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West Asia Conflict: तेल से लेकर बाहर से आने वाले पैसों तक, इस संकट का भारत पर कितना असर पड़ेगा?

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ईरान-इजरायल युद्ध और सऊदी रिफाइनरी पर हमले से वैश्विक तेल सप्लाई ठप होने का डर है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार और लाखों प्रवासियों पर गंभीर संकट मंडरा रहा है

Last Updated- March 02, 2026 | 5:01 PM IST
West Asia conflict
28 फरवरी को बहरीन में किए गए कथित ईरानी मिसाइल हमलों के बाद धुआं उठता हुआ दिखाई दिया | फोटो: रॉयटर्स

बीते दिनों अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर बड़े हमले किए। ये हमले शनिवार, 28 फरवरी को शुरू हुए, जिसमें ईरान की लीडरशिप, मिलिट्री कमांड सेंटर्स, मिसाइल सिस्टम और न्यूक्लियर साइट्स को निशाना बनाया गया। इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। इसके जवाब में ईरान ने पड़ोसी देशों में अमेरिकी एयरबेस और अन्य जगहों पर हमले शुरू कर दिए। ये सब कुछ मध्य पूर्व में तनाव को काफी ऊंचे स्तर पर ले गया है।

इसको लेकर नई दिल्ली की चिंता अब  बढ़ रही है। भारत का ईरान और खाड़ी देशों जैसे UAE, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और बहरीन से गहरा रिश्ता है। ये रिश्ते तेल की सप्लाई, व्यापार, निवेश, पैसे भेजने और वहां रहने वाले लाखों भारतीयों से जुड़े हैं। अगर ये तनाव और बढ़ा, तो भारत पर सीधा असर पड़ेगा।

तेल की सप्लाई पर खतरा मंडराया

भारत को अपनी जरूरत का करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल बाहर से मंगाना पड़ता है। इसलिए मध्य पूर्व में कोई भी हलचल भारत को प्रभावित करती है।

पिछले एक साल में भारत ने अपनी तेल खरीद की रणनीति बदली है। रूस अभी भी भारत के लिए एक बड़ा सप्लायर है, लेकिन उसकी हिस्सेदारी ऊपर-नीचे होती रहती है। फरवरी में भारत ने 5.22 मिलियन बैरल प्रति दिन (BPD) कच्चा तेल आयात किया, जो अब तक का दूसरा सबसे ज्यादा रिकॉर्ड है। इसमें रूस की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत थी, जबकि मध्य पूर्व की हिस्सेदारी बढ़कर 51 प्रतिशत हो गई।

2025 की शुरुआत तक भारतीय रिफाइनर रूस से 37 प्रतिशत और मध्य पूर्व से 45 प्रतिशत तेल ले रहे थे। मार्च 2025 में रिकॉर्ड आयात के दौरान रूस की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत थी, जबकि खाड़ी देशों की 38 प्रतिशत थी। लेकिन जनवरी 2026 के पहले तीन हफ्तों में रूसी सप्लाई घटकर 1.1 मिलियन BPD रह गई, जो दिसंबर के औसत से कम है और 2025 के मध्य के 2 मिलियन BPD से काफी नीचे। ये सब डॉनल्ड ट्रंप वाली अमेरिकी सरकार के दबाव की वजह से हुआ, जो भारत को रूस से तेल खरीद कम करने के लिए कह रही है।

रूसी सप्लाई कम होने पर पारंपरिक मध्य पूर्वी सप्लायर आगे आए। इराक की सप्लाई रूस के बराबर पहुंच गई। सऊदी अरब ने जनवरी 2026 में भारत को 924,000 BPD तेल भेजा, जो दिसंबर के 710,000 BPD से ज्यादा है और अप्रैल 2025 के 539,000 BPD के निचले स्तर से काफी ऊपर है।

अब नई मुसीबत ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज; के आसपास आ रही है। ये ईरान और ओमान के बीच का एक संकरा जलमार्ग है। अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद ईरान की धमकियों से यहां से तेल और गैस की शिपमेंट्स धीमी हो गई हैं।

दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल इसी स्ट्रेट से गुजरता है। रोजाना औसतन 20 मिलियन बैरल से ज्यादा कच्चा तेल और ईंधन यहां से जाता है। भारत के लिए तो यहां से 2.5-2.7 मिलियन BPD कच्चा तेल आता है, जिसमें ज्यादातर इराक, सऊदी अरब, UAE और कुवैत से आता है।

