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अमेरिका-यूरोप व्यापार समझौतों पर छाए बादल, भारत संभावित चुनौतियों के लिए तैयार

दोनों ही मामलों में भारत को सबसे बुरे हालात के लिए तैयार रहने की आवश्यकता है। बता रहे हैं आर जगन्नाथन

Last Updated- January 08, 2026 | 9:51 PM IST
Trade Deal
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

भारतीय अधिकारी समय-समय पर भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते और यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते की संभावना जताते रहते हैं। विदेश मंत्रालय की एक ब्रीफिंग में कुछ महीने पहले कहा गया था कि दोनों समझौतों की दिशा में इस इरादे से आगे बढ़ा जा रहा है कि निष्पक्ष, संतुलित और साझा लाभ वाला समझौता किया जा सके।

हाल ही में ओमान और न्यूजीलैंड के साथ शीघ्रता से समझौते किए जाने के बाद शायद यह धारणा बना कि अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ भी जल्दी समझौते हो सकते हैं। खासकर यूरोपीय संघ के साथ क्योंकि यूरोपीय आयोग की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के प्रेसिडेंट एंटोनियो कोस्टा गणतंत्र दिवस पर वि​शिष्ट अति​थि के तौर पर नई दिल्ली में होंगे। उनका यहां होना इस समझौते की शुरुआत का माकूल वक्त हो सकता है।

कुछ दिन पहले अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से मुलाकात की ताकि व्यापार समझौते को जल्द अंजाम दिया जा सके। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने कहा कि समझौता लगभग हो ही गया है और वह देरी से हैरान हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर समझौता इस वित्त वर्ष के अंत तक पूरा नहीं हुआ तो उन्हें आश्चर्य होगा।

आज अमेरिका के साथ समझौते को लेकर आशान्वित होने की वजहें कम हैं और इसका कारण हैं अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत के लिए बार-बार लक्ष्य बदले हैं। शुरुआत इस मांग से हुई कि भारत अमेरिका से अधिक खरीद कर व्यापार घाटे को कम करे। फिर यह पाकिस्तान के साथ पिछले मई में युद्धविराम कराने में उनकी कथित भूमिका को स्वीकार करने पर आ गया। उसके बाद यह रूसी तेल पर केंद्रित हो गया और दो दिन पहले उन्होंने कहा कि यह सब केवल भारत द्वारा उन्हें खुश करने से संबंधित है।

भारत, अमेरिका के साथ एक अच्छा व्यापार समझौता करना चाहता है, लेकिन जिस समझौते पर हमें बातचीत करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, वह व्हाइट हाउस में बैठे एक आत्ममुग्ध व्यक्ति के साथ एक संदिग्ध सौदा है। अमेरिका यदि अपनी संवैधानिक समझ में लौटे और ट्रंप की राजनीतिक किस्मत पलटने लगे या आने वाले महीनों में किसी दिन उनका मिजाज बदल जाए तो व्यापार समझौते की अहमियत उस कागज के बराबर भी नहीं होगी जिस पर वह लिखा गया है।

संभव है कि ये समझौते जल्दी हों या शायद इनमें समय लगे। परंतु देश के नीति निर्माताओं और बाजार का यही मानना है कि इनके पूरा होने में समय लगेगा। अब वक्त आ गया है कि हम बुरे से बुरे परिदृश्य की तैयारी रखें। ट्रंप के साथ किया गया व्यापार समझौता शायद उनके ही देश में न्यायिक परीक्षा पर खरा न उतरे। अमेरिका और यूरोपीय संघ दोनों व्यापक आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक उथलपुथल से गुजर रहे हैं और अलग-अलग विचारधाराओं की लॉबी एक दूसरे के विरुद्ध काम कर रही हैं।

अमेरिका में, ट्रंप के चुनाव के बाद कुलीन वर्ग की सहमति का टूटना और 2025 में ज्यादातर समय उनका अस्थिर व्यवहार राजनीतिक सहमति को कठिन बना देता है। उनका अपना ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) समर्थक आधार यथार्थवादियों और कट्टरपंथी दक्षिणपंथी विचारधारकों के बीच बंटा हुआ है, जो भारत को किसी भी प्रकार की रियायत दिए जाने के पक्ष में नहीं हैं, भले ही बड़ी तकनीकी कंपनियां भारत की ओर से विशेषकर एच-1बी वीजा और सेवाओं को लेकर दबाव डाल रही हों। अक्टूबर में अमेरिकी राजदूत के रूप में पुष्टि होने के बावजूद, सर्जियो गोर ने अभी तक भारत में अपना कार्यभार नहीं संभाला है।

