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तकनीकी तंत्र: विवादों से भरा राजनीतिक दलों का चंदा

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सवाल यह है कि क्या ‘चंदा देने में आसानी’ से ‘कारोबार सुगमता’ जैसी स्थिति बनती है? चंदे को ब्लैकमेल और धमकी देकर ‘प्रोत्साहित’ किया जाता है तो क्या रकम की मात्रा बढ़ जाती है?

Last Updated- March 28, 2024 | 9:44 PM IST
Bond

वर्ष 1798 में लॉर्ड कॉर्नवालिस को आयरलैंड का लॉर्ड लेफ्टिनेंट नियुक्त किया गया था। भारत के गवर्नर-जनरल के रूप में अपने पूर्व कार्यकाल के दौरान कॉर्नवालिस ने शानदार वित्तीय कुशलता का प्रदर्शन करते हुए स्थायी बंदोबस्त अधिनियम की अवधारणा पेश की थी। इस अधिनियम ने 150 से अधिक वर्षों तक जमींदारों के माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी और इसके उत्तराधिकारी, ब्रितानी राजशाही को कृषि करों को इकट्ठा करने में मदद की।

आयरलैंड में विभाजन के रुझान को कम करने के लिए भी कॉर्नवालिस ने एक नया तरीका खोजा जिसमें फिर से उन्होंने अपनी वित्तीय चतुरता का प्रदर्शन किया।

आयरलैंड में बहुसंख्यक लोग कैथलिक थे और यह पड़ोस के देश ब्रिटेन (जहां बहुसंख्यक प्रोटेस्टेंट थे) का एक उपनिवेश था। यहां समय-समय पर हिंसक विद्रोह होते रहते थे।

आयरलैंड की अपनी संसद थी जो ब्रिटेन के लिए असुविधाजनक कानून पारित करती रहती थी और अक्सर विद्रोह का झंडा भी बुलंद करती थी। कॉर्नवालिस ने आयरलैंड के विरोधी सुर वाले सांसदों से निपटने का एक बेहद आसान तरीका ढूंढते हुए उन्हें रिश्वत दी। उन्होंने आयरलैंड के सांसदों को आयरलैंड की संसद को स्थायी रूप से भंग करने और इसके बदले हाउस ऑफ कॉमन्स में सीट लेने के लिए पैसे की पेशकश की।

आयरलैंड के कई सांसदों ने यह रकम स्वीकार कर ली। बाकी लोगों को ब्लैकमेल किया गया। जो सांसद संसद भंग करने के पक्ष में मतदान करने से इनकार कर रहे थे उन पर आपराधिक मामले दर्ज करा दिए गए और उन्हें हिंसा का खतरा दिखाकर डराया-धमकाया गया। नतीजतन, आयरलैंड के नेता हाउस ऑफ कॉमन्स में अल्पसंख्यक (वास्तव में कई छोटे अल्पसंख्यक) बनकर रह गए।

यह पूरे लोकतांत्रिक संस्थान को खरीदने के लिए बड़ी तादाद में पूंजी के लेन-देन का इतिहास में सबसे अच्छा उदाहरण है। गौर करने वाली बात यह है कि यह धन विदेश यानी ब्रिटेन से आया था और इसने आयरलैंड के सांसदों को अपने ही देश के लोकतांत्रिक संस्थान को ताक पर रखकर खरीद-फरोख्त करने के लिए राजी कर लिया।

इस वक्त अमेरिका के लोग सोच रहे हैं कि क्या राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को अपने पक्ष के लिए विदेश से नकदी मिलने के प्रस्तावों को लेकर एतराज होगा। पूर्व राष्ट्रपति और वर्ष 2024 के लिए रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार, डॉनल्ड ट्रंप को अगले सप्ताह तक न्यूयॉर्क को 45.5 करोड़ डॉलर का भुगतान करने की आवश्यकता है। उनके पास पैसा नहीं है और अमेरिका में कोई भी उन्हें पैसा नहीं देगा।