इसके अलावा भारत अपनी 80-85 प्रतिशत LPG जरूरत खाड़ी देशों से पूरी करता है, और ज्यादातर शिपमेंट्स इसी चोकपॉइंट से होकर आती हैं। अगर कोई रुकावट आई, तो दुनिया भर में तेल के दाम बढ़ जाएंगे, घरेलू ईंधन महंगा हो जाएगा और महंगाई भी चढ़ेगी।

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खाड़ी देशों में रह रहे लाखों भारतीयों की चिंता

तेल से अलग, सबसे बड़ी फिक्र खाड़ी में रहने वाले भारतीयों की है। GCC देशों यानी सऊदी अरब, UAE, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन आदि में 1 करोड़ से ज्यादा भारतीय रहते और काम करते हैं।

UAE में सबसे ज्यादा, 30 से ऊपर भारतीय हैं। ये वहां की आबादी का करीब 35 प्रतिशत हैं। सऊदी अरब में 27 लाख से ज्यादा, कुवैत में 10 लाख से ऊपर और कतर में 800,000 से ज्यादा। ये लोग कंस्ट्रक्शन, हॉस्पिटैलिटी, हेल्थकेयर और सर्विसेज जैसे सेक्टरों में काम करते हैं। कई ब्लू-कॉलर वर्कर भी हैं, खासकर UAE में, जबकि कुछ प्रोफेशनल्स और बिजनेसमैन हैं।

ये इलाका भारतीय छात्रों का भी बड़ा केंद्र है। 2025 में UAE में 247,000 से ज्यादा भारतीय स्कूल स्टूडेंट्स थे। सऊदी अरब, कतर और कुवैत में भी काफी संख्या में छात्र हैं। हाई स्कूल एनरोलमेंट के आंकड़े बताते हैं कि कई भारतीय परिवार वहां लंबे समय से बसे हुए हैं।

व्यापार और कारोबार पर दबाव

भारत के खाड़ी देशों से व्यापार लगातार बढ़ रहा है। ईरान से व्यापार वेस्टर्न सैंक्शंस की वजह से कम हुआ है, लेकिन बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और UAE से कारोबार फैल रहा है।

भारत ने मई 2022 में UAE के साथ फ्री ट्रेड पैक्ट लागू किया और पिछले साल ओमान के साथ कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट साइन किया। GCC ब्लॉक के साथ FTA की बातचीत भी शुरू हो चुकी है।

2024-25 में GCC को भारत का एक्सपोर्ट 57 बिलियन डॉलर पहुंच गया, जबकि इंपोर्ट 15.33 प्रतिशत बढ़कर 121.7 बिलियन डॉलर हो गया। कुल द्विपक्षीय व्यापार 178.7 बिलियन डॉलर रहा, जो पिछले साल के 161.82 बिलियन से ज्यादा है। पिछले फाइनेंशियल ईयर में UAE भारत का तीसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर था।

लेकिन एक्सपोर्टर्स चेतावनी दे रहे हैं कि बढ़ते तनाव से लॉजिस्टिक्स बिगड़ रही है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस (FIEO) के प्रेसिडेंट एससी रल्हान ने न्यूज एजेंसी PTI से कहा कि संघर्ष से ग्लोबल शिपिंग चैनल्स प्रभावित हो रहे हैं।

एयर रूट्स बदल रहे हैं, और लाल सागर और प्रमुख खाड़ी स्ट्रेट्स से माल ढुलाई अनिश्चित हो गई है। अगर डायवर्जन जारी रहा, तो जहाजों को केप ऑफ गुड होप से जाना पड़ेगा, जो यूरोप और अमेरिका के लिए 15-20 दिन ज्यादा समय लेगा।

बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ता है। ये भारतीय पोर्ट्स से स्वेज नहर होकर यूरोप जाने वाले माल के लिए जरूरी है। 2024 में इजरायल-हमास युद्ध के दौरान पहले भी शिपर्स को लंबे रूट्स लेने पड़े थे, जिससे लागत और देरी बढ़ी।

जनवरी में भारत का एक्सपोर्ट थोड़ा बढ़कर 36.56 बिलियन डॉलर हुआ, जबकि इंपोर्ट 71.24 बिलियन डॉलर पहुंच गया, जिससे ट्रेड डेफिसिट 34.68 बिलियन डॉलर हो गया जो तीन महीने का हाई था।

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रेमिटेंस: अर्थव्यवस्था का बड़ा सहारा

रेमिटेंस (विदेश से भेजा हुआ पैसा) भारत और खाड़ी के बीच एक और बड़ा कनेक्शन है। भारत में रेमिटेंस इनफ्लो 2010-11 के 55.6 बिलियन डॉलर से दोगुना होकर 2023-24 में 118.7 बिलियन डॉलर पहुंच गया। ये पैसे भारत के मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट का आधा हिस्सा कवर करते हैं और बाहरी झटकों से बचाते हैं।

अमेरिका सबसे बड़ा स्रोत है, लेकिन UAE दूसरा सबसे बड़ा है, जिसकी हिस्सेदारी 2023-24 में 19.2 प्रतिशत थी। UAE भारतीय माइग्रेंट वर्कर्स का बड़ा हब है, खासकर कंस्ट्रक्शन, हेल्थकेयर, हॉस्पिटैलिटी और टूरिज्म में।

महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्य इन फंड्स का बड़ा हिस्सा पाते हैं। केरल जैसे राज्यों के लिए तो खाड़ी रेमिटेंस लोकल इकोनॉमी का मुख्य आधार है। खाड़ी में नौकरियां या कमाई में कोई रुकावट आई, तो भारत में घरेलू आय प्रभावित होगी और विदेशी मुद्रा का ये जरूरी स्रोत कमजोर पड़ सकता है।

ये ईरान-इजरायल संघर्ष भारत के लिए दूर की बात नहीं है। ये एनर्जी सिक्योरिटी, ट्रेड स्टेबिलिटी और इलाके में लाखों भारतीयों की जीविका से सीधा जुड़ा है।

स्टॉक मार्केट में गिरावट का दौर

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल के दाम ऊपर जाने से भारतीय स्टॉक मार्केट में सोमवार को भारी गिरावट आई। बेंचमार्क इंडेक्स – सेंसेक्स और निफ्टी दोनों शुरुआती कारोबार में 3 प्रतिशत से ज्यादा नीचे चले गए।

30 शेयरों वाला BSE सेंसेक्स ओपनिंग बेल के बाद 2,743 पॉइंट्स गिरा और 78,543.73 के निचले स्तर पर पहुंचा, जबकि पिछला क्लोज 81,287 था। NSE निफ्टी50 भी 533 पॉइंट्स गिरकर 24,645.10 पर आ गया, जबकि पहले का क्लोज 25,178.65 था।

इस गिरावट से निवेशकों की दौलत में बड़ा नुकसान हुआ। 11:55 बजे तक के डेटा के मुताबिक, BSE पर लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट वैल्यू 456.4 लाख करोड़ रुपये रह गया, जो पिछले सेशन के 463.25 लाख करोड़ से कम है। यानी करीब 6.87 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1.62 प्रतिशत नीचे था, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 1.74 प्रतिशत गिरा।

सऊदी के एनर्जी सेक्टर में नई परेशानियां

चिंताएं और बढ़ीं जब सऊदी अरब के एनर्जी सेक्टर में नई रुकावट आई। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरामको ने पर्सियन गल्फ कोस्ट पर अपनी सबसे बड़ी रिफाइनरी रास तनूरा में ऑपरेशंस रोक दिए। ये ड्रोन स्ट्राइक की वजह से हुआ। इस रिफाइनरी की कैपेसिटी 550,000 बैरल प्रति दिन है। कंपनी ने संभावित डैमेज चेक करने के लिए इसे अस्थायी तौर पर बंद कर दिया है।

सऊदी अरब की ऑफिशियल न्यूज एजेंसी ने कहा कि प्लांट में सीमित आग लगी थी। ये आग दो ड्रोन्स को इंटरसेप्ट करने के बाद गिरे मलबे से लगी। बाद में आग पर काबू पा लिया गया।

रास तनूरा रिफाइनरी ट्रांसपोर्ट फ्यूल्स जैसे डीजल की महत्वपूर्ण सप्लायर है, खासकर यूरोप के कस्टमर्स के लिए। ये गैसोलीन भी थोड़ी मात्रा में बनाती है। रिफाइनरी के पास अरामको का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट टर्मिनल है, जहां स्टोरेज टैंक्स, पोर्ट बर्थ्स और ऑफशोर लोडिंग पॉइंट्स हैं। ये ग्लोबल एनर्जी सप्लाई का प्रमुख हब है।

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First Published - March 2, 2026 | 5:01 PM IST

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