ट्रंप प्रशासन एपस्टीन फाइल्स के जारी होने के राजनीतिक परिणामों से जूझ रहा है। सेक्स ट्रैफिकर जेफ्री एपस्टीन के साथ ट्रंप के कथित करीबी संबंधों के कुछ विवरण उजागर हुए। एपस्टीन महिलाओं और युवा लड़कियों की सेक्स-तस्करी के आरोपों पर मुकदमे की प्रतीक्षा कर रहा था। उसने 2019 में जेल में कथित रूप से आत्महत्या कर ली। एपस्टीन फाइलें केवल ट्रंप से ही संबंधित नहीं हैं, बल्कि उन पूरे राजनेताओं और व्यापारियों की श्रेणी से जुड़ी हैं जो अभिजात वर्ग का हिस्सा हैं। अमेरिकी ‘डीप स्टेट’ को जनता का ध्यान एपस्टीन पर अत्यधिक केंद्रित होने से हटाने के लिए व्यापार और अन्य बाहरी संघर्षों का विचलन चाहिए। यही कारण है कि ट्रंप का ध्यान ग्रीनलैंड पर और वेनेजुएला पर हमलों पर रहा। अमेरिका ने एक डकैत की तरह व्यवहार किया और वेनेजुएला के मौजूदा राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का अपहरण कर उन्हें अमेरिका भेज दिया।

दूसरी तरफ यूरोप, यूक्रेन मामले में खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है। उसने हाल ही में रूसी परिसंपत्तियों को स्थायी रूप से फ्रीज करने का निर्णय लिया, जिससे उसकी वित्तीय प्रणाली में अंतरराष्ट्रीय विश्वास को आघात पहुंचा। यूरोपीय संघ गहराई से विभाजित है। एक ओर वे देश हैं जो यूक्रेन को पूरी तरह समर्थन देना चाहते हैं, और दूसरी ओर वे हैं जो नहीं चाहते कि युद्ध अंतहीन रूप से चलता रहे और विकास तथा रोजगार के लिए आवश्यक संसाधनों को निचोड़ता रहे।

अब यूरोप को जब ट्रंप के उपहास और ग्रीनलैंड को लेकर उनकी धमकियों का सामना करना पड़ रहा है तो यूरोप यूक्रेन को लेकर और अधिक अस्थिर प्रतीत हो रहा है। ट्रंप व्लादिमीर पुतिन के साथ समझौता करने और विफल रहने पर भारत को दंडित करने की कोशिश कर रहे हैं। नाटो और यूरोपीय संघ दोनों का भविष्य अब कुछ संदेह में है।

दिसंबर में, यूरोपीय संघ लैटिन अमेरिकी मर्कोसुर ब्लॉक के साथ अपना सबसे बड़ा व्यापार समझौता करने वाला था, लेकिन इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने अंतिम क्षण में अड़ंगा डाल दिया, जिसके कारण यह समझौता एक महीने के लिए स्थगित हो गया। यदि यह समझौता हस्ताक्षरित होता है, तो यह दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक ब्लॉकों में से एक का निर्माण करेगा। यह यूरोपीय संघ को मर्कोसुर से जोड़ेगा, जिसमें ब्राजील, अर्जेंटीना, उरुग्वे और पराग्वे शामिल हैं।

पिछले 20 वर्षों में रुक-रुक कर हुई बातचीत से तैयार यह समझौता अभी भी अधर में लटका हुआ है और यूरोपीय संघ के आंतरिक मतभेदों का बंधक बना हुआ है। फ्रांस, पोलैंड और इटली के किसान इस समझौते के मुख्य अवरोधक बताए जाते हैं, हालांकि कहा जाता है कि मेलोनी ने ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डी सिल्वा को आश्वासन दिया है कि जैसे ही वह अपने किसानों को राजी कर लेंगी, हस्ताक्षर कर देंगी।

वह अपने किसानों के लिए यूरोपीय संघ से ज्यादा सहयोग हासिल करने की कोशिश भी कर सकती हैं ताकि अपना वीटो हटा सकें। लेकिन कमजोर वृद्धि के माहौल में यूरोपीय संघ की वित्तीय स्थिति भी दबाव में है। यही वह अमेरिकी और यूरोपीय संघ का संदर्भ है जिसमें भारत व्यापार समझौता करने की कोशिश कर रहा है। यह मान लेना उचित नहीं होगा कि यूरोपीय संघ सामूहिक रूप से समझौते के लिए अमेरिका से अधिक उत्सुक है।

दोनों ही आंतरिक झगड़ों और विरोध से जूझ रहे हैं। वे भीतर ही राजनीतिक लड़ाइयां लड़ रहे हैं, और जैसे-जैसे यूरोपीय संघ में दक्षिणपंथी राजनीति मजबूत होती जा रही है, वर्तमान सीमित राजनीतिक सहमति भी कमजोर दिखने लगेगी।

भारत के लिए यह बुद्धिमानी होगी कि वह खराब हालात को देखते हुए योजना बनाए। 2026 की शुरुआत में बड़े व्यापारिक समझौतों की भविष्यवाणी धुंधली दिखाई देती है।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published - January 8, 2026 | 9:47 PM IST

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