क्या वह विदेश में पूंजी जुटाने की कोशिश करेंगे? यदि वह ऐसा करते हैं और वर्ष 2024 के चुनाव जीत जाते हैं तब इस बात की कितनी संभावना होगी कि अगली बार जब कोई भू-राजनीतिक घटना होती है जिसमें अमेरिका भी शामिल होगा तब उन्हें पैसे देने वाले लोग अपने पक्ष के लिए उनका समर्थन नहीं चाहेंगे।

पैसा लगाकर राजनीतिक प्रभाव के दबदबे को कायम करना बेहद पुराना तरीका है। इस बात की पूरी संभावना है कि हर सरकार को कभी न कभी किसी संस्था द्वारा नियमों को बदलने के लिए पूंजी की पेशकश की गई होगी। चुनावी बॉन्ड योजना इस मामले में इस लिहाज से सबसे खराब है क्योंकि ये बॉन्ड राजनीतिक रिश्वतखोरी के सबसे खराब तरीकों को भी वैध बनाते हैं।

अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक फंडिंग की जांच-निगरानी आदि का प्रावधान होता है। एक अच्छी लोकतांत्रिक प्रणाली में इस बात को लेकर पारदर्शिता होती है कि कौन किसको पैसा दे रहा है और विदेश से, अपराधियों से या आपराधिक आरोपों का सामना करने वाली संस्थाओं और फर्जी कंपनियों से राजनीतिक चंदा लेने से रोकने के लिए नियम होते हैं। इसके साथ ही इसकी सीमाएं भी तय होती हैं कि राजनीतिक धन कैसे खर्च किया जा सकता है। ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के खजाने का इस्तेमाल अपने जुर्माने या कानूनी फीस का भुगतान करने के लिए नहीं कर सकते हैं।

चुनावी बॉन्ड के अस्तित्व में आने से पहले, भारत में भी इसको लेकर नियंत्रण के प्रावधान थे हालांकि यह कोई आदर्श प्रणाली नहीं थी। केवल मुनाफे वाला कारोबार ही राजनीतिक चंदा दे सकता था और यह चंदा भी पिछले तीन वर्षों में कर चुकाने के बाद औसत लाभ का केवल 7.5 प्रतिशत तक ही हो सकता था। इसका मतलब यह है कि राजनीतिक दलों को चंदा देने वाली कंपनियों का रिकॉर्ड बेहतर होना चाहिए। विशुद्ध रूप से राजनीतिक चंदा देने के लिए कंपनी नहीं बनाई जा सकती थी। इसके अलावा, विदेशों से नकदी स्वीकार करने पर प्रतिबंध था।

वित्त विधेयक वर्ष 2017-2018 (चुनावी बॉन्ड अप्रैल 2017 में पेश किए गए थे) ने 1976 के बाद किसी भी समय, राजनीतिक दलों को दिए गए विदेशी चंदे को पिछली तारीख से ही वैध बना दिया। इसमें मुनाफे की शर्तें भी हटा दी गईं।

अब कोई कंपनी कितनी भी मात्रा में चंदा दे सकती थी चाहे उसकी कमाई, उसकी बैलेंस शीट कुछ भी हो या उस पर कोई आपराधिक जांच की कार्रवाई ही क्यों न चल रही हो। इससे चंदा देने के लिए कोई संस्था बनाना आसान हो गया और इस पूंजी के मूल स्थान का अंदाजा भी नहीं मिलता है। चुनावी बॉन्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि न के बराबर कारोबार करने वाली कंपनियों ने भी अपने कारोबार का 100 गुना चंदा दिया है।

सवाल यह है कि क्या ‘चंदा देने में आसानी’ से ‘कारोबार सुगमता’ जैसी स्थिति बनती है? यदि चंदे को ब्लैकमेल और धमकी के माध्यम से ‘प्रोत्साहित’ किया जाता है तो क्या रकम की मात्रा बढ़ जाती है? क्या विदेशी धन 21वीं सदी के उपनिवेशवाद को जन्म दे सकता है?

आंकड़े इन सभी सवालों के जवाब की तस्दीक ‘हां’ में करते हैं। चुनावी बॉन्ड का दौर तो खत्म हो गया है लेकिन जब तक कानून के जरिये इन खामियों को दूर नहीं किया जाता है तब तक राजनीतिक फंडिंग विवादास्पद बनी रहेगी।

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First Published - March 28, 2024 | 9:44 PM IST

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