भारत के लिए समृद्धि का रास्ता मुक्त बाजार वाली अर्थव्यवस्था बनने से खुलता है। ऐसी अर्थव्यवस्था जो दुनिया के साथ गहराई से जुड़ी हो। फिलहाल तो सीमाओं पर प्रतिबंधों की भूलभुलैया है, जो इस जुड़ाव में बाधा डालती है। भारतीय राज्य ने कई हस्तक्षेप निर्मित किए हैं। उदाहरण के लिए पूंजी नियंत्रण, सीमा शुल्क प्रक्रियाएं, क्षेत्र-विशिष्ट निषेध, भुगतान में समस्याएं, प्रक्रियात्मक बोझ आदि जो उन लोगों के हाथ बांध देते हैं जो सीमा पार अवसर तलाशने की कोशिश करते हैं। ये प्रतिबंध भले ही नियंत्रण की इच्छा या अस्थिरता के डर से पैदा हुए हों, लेकिन दुनिया के साथ लेन-देन को कठिन बनाकर हम अपने ही हितों को नुकसान पहुंचाते हैं।
यह देखना उल्लेखनीय है कि इन प्रतिबंधों को हटाने का कितना प्रभावशाली असर हो सकता है। जब हम एक बाधा को भी हटाते हैं, तो आर्थिक प्रतिक्रिया अक्सर तेज और अहम हो जाती है। 2025 के आर्थिक आंकड़ों में दिखी उल्लेखनीय भिन्नता इसका एक अध्ययन प्रस्तुत करती है। भारत के लिए 2025 का व्यापक आर्थिक परिदृश्य मिश्रित रहा। अक्टूबर 2025 तक शुद्ध एफडीआई प्रवाह अच्छे नहीं दिख रहे थे। वैश्विक विनिर्माण कंपनियां, ‘चीन+1’ की चर्चा के बावजूद, भारत में दीर्घकालिक प्रतिबद्धताओं को लेकर सतर्कता बरत रही थीं। व्यापार करने में आने वाली दिक्कतें अब भी एक बड़ा अवरोध बनी हुई हैं।
एक ओर जहां कारखानों को प्रतिकूल हालात का सामना करना पड़ा वहीं भारतीय वित्त को वैश्विक रणनीतिक पूंजी की नजर में मजबूती हासिल हुई है। वर्ष2025 में भारतीय बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) बढ़ा। कैलेंडर वर्ष में करीब 11 अरब अमेरिकी डॉलर के सौदे हुए। भारत में शुद्ध एफडीआई एक दशक से अधिक समय से ठहरा हुआ है। इसके बावजूद कुछ नियमों में बदलाव के कारण एक कैलेंडर वर्ष में वित्तीय कंपनियों में बड़ी मात्रा में पूंजी देश में आई। यह पूंजी खाते के नियंत्रण के हटने की शक्ति है। केवल एक क्षेत्र में देखा गया 11 अरब डॉलर का यह प्रवाह भारत में पूरे 2024-25 के दौरान आए शुद्ध एफडीआई (29 अरब डॉलर) की तुलना में बहुत अच्छा है।
नीति निर्माताओं ने यह मानना शुरू किया कि घरेलू बैंकिंग प्रणाली को बाहरी पूंजी की आवश्यकता है, जो घटती हुई घरेलू वित्तीय बचत का सामना कर रही है। 20 जनवरी 2025 को रिजर्व बैंक ने भारत में विदेशी निवेश पर मास्टर डायरेक्शन जारी किया। इस दस्तावेज ने विदेशी प्रवेश के मानदंडों को सरल बनाया और उन अस्पष्टताओं को कम किया जो पहले सीमा पार लेन-देन में बाधा डालती थीं।
नए दिशानिर्देशों ने विदेशी स्वामित्व या नियंत्रण वाली कंपनियों द्वारा डाउनस्ट्रीम निवेश पर स्पष्टता प्रदान की, इक्विटी स्वैप और डेफर्ड कंसिडरेशन मेकनिज्म यानी खरीद मूल्य के कुछ हिस्से को बाद में देने के तंत्र को सुव्यवस्थित किया। शैडो बैंकिंग (ऐसी सेवाएं जो बैंकों जैसी होती हैं लेकिन जिन्हें बैंकों जैसे सख्त नियमन का सामना नहीं करना होता) क्षेत्र के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण यह था कि नियामक ने भारतीय संस्थाओं को पंजीकरण से पहले न्यूनतम शुद्ध स्वामित्व निधि आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु विदेशी निवेश प्राप्त करने की अनुमति दी।
इससे वह प्रक्रियात्मक बाधा दूर हुई जिसमें कंपनियों को लाइसेंस पाने के लिए पूंजी चाहिए होती थी, लेकिन पूंजी पाने के लिए लाइसेंस चाहिए होता था।इसके अतिरिक्त, नियंत्रण और लाभकारी स्वामित्व की परिभाषाओं के सामंजस्य ने रणनीतिक निवेशकों के लिए अनुपालन को आसान बनाया। विनियमों के पाठ से परे, पर्यवेक्षण के दृष्टिकोण में एक स्पष्ट बदलाव देखा गया। रिजर्व बैंक द्वारा बहुल हिस्सेदारी को मंजूरी देना जैसे एमिरेट्स एनबीडी द्वारा आरबीएल बैंक का अधिग्रहण, एक नए व्यवहारिक दृष्टिकोण का संकेत देता है।
