चालू वित्त वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का पहला अग्रिम अनुमान राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा बुधवार को जारी किया गया। वह दिखाता है कि 2025-26 में देश की अर्थव्यवस्था रियल यानी वास्तविक संदर्भों में 7.4 फीसदी की दर से वृद्धि हासिल कर सकती है। यह बहुत हद तक बाजार के अनुमानों के अनुरूप ही है। भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वर्ष के लिए 7.3 फीसदी की वृद्धि दर का अनुमान जताया था। चूंकि पहली छमाही में अर्थव्यवस्था 8 फीसदी की दर से बढ़ी इसलिए अनुमान है कि दूसरी छमाही में वृद्धि दर थोड़ी कम रह सकती है।
इसके बावजूद, कठिन हालात में 7.4 फीसदी की अनुमानित वृद्धि प्रभावशाली है और यह गत वर्ष की 6.5 फीसदी की वृद्धि से काफी अधिक भी है। उच्च वास्तविक वृद्धि दर आंशिक रूप से कम मुद्रास्फीति दर की वजह से भी है। वर्ष के लिए नॉमिनल वृद्धि की 8 फीसदी की दर अनुमानित है। पहले अग्रिम अनुमान में नॉमिनल वृद्धि पर नजर रहती है क्योंकि यह बजट के लिए गुणाभाग का आधार बनती है।
वर्तमान मूल्यों के विशुद्ध संदर्भ में देखें तो अर्थव्यवस्था के 357.14 लाख करोड़ रुपये के आकार तक पहुंचने का अनुमान है, जो 2025-26 के बजट में अनुमानित स्तर से थोड़ा अधिक है। हालांकि राजस्व वृद्धि कमजोर रहने के कारण राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.4 फीसदी पर नियंत्रित करना अभी भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। चूंकि सरकार अगले वित्तीय वर्ष से ऋण-जीडीपी अनुपात को राजकोषीय लक्ष्य के रूप में अपनाने वाली है, इसलिए अब नॉमिनल वृद्धि पर अधिक ध्यान आकर्षित होगा।
आने वाली तिमाहियों में मुद्रास्फीति दर अपने वर्तमान निम्न स्तर से ऊपर जाने की उम्मीद है, जो नॉमिनल वृद्धि में सुधार करने में मदद करेगी। यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय अगले महीने संशोधित आधार के साथ नई जीडीपी श्रृंखला जारी करेगा। बताया जा रहा है कि यह वर्षों से अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों द्वारा वर्तमान श्रृंखला को लेकर जताई जा रही चिंताओं का समाधान करेगा। सांख्यिकी विभाग उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के लिए भी नई श्रृंखला जारी करेगा। इस प्रकार, समग्र रूप से भारत में आर्थिक गतिविधियों और कीमतों को मापने के तरीके में महत्त्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं।
यद्यपि आधार वर्ष में बदलाव और जीडीपी मापने की पद्धति में परिवर्तन के बावजूद यह मानना कठिन नहीं है कि अगला वित्त वर्ष अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सरकार आने वाले वर्ष का प्रबंधन कैसे करना चाहती है यह कुछ सप्ताह बाद आने वाले बजट से स्पष्ट हो जाएगा। चुनौतियां मुख्यतः बाहरी मोर्चे से उत्पन्न हो रही हैं। महीनों की वार्ताओं के बावजूद, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता अनिश्चित बना हुआ है। बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि परस्पर लाभकारी समझौता कितनी जल्दी हो पाता है।
भारत यूरोपीय संघ के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते के शीघ्र संपन्न की उम्मीद कर रहा है। ये दोनों समझौते अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। यदि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में देरी होती है तो भुगतान संतुलन के मोर्चे पर चुनौतियां उभर सकती हैं, जो रुपये पर दबाव के रूप में नजर भी आ रही हैं। यदि अमेरिका को निर्यात करने में भारत को ज्यादा नुकसान होता है, तो यह प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो दोनों प्रकार के विदेशी निवेश को प्रभावित कर सकता है। उदाहरण के लिए, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 2025 में 18 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के भारतीय शेयर बेचे।
हाल के वर्षों में उच्च सरकारी पूंजीगत व्यय वृद्धि को आगे ले जाने वाले कारकों में से एक रहा है। यह माना जाता है कि ऋण को आधार या लक्ष्य के रूप में अपनाने से घाटे के आकार को लेकर अधिक लचीलापन हासिल होगा लेकिन यह भी देखा जाना है कि पूंजीगत व्यय का स्तर और उसकी वृद्धि बरकरार रह सकती है या नहीं। इतना ही नहीं, घरेलू मोर्चे पर सुधारों पर नए सिरे से जोर देने के संकेत हैं। अगले वित्त वर्ष में वृद्धि की गति बनाए रखने के लिए अधिक प्रयासों की आवश्यकता होगी।