नई सोच पर आधारित था, जहां धार्मिक नेता को राजनीतिक ताकत भी मिलती है। हालाांकि, इससे पहले ऐसा कुछ नहीं था, क्योंकि ज्यादातर शिया धार्मिक नेता राजनीति से दूर रहते थे। लेकिन खुमैनी ने इसे बदल दिया। वो देश के कमांडर-इन-चीफ बने, फौज और रेवोल्यूशनरी गार्ड्स को कंट्रोल किया और ईरान को मिडल ईस्ट में ताकतवर बनाने की भरपूर कोशिश की। 

साल 1989 में खुमैनी की मौत के बाद, ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ ने अयातुल्ला अली खामेनेई को सुप्रीम लीडर चुना, जो उस वक्त राष्ट्रपति थे। खुमैनी ने खुद उन्हें अपना उत्तराधिकारी बताया था। खामेनेई ने पद संभालते ही अपनी ताकत बढ़ाई, रेवोल्यूशनरी गार्ड्स को मजबूत किया और ईरान को एक क्षेत्रीय ताकत बनाया। हालांकि, यह व्यवस्था हमेशा विवादों में रही, क्योंकि ये धार्मिक और राजनीतिक ताकत को एक जगह जोड़ती है। आज भी ये सिस्टम वैसा ही है, जहां सुप्रीम लीडर का फैसला ही आखिरी फैसला होता है। 

Also Read: Explainer: अयातुल्ला अली खामेनेई- एक छोटे कमरे से ईरान के सबसे ताकतवर ‘सुप्रीम लीडर’ बनने की पूरी दास्तां

उत्तराधिकार तय करने की प्रक्रिया क्या है?

ईरान के संविधान के मुताबिक, सुप्रीम लीडर की मौत या इस्तीफे के बाद ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ नाम की एक बॉडी नया नेता चुनती है। ये असेंबली 88 शिया क्लेरिक्स से बनी होती है, जो हर आठ साल में चुने जाते हैं। लेकिन उम्मीदवारों को ‘गार्जियन काउंसिल’ की मंजूरी चाहिए होती है, जो खुद सुप्रीम लीडर द्वारा नियुक्त किया जाता है। 

सुप्रीम लीडर के उम्मीदवारों को शिया इस्लामिक कानूनों का गहरा ज्ञान होना चाहिए। साथ ही राजनीतिक और कूटनीतिक समझ और प्रशासनिक काबिलियत भी होनी चाहिए। चुनाव सधारण बहुमत से होता है। तब तक देश को एक अस्थायी काउंसिल चलाती है, जिसमें राष्ट्रपति, न्यायपालिका का प्रमुख और ‘गार्जियन काउंसिल’ का एक मेंबर होता है। जैसे खामेनेई की मौत के बाद अभी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, न्यायपालिका प्रमुख गुलाम हुसैन मोहसेनी एजेई और आयतुल्लाह अलीरेजा अराफी जैसे नाम हो सकते हैं। ये काउंसिल सिर्फ ब्रिज की तरह काम करती है, असली चुनाव असेंबली करती है। हालांकि, यह प्रक्रिया सिर्फ एक बार 1989 में हुई है, जब खुमैनी की मौत के बाद खामेनेई चुने गए थे। 

नवंबर 2024 में खामेनेई ने असेंबली से मीटिंग के दौरान उत्तराधिकार पर बात की थी। जून 2025 की इजरायल से लड़ाई के दौरान भी असेंबली ने दावा किया था कि वे संभावित उत्तराधिकारियों की जांच कर रही है। लेकिन ये सब गोपनीय रहता है, लोगों को ज्यादा पता नहीं चलता। कभी-कभी लीडरशिप काउंसिल की बात भी होती है, जहां कई लोग मिलकर चलाएं, लेकिन 1989 में इसे पूरी तरह से नकार दिया गया था।

संभावित उत्तराधिकारी कौन-कौन हैं?

खामेनेई ने कथित तौर पर तीन क्लेरिक्स को संभावित उत्तराधिकारी बताया है, लेकिन नाम पब्लिक नहीं हैं। सबसे ज्यादा चर्चा मोजतबा खामेनेई की है, जो उनके दूसरे बेटे हैं। वो 56 साल के शिया धर्मगुरु हैं, IRGC और बसिज जैसे ग्रुप्स में प्रभाव रखते हैं। लेकिन बेटे को पद देने से गुस्सा हो सकता है, क्योंकि 1979 क्रांति ही राजवंश के खिलाफ शुरु हुई थी। 

इसके बाद आयातुल्लाह अलीरेजा अराफी का नाम आता है। 67 साल के अराफी ‘गार्जियन काउंसिल’ के मेंबर और ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ के डिप्टी चेयर हैं। वो ईरान में कौमी जुमे की नमाज की अगुवाई करते हैं और पूरे देश में मदरसों (सेमिनरी सिस्टम) को चलाते हैं। खामेनेई की मौत के बाद अभी उन्हें ही देश का अंतरिम (अस्थायी) सर्वोच्च नेता नियुक्त किया गया है।

इसके बाद नाम आता है हसन खुमैनी का। वह 54 साल के हैं और पहले सुप्रीम लीडर खुमैनी के पोते हैं। उन्हें थोड़ा रिफॉर्मिस्ट माना जाता है। वे अपने दादा के मकबरे की देखरेख करते हैं। 2016 में वे असेंबली चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था। 

एक और नाम अक्सर चर्चा में आता है मोहम्मद मेहदी मीरबागेरी का। वो अल्ट्रा-हार्डलाइन माने जाते हैं, असेंबली मेंबर हैं और इस्लामिक साइंसेज अकादमी नाम की एक संस्था चलाते हैं। इसके अलावा सुप्रीम लीडर के उत्तराधिकार के लिए गुलाम हुसैन मोहसेनी, अली लारिजानी आदि का नाम भी समय-समय पर सामने आते रहा है, जो अलग-अलग बड़े पदों पर काम कर रहे हैं या कर चुके हैं।

Advertisement
First Published - March 2, 2026 | 4:08 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement