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डॉलर की गिरती साख ने बदला वैश्विक बाजार का मिजाज: क्या रुपये में आगे भी जारी रहेगी गिरावट?

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अमेरिकी डॉलर में लगातार कमजोरी देखी जा रही है, जिससे वैश्विक मुद्रा बाजारों में अस्थिरता बढ़ रही है और इसका असर उभरते बाजारों पर भी पड़ रहा है

Last Updated- January 27, 2026 | 7:06 PM IST
dollar
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

डॉलर की कमजोरी ने एक बार फिर दुनिया भर के वित्तीय बाजारों का मूड बदल दिया है। जिस अमेरिकी डॉलर को लंबे समय तक सबसे भरोसेमंद और मजबूत मुद्रा माना जाता रहा, वह अब दबाव में नजर आ रहा है। इसकी वजह सिर्फ ब्याज दरें नहीं हैं, बल्कि वैश्विक राजनीति, निवेशकों की सोच और आने वाले समय को लेकर बनी अनिश्चितता भी है। इस बदले हालात का असर सीधे वैश्विक करेंसी बाजारों के साथ-साथ भारत जैसे उभरते देशों पर भी पड़ रहा है।

डॉलर की गिरती ताकत और वैश्विक बाजार में हलचल

एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की वेल्थ मैनेजमेंट यूनिट, एमके वेल्थ मैनेजमेंट लिमिटेड की नई रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी डॉलर की प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले लगातार कमजोरी से करेंसी मार्केट में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह गिरावट मुख्य रूप से अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से आगे ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों और बदलते भू-राजनीतिक हालात की वजह से आई है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो 2025 की शुरुआत से अब तक डॉलर इंडेक्स में करीब 9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। जनवरी की शुरुआत में यह इंडेक्स लगभग 109.96 के स्तर पर था, जो अब घटकर करीब 98.60 के आसपास आ गया है। बाजार के जानकार इसे सिर्फ अस्थायी कमजोरी नहीं, बल्कि वैश्विक मुद्रा समीकरणों में एक संरचनात्मक बदलाव के तौर पर देख रहे हैं।

डॉलर की चाल अलग-अलग मुद्राओं के मुकाबले अलग रही है। पाउंड स्टर्लिंग और यूरो के सामने डॉलर साफ तौर पर कमजोर हुआ है, जबकि जापानी येन के मुकाबले इसमें कुछ मजबूती जरूर दिखी है। वहीं, चीनी युआन के सामने डॉलर की गिरावट लगातार बनी हुई है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह स्थिति एशियाई मुद्राओं पर व्यापक दबाव की ओर इशारा करती है।

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फेड की नीति और निवेशकों की सोच

डॉलर पर दबाव की सबसे बड़ी वजह फेडरल रिजर्व की नरम मौद्रिक नीति मानी जा रही है। फेड पहले ही फेड फंड्स रेट को 3.50 से 3.75 फीसदी के दायरे में ला चुका है। बाजार को उम्मीद है कि आने वाले महीनों में ब्याज दरों में और कटौती की जा सकती है। कम ब्याज दरों का मतलब है कि डॉलर पर मिलने वाला रिटर्न घटता है, जिससे निवेशकों का झुकाव दूसरी मुद्राओं और बाजारों की ओर बढ़ सकता है।

इसके साथ ही निवेशकों की धारणा पर फेडरल रिजर्व के नेतृत्व में संभावित बदलाव की अटकलों का भी असर दिख रहा है। माना जा रहा है कि 2026 के मध्य तक फेड के शीर्ष नेतृत्व में बदलाव हो सकता है। यह उम्मीद कि नया फेड चेयर मौद्रिक नीति को कार्यकारी प्राथमिकताओं के मुताबिक ढाल सकता है, लंबे समय तक कम ब्याज दरों की सोच को मजबूत कर रही है। यही वजह है कि डॉलर पर दबाव बना हुआ है।

भू-राजनीतिक मोर्चे पर भी हालात पूरी तरह शांत नहीं हैं। वेनेजुएला और ईरान जैसे क्षेत्रों में हालिया घटनाक्रमों ने वैश्विक व्यापार मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। अगर शिपिंग लेन या तेल सप्लाई में किसी तरह की रुकावट आती है तो कच्चे तेल की कीमतों में अल्पकालिक उछाल आ सकता है। ऐसी स्थिति में भले ही डॉलर को कुछ समय के लिए सुरक्षित निवेश के तौर पर समर्थन मिले, लेकिन इसकी व्यापक कमजोरी बनी रह सकती है।

रुपये की स्थिति और विदेशी निवेश

घरेलू बाजार पर नजर डालें तो भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 90 रुपये के आसपास टिका हुआ दिख रहा है। बीच-बीच में इसमें थोड़ी हलचल जरूर रही है, लेकिन बाजार की राय है कि फिलहाल रुपया इसी रेंज में बना रह सकता है। भारत एक बड़ा आयातक देश है, इसलिए व्यापार से जुड़े कारण रुपये पर दबाव बनाते हैं, मगर विदेशी निवेश के बेहतर होने की उम्मीदें इसे कुछ राहत दे सकती हैं।

वहीं, पिछले 18 महीनों से विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में लगातार बिकवाली कर रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि कई सेक्टरों में शेयर अब आकर्षक कीमतों पर मिल रहे हैं। जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिका में ब्याज दरों में बड़ी कटौती होती है और डॉलर से मिलने वाला रिटर्न घटता है, तो भारत जैसे उभरते बाजारों की ओर निवेशकों का रुझान फिर बढ़ सकता है।

एमके वेल्थ मैनेजमेंट के हेड ऑफ सेल्स पाराग मोरे का कहना है कि इस वक्त वैश्विक मुद्रा बाजार ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां देशों की मौद्रिक नीतियों में फर्क और भू-राजनीतिक जोखिम बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। कमजोर होता डॉलर और उभरते बाजारों की ओर पूंजी के रुख से निवेशकों के लिए मौके भी बन रहे हैं और जोखिम भी। उनके मुताबिक, भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद और लगातार विदेशी निवेश, वैश्विक उतार-चढ़ाव के बावजूद रुपये को मौजूदा दायरे में टिकाए रखने में मदद कर सकते हैं।

केडिया एडवाइजरी के डायरेक्टर अजय केडिया के मुताबिक, फेड की बैठक से पहले डॉलर करीब चार महीने के सबसे निचले स्तर के आसपास बना हुआ है। लगातार तीन दिनों की गिरावट के बाद डॉलर इंडेक्स अब लगभग 97 पर आकर ठहर गया है। बाजारों को फिलहाल इस बात की उम्मीद नहीं है कि फेड ब्याज दरों में कोई बदलाव करेगा, लेकिन फेड की स्वतंत्रता को लेकर सवाल, नेतृत्व बदलने की अटकलें और अमेरिका में फिर से सरकारी शटडाउन की आशंका ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। इसके साथ ही जापानी येन की मजबूती और बढ़ते वैश्विक तनाव भी डॉलर पर दबाव बनाए हुए हैं।

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First Published - January 27, 2026 | 6:28 PM IST

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