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महंगाई का आधार वर्ष बदला, ग्रामीण क्षेत्रों में हो सकेगा और सटीक आकलन

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Inflation base year: लगभग तीन दशक पहले नवंबर 1995 में इन दोनों सूचकांकों के लिए 1986-87 को आधार वर्ष के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया गया था।

Last Updated- August 08, 2025 | 10:01 AM IST
Retail Inflation
संशोधित श्रृंखला, अब 34 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को कवर करता है जबकि पुराने में सिर्फ 20 राज्य थे। (प्रतीकात्मक फोटो)

ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की महंगाई को सही तरीके से मापने के लिए, श्रम ब्यूरो ने कृषि और ग्रामीण मजदूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई-एएल/आरएल) का आधार वर्ष 1986-87 से बदलकर 2019 कर दिया है। दोनों सूचकांकों का उपयोग केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कृषि और ग्रामीण मजदूरों (जो कृषि या गैर-कृषि दोनों काम करते हैं) के लिए न्यूनतम मजदूरी तय करने के लिए किया जाता है। साथ ही, ग्रामीण मजदूरों के लिए सीपीआई-एलएल का उपयोग सरकार के प्रमुख ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत मजदूरी तय करने के लिए भी होता है।

नए सूचकांक से जारी हुए जून के आंकड़े 

नए सूचकांक के तहत जून महीने के लिए जारी किए गए पहले आंकड़ों के मुताबिक – कृषि मजदूरों के लिए महंगाई दर1.42 प्रतिशत और ग्रामीण मजदूरों के लिए 1.73 प्रतिशत रही।

लगभग तीन दशक पहले नवंबर 1995 में इन दोनों सूचकांकों के लिए 1986-87 को आधार वर्ष के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया गया था। श्रम ब्यूरो ने एक बयान में कहा, ‘संशोधित श्रृंखला ने सूचकांकों को और अधिक मजबूत बनाने के लिए उनके दायरे और कवरेज में काफी सुधार किया है और पद्धति से जुड़े बदलावों को शामिल किया है।’

संशोधित श्रृंखला, अब 34 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को कवर करता है जबकि पुराने में सिर्फ 20 राज्य थे। इसमें 787 गांवों से आंकड़े जुटाए जाते हैं जबकि पुरानी श्रृंखला में 600 गांवों से आंकड़े लिए जाते थे। साथ ही, इसमें 150-200 वस्तुओं को शामिल किया गया है, जबकि पुरानी श्रृंखला में 65-106 वस्तुएं थीं। नई श्रृंखला में घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (एचसीईएस) के 68वें दौर के उपभोग रुझान आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे 2011-12 में जारी किया गया था।

नए डेटा से 10% कम हुआ खाने-पीने वस्तुओं का वेटेज

व्यय डेटा के नए डेटा के उपयोग के कारण, कृषि और ग्रामीण दोनों मजदूरों के लिए खाद्य वस्तुओं का भार अब लगभग 10 प्रतिशत कम हो गया है।
नई श्रृंखला में, कृषि मजदूरों के लिए खाद्य वस्तुओं की हिस्सेदारी पहले के 69.2 प्रतिशत से घटकर 57.8 प्रतिशत हो गई है। इसी तरह, ग्रामीण मजदूरों के लिए खाद्य वस्तुओं का हिस्सा, मौजूदा श्रृंखला के 66.7 प्रतिशत से घटकर 56.6 प्रतिशत हो गया है।

अनाज और उससे बनी चीजों का वेटेज हुआ कम

खाद्य वस्तुओं में बड़े बदलावों के तहत अनाज और उससे बनी चीजों का भार काफी कम हुआ है और यह कृषि मजदूरों के लिए 40.9 प्रतिशत से घटकर 12.9 प्रतिशत और ग्रामीण मजदूरों के लिए 38.15 प्रतिशत से घटकर 12.07 प्रतिशत हो गया है।

इस बीच, ‘मांस और मछली’ जैसी प्रोटीन वाली चीजों का हिस्सा, कृषि मजदूरों के लिए 3.1 प्रतिशत से बढ़कर 5.87 प्रतिशत और ग्रामीण मजदूरों के लिए 3.3 प्रतिशत से बढ़कर 5.52 प्रतिशत हो गया है।

दूसरी ओर, गैर-खाद्य वस्तुओं में, स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च का हिस्सा कृषि मजदूरों के लिए 4.38 प्रतिशत से बढ़कर 61.9 प्रतिशत और ग्रामीण मजदूरों के लिए 4.23 प्रतिशत से बढ़कर 6.24 प्रतिशत हो गया है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि ये दोनों सूचकांक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सामान्य हेडलाइन खुदरा मुद्रास्फीति का आंकड़ा ग्रामीण आबादी के एक बड़े हिस्से का सही प्रतिनिधित्व नहीं करता है, क्योंकि उनकी उपभोग के रुझान अलग होते हैं।

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First Published - August 8, 2025 | 9:05 AM IST

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