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असफल मार्शल सिद्धांत: पाकिस्तान की सबसे ‘रचनात्मक’ सैन्य तानाशाही

पाकिस्तान में सैन्य प्रमुख आसिम मुनीर को पांच साल का कार्यकाल दिया गया है, जो दिखाता है कि इतिहास ने जितनी सैन्य तानाशाहियां देखी हैं, उनमें पाकिस्तान सबसे अधिक नवाचारी है

Last Updated- December 07, 2025 | 10:56 PM IST
Shehbaz Sharif
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मुहम्मद शहबाज शरीफ | फोटो: PTI

बीसवीं सदी के बाद से दुनिया ने कई वर्दी वाले तानाशाह देखे हैं। लेकिन किसी भी देश के सैन्य शासन में उतना नवाचार नहीं दिखा जितनी कि पाकिस्तान में नजर आया।

ताजा मामला उस अधिसूचना से जुड़ा है जिसके जरिये पाकिस्तानी सेना प्रमुख और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (सीडीएफ) को पांच साल की नियुक्ति प्रदान की गई है। पाकिस्तानी सैन्य अकादमी में प्रवेश लेने वाला कोई भी कैडेट देश का शासक बनने की आकांक्षा पाल सकता है। फिर भी जनरल मुनीर ने एक अभूतपूर्व नवाचार किया है। ऐसा जो पाकिस्तानी सेना के मानकों के मुताबिक भी जबरदस्त है।

ध्यान दीजिए कि विगत 75 वर्षों में पाकिस्तान के 23 प्रधानमंत्रियों में से कोई भी पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका है क्योंकि सेना ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया। इसके बावजूद जनरल मुनीर को उनके मौजूदा प्रधानमंत्री ने पांच साल के लिए सीडीएफ नियुक्त किया है।

यह ऐसी विडंबना नहीं है जिस पर हंसा जाए। यह एक सैन्य तानाशाही का नवाचार है जो वैसा ही है जैसा शायद टेस्ला या पलनटियर टेक क्षेत्र में हासिल करें। पहली बात, जनरल मुनीर ने शरीफ पर दबाव बनाया कि उन्हें उनकी सेवानिवृत्ति के एक दिन पहले सेना प्रमुख बनाया जाए जबकि तत्कालीन सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा सेवा में थे। नतीजा, पाकिस्तान में दो दिनों तक दो सेना प्रमुख रहे। 28 नवंबर को उनका तीन साल का कार्यकाल समाप्त हुआ। वह उस दिन सेवानिवृत्त हुए लेकिन उसके करीब एक सप्ताह बाद तक ऐसे ही प्रमुख बने रहे जब उनकी सीडीएफ और सेना प्रमुख की नियुक्ति की अधिसूचना जारी की गई। 

सबसे पहले उन्होंने 2024 के चुनावों में गड़बड़ी की थी और इमरान खान तथा उनकी पत्नी को जेल भेज दिया। उनकी पार्टी को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया। इसके बाद शहबाज शरीफ को अपनी पसंद से देश का प्रधानमंत्री बनवा दिया। अब उसी प्रधानमंत्री ने पहले उन्हें फील्ड मार्शल के रूप में तरक्की दी, उसके बाद 27वें संशोधन के जरिये देश के संविधान को तोड़ा-मरोड़ा और फील्ड मार्शल की पदवी को आजीवन कर दिया। उन्हें सीडीएफ के रूप में पांच साल के कार्यकाल के साथ सभी सशस्त्र बलों का बॉस बना दिया। इसके साथ ही उन्हें किसी भी अभियोजन से आजीवन निजात मिल गई। वायु सेना प्रमुख को भी दो साल का सेवा विस्तार दिया गया जो पहले ही मार्च 2024 से विस्तारित सेवा दे रहे थे।

लब्बोलुआब यह कि जनरल आजीवन फील्ड मार्शल बन गए, उन्हें अ​भियोजन से प्रतिरक्षा यानी इम्युनिटी मिली, फिर तीन वर्ष के कार्यकाल के बाद पांच वर्षों के लिए सीडीएफ नियुक्त हुए और यह सब एक निर्वाचित प्रधानमंत्री, संसद और संविधान के माध्यम से हुआ। ऐसा संविधान जिसे विपक्ष-रहित चुनाव में चुने गए सदस्यों ने संशोधित किया। पाकिस्तान के सैन्य तानाशाहों के इतिहास में नवीनतम अध्याय संविधान और संसद द्वारा वैध ठहराया गया है तथा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किया गया है। यह ऐसा है मानो देश के सर्वोच्च पदों पर निर्वाचित दो व्यक्तियों ने स्वयं अपने राजनीतिक डेथ वॉरंट पर हस्ताक्षर कर दिए हों।

असैन्य सरकार द्वारा जनरल को सत्ता में आमंत्रित करना पाकिस्तान में असाधारण बात नहीं है। 1958 में असैन्य राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने मॉर्शल लॉ लागू किया था और जनरल मोहम्मद अयूब खान को अपना चीफ मार्शल लॉ प्रशासक यानी सीएमएलए नियुक्त किया था। इसके बाद अयूब ने मिर्जा को पद से हटाया और खुद राष्ट्रपति बन गए। उन्होंने एक कम चर्चित व्यक्ति जनरल मोहम्मद मूसा खां को सेना प्रमुख बना दिया। लेकिन एक जनरल उन्हें कैसे रिपोर्ट करता क्योंकि वह खुद भी जनरल थे तो उन्होंने खुद को फील्ड मार्शल के पद पर पदोन्नत कर लिया। मूसा 1966 तक पद पर रहे।

यह उस प्रक्रिया को बताता है जिसके तहत पाकिस्तानी सेना प्रमुखों का कार्यकाल भी काफी लंबा रहता है। तुलनात्मक रूप से देखें तो पाकिस्तान में केवल 17 सेना प्रमुख हुए हैं जबकि भारत में इस समय 31वें सेना प्रमुख पद पर हैं। जनरल मुनीर 2030 में जब कार्यकाल पूरा करेंगे तब तक भारत के 33वां सेना प्रमुख पद पर होंगे।

अयूब ने दल विहीन ‘गाइडेड डेमोक्रेसी’ की अवधारणा गढ़ी, दिखावे का चुनाव कराया और यहां तक कि मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा की हार भी सुनिश्चित की। इसके बाद उन्होंने सत्ता जनरल याह्या खान को सौंप दी। याह्या के मिलेजुले शासन के दौरान ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो विदेश मंत्री रहे। उन्होंने भी चुनाव कराया, लेकिन जब मुजीबुर रहमान की अवामी लीग जीत गई, तो परिणामों को खारिज कर दिया गया।

उसके बाद, भुट्टो ने 1977 में संक्षिप्त रूप से मार्शल लॉ का प्रयोग किया, लेकिन जनरल जिया-उल-हक ने उन्हें अपदस्थ कर जेल में डाल दिया और बाद में उन्हें फांसी दे दी गई। जनरल जिया ने इस्लामी शासन (निजाम-ए-मुस्तफा) लागू करने की कोशिश की, फिर एक सीमित लोकतंत्र वाली पार्टी को फिक्स चुनाव के जरिए आगे बढ़ाया, और बाद में निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद खान जुनेजो को बर्खास्त कर दिया। 17 अगस्त 1988 को बहावलपुर में सी-130 विमान दुर्घटना या बम विस्फोट में उनकी मृत्यु हो गई।

तब से अब तक या तो जनरल (1999 से 2007 तक परवेज मुशर्रफ) सीधे सत्ता में रहे या फिर उन्होंने बाहर से या परदे के पीछे से नियंत्रण बनाए रखा। अब जनरल मुनीर एक नई पटकथा के साथ सामने आए हैं।

पाकिस्तान की तमाम विविध व्यवस्थाओं के ब्योरे में जाने के बजाय पूरे उपमहाद्वीप की बात करते हैं। पाकिस्तान का उदाहरण उपमहाद्वीप के अन्य सैन्य शासकों को प्रेरित करने के बजाय उनको उलटी दिशा में ले गया है। हम देखते हैं कि उन सभी ने राजनीतिक सत्ता से दूरी बनाई और लोकतंत्र का समर्थन किया। इसमें बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और मालदीव शामिल हैं। यहां तक कि भूटान में भी राजा ने एक निष्पक्ष रूप से निर्वाचित सरकार स्थापित की और निर्वाचित प्रधानमंत्री को पर्याप्त शक्ति सौंपी। इन सभी ने पाकिस्तान के उदाहरण को नकार दिया।