दुनिया ने इन बाधाओं को हटाने पर दीर्घकालिक रणनीतिक एकीकरण से जुड़ी बड़ी लेन-देन श्रृंखला के साथ प्रतिक्रिया दी। 23 सितंबर को एसएमबीसी ने येस बैंक में 24 फीसदी हिस्सेदारी के लिए 1.6 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश किया। 2 अक्टूबर को आईएचसी ने सम्मान कैपिटल (पूर्व में इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस) में 43.5 फीसदी हिस्सेदारी 1 अरब डॉलर में अधिग्रहित की। 18 अक्टूबर को एमिरेट्स एनबीडी ने आरबीएल बैंक में 60 फीसदी नियंत्रक हिस्सेदारी के लिए 3 अरब डॉलर का भुगतान किया। 24 अक्टूबर को ब्लैकस्टोन ने फेडरल बैंक में 10 फीसदी हिस्सेदारी के लिए 0.7 अरब डॉलर का निवेश किया। अंत में, 22 दिसंबर को एमयूएफजी ने प्राथमिक निवेश के माध्यम से श्रीराम फाइनेंस में 20 फीसदी हिस्सेदारी के लिए 4.4 अरब डॉलर की राशि का इस्तेमाल किया। इन लेनदेन के समूह में हम देख रहे हैं कि महत्त्वपूर्ण वैश्विक वित्तीय कंपनियां भारतीय वित्तीय कंपनियों को सुधारने में शामिल हो रही हैं।
वित्त अर्थव्यवस्था का मस्तिष्क होता है। यह उसके सबसे उत्पादक इस्तेमाल के लिए संसाधन आवंटित करता है। ये लेनदेन भारतीय वित्तीय व्यवस्था को स्वस्थ बनाते हैं। सीमा पर गतिरोध समाप्त करके हमने मस्तिष्क को यह इजाजत दी है कि वह अपनी प्रोसेसिंग की क्षमता में सुधार करे। प्राप्तकर्ता वित्तीय कंपनियों को वृद्धि पूंजी, बेहतर शासन, बेहतर प्रक्रियाओं और सीमा पार वित्तीय सेवाओं के बेहतर उत्पादन से फायदा मिलता है।
ये लेनदेन भारतीय परिदृश्य में मजबूत कारोबारियों को उतारकर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव का एक चक्र पैदा करते हैं। नई ऊर्जा से भरी ये कंपनियां, सस्ती पूंजी और बेहतर तकनीक से लैस होकर, सार्वजनिक क्षेत्र की पुरानी संस्थाओं और कमजोर निजी कंपनियों के खिलाफ आक्रामक रूप से प्रतिस्पर्धा करेंगी। यह प्रतिस्पर्धा पूरे उद्योग को अधिक कुशल बनने के लिए मजबूर करती है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुद्ध रूप से सकारात्मक है। शेयर बाजार ने भी अपनी स्वीकृति का संकेत दिया है। लेनदेन के बाद के महीने में चार लक्षित कंपनियों के लिए औसत अतिरिक्त रिटर्न (निफ्टी की तुलना में) 16.9 फीसदी रहा।
कहानी इन पांच लेनदेन के साथ समाप्त होती नहीं दिखती। कुछ निजी वित्तीय कंपनियां शायद माहौल का मूल्यांकन कर सकती हैं। इस प्रकार वे अधिक कठिन प्रतिस्पर्धी माहौल के उभरने की संभावना को भांप सकती हैं और इक्विटी पूंजी जुटाने के प्रति अधिक ग्रहणशील हो सकती हैं। कुछ वैश्विक खिलाड़ी भारतीय पूंजी खाते के नियंत्रण हटाने से खुली संभावनाओं को देख सकते हैं। इसलिए, भविष्य में हमें ऐसे और एफडीआई लेनदेन देखने को मिल सकते हैं।
भारत में हाल के वर्षों में घरेलू बचत की कमजोरी और पूंजी खाते के नियंत्रण हटाने की आवश्यकता के बीच एक संबंध है। जैसा कि इसी समाचार पत्र में कुछ माह पहले छपे एक लेख में बताया गया था कि हाल के वर्षों में घरेलू बचत का प्रदर्शन कमजोर रहा है। वर्ष 2021 में जीडीपी के 22.7 फीसदी से घटकर 2024 में यह 18.1 फीसदी रह गया। यदि प्रतिबंध नहीं हटाए जाते, तो यह घरेलू निवेश को बाधित करेगा, क्योंकि सस्ती और प्रचुर विदेशी पूंजी तक पहुंच नहीं मिल पाएगी। 2025 में केवल एक सीमित समूह की कंपनियों में 11 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रवाह यह दर्शाता है कि जब हम अपनी ओर से प्रतिबंध हटाते हैं, तो विदेशी बचत उपलब्ध होती है।
साल 2025 की घटनाएं बेहतर ब्योरा हैं। हमने कुछ प्रतिबंध हटाए और अरबों डॉलर की राशि हमारी वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आगे आई। यह केवल एक क्षेत्र है। ऐसे सैकड़ों नियम हैं जो सीमा पार गतिविधियों को बाधित कर रहे हैं। यह हमारे हित में है कि हम इन दिक्कतों को पहचानें और दूर करें। जब ये बाधाएं कम हो जाएंगी तब महत्त्वपूर्ण लाभ सामने आएंगे।
(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं)