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परमाणु ऊर्जा पर बड़ा दांव: शांति अधिनियम से खुले निजी निवेश के दरवाजे, लेकिन चुनौतियां बरकरार

परमाणु ऊर्जा से जुड़ी बातचीत में तथ्य, कल्पना, धारणा और संभावनाओं के सभी पहलू शामिल हैं। अब निजी क्षेत्र परमाणु ऊर्जा कंपनियों में 49 फीसदी तक इक्विटी निवेश कर सकता है

Last Updated- January 09, 2026 | 9:56 PM IST
Nuclear Power

शांति अ​धिनियम परमाणु ऊर्जा को एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा में ले आया है। परमाणु ऊर्जा से जुड़ी बातचीत में तथ्य, कल्पना, धारणा और संभावनाओं के सभी पहलू शामिल हैं। अब निजी क्षेत्र परमाणु ऊर्जा कंपनियों में 49 फीसदी तक इक्विटी निवेश कर सकता है। यह अ​धिनियम परमाणु दुर्घटनाओं के लिए नागरिक दायित्व को लगभग 3,000 करोड़ रुपये तक सीमित करता है, जिसके बाद सरकार अतिरिक्त सहायता प्रदान करेगी। अ​धिनियम भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम के एकाधिकार को समाप्त करता है और निजी क्षेत्र को कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करता है।

नीति का मुख्य जोर अब छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (एसएमआर) पर है। लक्ष्य यह है कि स्थानीय तकनीक से चलने वाले एसएमआर को वर्ष 2033 तक चालू कर दिया जाए और 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल कर ली जाए। अन्य तकनीकों के विकास के आधार पर अनुमान लगाया जाए तो 2047 तक 100 गीगावॉट कुल बिजली उत्पादन क्षमता का लगभग 5 फीसदी होगा।

इस समय परमाणु ऊर्जा की स्थापित क्षमता कुल ग्रिड क्षमता की लगभग 1.5 फीसदी है और इसका अधिकांश भाग लंबे समय तक निष्क्रिय रहता है। परमाणु ऊर्जा, ग्रिड में 7 गीगावॉट से भी कम का योगदान देती है, जबकि ग्रिड कुल 240 गीगावॉट बिजली उत्पन्न करता है। परमाणु परियोजनाओं में अक्सर समय और लागत में भारी वृद्धि देखी जाती है। वर्ष 2033 का एसएमआर लक्ष्य शायद पूरा न हो पाए और 2047 का लक्ष्य भी संभवतः हासिल करना असंभव है।

परमाणु ऊर्जा की लागत लगभग 6 रुपये प्रति यूनिट है, जो कोयले से चलने वाली ताप ऊर्जा की तुलना में लगभग 150 फीसदी अधिक और सौर ऊर्जा की तुलना में लगभग दोगुनी है। पैमाने के हिसाब से लागत में अंतर आ सकता है, जैसा कि सौर ऊर्जा के मामले में हुआ, जहां लागत में भारी गिरावट आई। लेकिन इन कीमतों पर कोई भी खुशी-खुशी परमाणु ऊर्जा का विकल्प नहीं चुनेगा।

नागरिक समाज परमाणु ऊर्जा के ​खिलाफ है। चेर्नोबिल, फूकूशीमा और थ्री माइल आइलैंड जैसी आपदाओं को देखते हुए, यह मानना ​​उचित है कि परमाणु परियोजनाओं का लगातार विरोध जारी रहेगा। कुडनकुलम जैसी परियोजनाओं के विरोध में भी प्रदर्शन हुए हैं। यहां तक ​​कि उस मामले में 9,000 कार्यकर्ताओं पर राजद्रोह का आरोप लगाने के बावजूद प्रदर्शन नहीं रुके। इसके अलावा, यदि कोई परमाणु दुर्घटना होती है, तो उसके बाद चीजों को दुरस्त करने के लिए 3,000 करोड़ रुपये से कई गुना अधिक राशि की आवश्यकता होगी।

तो, ऐसे में सवाल उठता है कि आ​खिर परमाणु ऊर्जा का विकल्प क्यों चुनें? एक कारण है कार्बन उत्सर्जन कम करना। परमाणु अभिक्रियाओं से कार्बन नहीं निकलता। एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण है विश्वसनीयता। एक बार परमाणु रिएक्टर चालू हो जाने पर यह सौर या पवन ऊर्जा संयंत्रों के विपरीत ताप संयंत्र की तरह लगातार चल सकता है।

दरअसल, कई मायनों में परमाणु ऊर्जा के संचालन के सिद्धांत ताप ऊर्जा के सिद्धांतों के समान हैं। दोनों ही मामलों में, कोयले, गैस या परमाणु प्रतिक्रियाओं द्वारा पानी को गर्म करके भाप उत्पन्न की जाती है। इस भाप का उपयोग टर्बाइन चलाने के लिए किया जाता है, और पंखे के ब्लेड की गतिज ऊर्जा को बिजली में परिवर्तित किया जाता है।

हालांकि, परमाणु अभिक्रियाओं से धुआं और उच्च कार्बन उत्सर्जन वाला अपशिष्ट उत्पन्न होने के बजाय विकिरण निकलता है। प्रयुक्त ईंंधन अत्यधिक विषैला भी हो सकता है। ईंधन का भंडारण और निपटान एक बड़ा प्रश्नचिह्न है, क्योंकि यह सदियों तक विषैला रह सकता है। इसके अलावा, कुछ ईंधनों को (प्रौद्योगिकी की विशिष्टताओं के आधार पर) हथियारों के निर्माण के लिए पुन: संसाधित किया जा सकता है, जिससे भू-राजनीतिक जटिलताएं उत्पन्न होती हैं। साथ ही, विकिरण के कारण किसी पुराने परमाणु रिएक्टर को बंद करना एक कष्टदायक और खर्चीला कार्य है।

यूरेनियम के विभिन्न रूपों का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। भारत उसके लिए आयात पर निर्भर है। जब तक थोरियम रिएक्टरों को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाने वाली कोई तकनीकी सफलता नहीं मिल जाती, तब तक भारत को ईंधन का आयात करना ही पड़ेगा। भारत के पास पर्याप्त मात्रा में थोरियम है। इसलिए भू-राजनीति प्रासंगिक है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि परमाणु ऊर्जा की लागत (ऊपर उल्लिखित लगभग 6 रुपये प्रति यूनिट) में ईंधन के पुनर्संसाधन, निपटान और सेवा पूरी कर चुके रिएक्टरों को बंद करने की लागत शामिल नहीं है। इनसे लागत में भारी वृद्धि हो सकती है।

आदर्श स्थिति में, भारत अगले दशक के भीतर अपनी स्वदेशी तकनीक से एसएमआर संयंत्रों का संचालन शुरू कर देगा। वर्ष 2047 तक इसकी 100 गीगावॉट की परिचालन परमाणु क्षमता होगी, जिससे कार्बन उत्सर्जन में मामूली कमी आएगी। अटकल ही लगाई जा सकती है कि कोई दुर्घटना नहीं होगी और न ही नागरिक समाज का कोई विरोध प्रदर्शन होगा।

एक ऐसी अप्रत्याशित घटना की उम्मीद है जो सब कुछ बदल सकती है। वह है परमाणु संलयन (न्यू​क्लियर फ्यूजन) के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता। सभी व्यावसायिक परमाणु ऊर्जा विखंडन (फिशन) से प्राप्त होती है, जिसमें भारी तत्त्वों के जटिल परमाणुओं को हल्के तत्त्वों में तोड़ा जाता है, और अतिरिक्त कणों को ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।

संलयन में सरल तत्त्वों को अधिक जटिल तत्त्वों में परिवर्तित किया जाता है, जिसमें अतिरिक्त कण ऊर्जा के रूप में मुक्त होते हैं। यह बहुत कम विकिरण उत्सर्जित करता है और साथ ही कार्बन उत्सर्जन बिल्कुल नहीं करता है। इससे अधिक ऊर्जा का उत्पादन भी होगा। लेकिन 75 वर्षों के अनुसंधान और विकास के बावजूद अभी तक कोई भी यह सिद्ध नहीं कर पाया है कि संलयन व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य है। संलयन में एक अभूतपूर्व प्रगति से दुनिया की ऊर्जा समस्याएं अचानक हल हो जाएंगी, और यदि संलयन में कोई अभूतपूर्व प्रगति होती है, तो शांति अ​धिनियम के बाद भारत नियामकीय दृष्टि से इसका लाभ उठाने के लिए बेहतर स्थिति में होगा।

First Published - January 9, 2026 | 9:56 PM IST

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