ये सभी देश पाकिस्तान से अधिक सुरक्षित और स्थिर हैं तथा उनकी प्रति व्यक्ति आय भी बेहतर है। पाकिस्तान की तुलना में बांग्लादेश में यह दोगुना, भूटान में ढाई गुना, श्रीलंका में तीन गुना और मालदीव में आठ गुना है। यहां तक कि नेपाल भी जल्दी पाकिस्तान को पीछे छोड़ देगा। पाकिस्तान उपमहाद्वीप का सबसे फिसड्डी देश है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रतिस्पर्धी राजनीति और लोकतंत्र चाहे जितने खराब हों वे सैन्य तानाशाहों से हमेशा बेहतर होते हैं।

हर देश में सेना प्रमुखों के पास अपने अवसर होते हैं। बांग्लादेश में दो जनरलों ने शासन किया। परंतु 1977 में जनरल जियाउर रहमान द्वारा सत्ता संभालने के हालात अलग थे। उसकी जड़ें बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष में थीं। जब शेख मुजीबुर रहमान पश्चिमी पाकिस्तान की जेल में बंद थे, तो जियाउर रहमान जो उस समय मेजर थे, उन्होंने मार्च 1971 में पाकिस्तान के ऑपरेशन सर्चलाइट के जरिये तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान पर किए गए हमले के खिलाफ बगावत में बंगाली अधिकारियों का नेतृत्व किया। उन्होंने अपनी पूर्वी बंगाल रेजिमेंट के पंजाबी कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल अब्दुर रशीद जंजुआ को गोली मार दी थी। वह मानते थे कि उन्होंने मुजीब से बहुत पहले 27 मार्च की शाम 7.45 बजे एक वायरलेस रेडियो प्रसारण में नए गणराज्य की घोषणा की थी।

मुजीब ने भी तानाशाही का रुख किया और अपेक्षाकृत युवा अधिकारियों ने उनकी भी हत्या कर दी। जिया ने 1977 में सत्ता संभाली और 1981 में उनकी भी हत्या कर दी गई।1983 से 1990 तक जनरल एम एच इरशाद ने शासन किया लेकिन आखिरकार लोकतंत्र की जीत हुई और शेख हसीना और खालिदा जिया ने मिलकर उन्हें परास्त किया। उसकी सेना ने इन बातों से सबक लिया और लोकतंत्र के संरक्षक की भूमिका अपना ली।

पिछले दो वर्षों में हमने देखा कि कैसे श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में सड़कों पर हुए प्रदर्शनों ने बेहद अलोकप्रिय निर्वाचित सरकारों को उखाड़ फेंका। इनमें से हर मामले में कोई जनरल आसानी से सत्ता संभाल सकता था। परंतु उन्होंने सेना का उपयोग अराजकता के बीच आश्वासन देने के लिए किया और शांतिपूर्ण नागरिक बदलाव और चुनावों का समर्थन किया। बांग्लादेश में, जो पाकिस्तानी सेना से प्रभावित होने की सबसे अधिक संभावना रखता है, उसके सेना प्रमुख का सबसे राजनीतिक बयान केवल इतना था कि चुनाव जल्द से जल्द कराए जाने चाहिए।

यह पत्रकारिता का ‘तीन-उदाहरणों वाला नियम’ है। ठीक उसी अवधि में जब जनरल मुनीर अपनी सत्ता को मजबूत कर रहे थे, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में उनके समकक्षों ने उल्लेखनीय गरिमा और पेशेवराना अंदाज में सत्ता से दूरी बनाई। ये सभी देश पाकिस्तान से बेहतर हैं। यदि आपका देश इतना बेहतर कर रहा है, तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि किसी को आपके सेना प्रमुख का नाम याद नहीं। संभव है कि डॉनल्ड ट्रंप आपके सेना प्रमुख को अपना पसंदीदा फील्ड मार्शल नहीं कहेंगे। लेकिन क्या यह जश्न मनाने की बात नहीं है? 

First Published - December 7, 2025 | 10:56 PM IST

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