ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 2026 में अधिक तेजी नहीं दिखाएंगी। रैबोबैंक इंटरनेशनल की हालिया रिपोर्ट में ऐसा अनुमान जताया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, पहली तिमाही में ब्रेंट क्रूड ऑयल 60 डॉलर प्रति बैरल रहेगा, फिर दूसरी और तीसरी तिमाही में औसतन 57 डॉलर और चौथी तिमाही में थोड़ा सुधार होकर 59 डॉलर तक पहुंचेगा।
रैबोबैंक के सीनियर एनर्जी स्ट्रैटेजिस्ट जो डिलौरा और फ्लोरेंस श्मिट ने इस रिपोर्ट में लिखा, “हमारा WTI क्रूड का अनुमान है कि कीमतें पहली तिमाही में 56.5 डॉलर तक गिरेंगी, दूसरी-तीसरी तिमाही में औसतन 53.5 डॉलर रहेंगी और चौथी तिमाही में 55 डॉलर तक पहुंचेंगी।”
पिछले एक साल में भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी व्यापार शुल्क के बावजूद ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 17 फीसदी गिरकर 61.5 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गई है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक कीमतों पर दबाव का मुख्य कारण सप्लाई और डिमांड के बीच बढ़ता असंतुलन है।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) का अनुमान है कि 2026 में रिकॉर्ड 38 लाख बैरल प्रतिदिन का सरप्लस रहेगा, जो 2020 के 24 लाख बैरल प्रतिदिन के ओवरसप्लाई से भी ज्यादा है। कई दूसरे एक्सपर्ट भी मान रहे हैं कि 2026 में ओवरसप्लाई के डर से ब्रेंट की औसत कीमत 55 डॉलर प्रति बैरल या उससे नीचे रह सकती है।
यहां 2026 में क्रूड ऑयल की कीमतों को प्रभावित करने वाले कुछ बड़े कारणों की चर्चा की गई है।
डिलौरा और श्मिट को उम्मीद है कि 2026 में दोनों देशों के बीच युद्धविराम या शांति समझौते का ऐलान हो सकता है। इससे रूस पर लगे प्रतिबंध धीरे-धीरे हटेंगे और रूसी तेल कंपनियों का निर्यात फिर से सामान्य हो जाएगा।
रिपोर्ट में कहा गया, “इससे फंसे हुए रूसी बैरल आसानी से चीन या भारत जैसे बड़े बाजार में पहुंच सकेंगे। अब तक जो जहाज से जहाज ट्रांसफर, शेल कंपनियां और डार्क इन्वेंट्री में तेल मिलाने का खेल चल रहा था, वो बंद हो जाएगा। साथ ही, यूक्रेन के रूसी रिफाइनरी और टर्मिनल पर हमले रुक जाएंगे, जिससे रूस का तेल और प्रोडक्ट बिना रुकावट के निकल सकेगा।”
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रैबोबैंक के मुताबिक दक्षिण अमेरिकी देश जैसे गुयाना और ब्राजील अपनी प्रोडक्शन लगातार बढ़ा रहे हैं, जो बाजार में ‘अनचाही सप्लाई’ का एक और स्रोत बनेगा। हालांकि अमेरिकी प्रोडक्शन में गिरावट से इसकी कुछ भरपाई हो जाएगी।
EIA का अनुमान है कि 2025 में अमेरिका का औसत प्रोडक्शन 1.361 करोड़ बैरल प्रतिदिन रहेगा, जो 2026 में घटकर 1.353 करोड़ बैरल प्रतिदिन हो जाएगा यानी 80 हजार बैरल प्रतिदिन की कमी।
रैबोबैंक ने कहा, “हमारा अनुमान इससे भी ज्यादा गिरावट का है। कम कीमतों और स्टील टैरिफ से ड्रिलिंग की ब्रेकईवन लागत बढ़ने से 2026 में 1.8 लाख बैरल और 2027 में 2 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी आएगी।”
ओवरसप्लाई के बीच कीमतें सुस्त रहने का सबसे बड़ा कारण मांग का धीमा होना है। डीजल, जेट फ्यूल और हैवी मरीन फ्यूल की मांग अभी भी बढ़ रही है, लेकिन पिछले बीस साल की तुलना में बहुत धीमी रफ।
रिपोर्ट में कहा गया, “गिरावट मुख्य रूप से पेट्रोल की मांग में है। हमारा अनुमान है कि 2028 तक पेट्रोल की मांग पीक पर पहुंच जाएगी। इसका बड़ा कारण चीन में बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल (BEV) की बिक्री का जबरदस्त उछाल और यूरोप में भी इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ बढ़ता रुझान है।”
रैबोबैंक के मुताबिक कम कीमतों पर OPEC+ प्रोडक्शन कट या रिफाइंड प्रोडक्ट्स मार्केट के जरिए जवाब देगा। नवंबर 2025 में ही आठ OPEC सदस्य देशों ने 2026 की पहली तिमाही के लिए प्रोडक्शन बढ़ाने की योजना को रोक दिया था, क्योंकि बाजार में सरप्लस के संकेत दिख रहे थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी अरब ने पिछले दशक में कई बार दिखाया है कि वह अपने सहयोगियों को साथ लेकर कीमतों पर कंट्रोल करने के लिए कटौती करता है।
डिलौरा और श्मिट ने लिखा, “प्रोडक्शन कट करने से सऊदी अरब, UAE, इराक और कुवैत को स्पेयर कैपेसिटी बनाए रखने और नए फील्ड डेवलप करने का खर्चा भी उठाना नहीं पड़ता। कम स्पेयर कैपेसिटी से लंबे समय तक बाजार टाइट रहता है और कीमतें ऊपर रहती हैं। मांग जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उसमें नई सप्लाई को लोहे के हाथों से कंट्रोल करना ही कीमतें अधिक रखने का तरीका है।”