हमारे देश में फैक्ट्रियों, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स और दफ्तरों में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों के लिए अक्सर ‘ओवरटाइम’ शब्द सिर्फ एक एक्स्ट्रा जिम्मेदारी या मजबूरी बनकर रह जाता है, उसका सही पैसा कभी नहीं मिलता। काम का भारी दबाव, पीक सीजन को संभालना या फिर रोजाना के पेंडिंग काम को निपटाने के चक्कर में कर्मचारियों से तय समय से ज्यादा काम कराना कंपनियों के लिए आम बात है। हालांकि, जब इस एक्स्ट्रा काम के बदले वाजिब पैसा देने की बारी आती है, तो कई कंपनियां बजट और घाटे का रोना रोकर आनाकानी शुरू कर देती हैं।
लेकिन क्या आने वाले दिनों में कंपनियों की यह मनमानी खत्म होगी? एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सरकार ने न्यू लेबर कोड्स (New Labour Codes) से कंपनियों के इस मनमानी को बदलने की कोशिश की है। ये नए नियम न सिर्फ कर्मचारियों को कानूनी सुरक्षा दे रहे हैं, बल्कि उन एम्प्लॉयर्स की मुश्किलें भी बढ़ा रहे हैं जो अब तक ओवरटाइम के पैसे दबाकर बैठ जाते थे।
एक्सपर्ट्स् का मानना है कि पुराने दौर में ओवरटाइम के नाम पर कर्मचारियों को कुछ भी थोड़ा-बहुत एक्स्ट्रा थमाकर टरका दिया जाता था, लेकिन अब ऐसा करना कंपनियों को बहुत भारी पड़ने वाला है।
‘कोड ऑन वेजेस, 2019’ के सेक्शन 14 ने कड़े शब्दों में साफ कर दिया है कि यदि कोई कर्मचारी अपने निर्धारित कामकाजी घंटों से ज्यादा काम करता है, तो कंपनी को उसे उस काम का सामान्य मजदूरी से दोगुनी दर पर ओवरटाइम देना होगा।
इस नियम के मुताबिक, साथ ही अब कंपनियां अपनी मर्जी या दबाव डालकर कर्मचारियों से जबरन ओवरटाइम नहीं करा सकेंगी। ‘OSH Code, 2020’ (Occupational Safety, Health and Working Conditions Code) के तहत किसी कर्मचारी से ओवरटाइम कराने से पहले उसकी सहमति लेना कानूनी तौर पर जरूरी होगा। यानी कर्मचारी की मंजूरी के बिना उसे अतिरिक्त घंटे काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकेगा।
यानी अब किसी कर्मचारी पर जबरन काम नहीं थोपा जा सकता, बल्कि ओवरटाइम या अतिरिक्त काम तभी होगा जब कर्मचारी की सहमति हो। नया OSH Code, 2020 पुराने ‘फैक्ट्रीज एक्ट’ और ‘माइंस एक्ट’ जैसे अलग-अलग कानूनों को एक साथ लेकर आया है। इसलिए इसके नियम ग्रेनाइट प्रोसेसिंग यूनिट्स, खदानों और फैब्रिकेशन यार्ड्स समेत छोटे-बड़े सभी इंडस्ट्री पर भी सीधे तौर पर लागू होंगे।
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ओवरटाइम विवाद को लेकर कर्मचारियों के पास अब कई कानूनी अधिकार हैं। इसपर सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट हर्शल दिलवाली ने कहा कि अगर कोई कंपनी ओवरटाइम का पैसा देने में टालमटोल करती है, तो कर्मचारियों के पास कार्रवाई के कई मजबूत कानूनी रास्ते मौजूद हैं।
दिलवाली कहते हैं, “अब कर्मचारियों को अपने अधिकारों के लिए किसी यूनियन के सहारे या उसके सपोर्ट का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। अगर किसी कर्मचारी को ओवरटाइम का पैसा नहीं मिला है, तो वह ‘कोड ऑन वेजेस, 2019’ के सेक्शन 45 के तहत संबधित अधिकारी के सामने सीधे अपनी बकाया मजदूरी का दावा कर सकता है।”
दिलवाली बताते हैं कि कानून के मुताबिक, ऐसे मामलों का निपटारा तीन महीने के भीतर करना जरूरी होता है। इसके अलावा, यह कानून सिर्फ बकाया वेतन या ओवरटाइम दिलाने तक ही सीमित नहीं है। मामले की परिस्थितियों को देखते हुए वह कर्मचारी को हुए आर्थिक और दूसरे नुकसान के लिए बकाया पैसा का 10 गुना तक मुआवजा दिलाने का आदेश भी दे सकता है।
दिलवाली ने आगे बताया कि कर्मचारियों के पास इसके अलावा भी कई विकल्प मौजूद हैं। वे अपने क्षेत्र के लेबर कमिश्नर या लेबर डिपार्टमेंट में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके बाद संबंधित डिपार्टमेंट कंपनी के खिलाफ निरीक्षण, जांच और जरूरत पड़ने पर कानूनी कार्रवाई शुरू कर सकती है।
अगर शुरुआती स्तर पर फैसला कर्मचारी के पक्ष में नहीं आता है, तो उसे अपीलीय प्राधिकरण (Appellate Authority) के सामने अपील करने का पूरा कानूनी अधिकार भी दिया गया है।
अक्सर विवाद होने पर कंपनियां यह कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश करती हैं कि उन्होंने कर्मचारी से कोई अतिरिक्त काम नहीं कराया था। खासकर फैब्रिकेशन यार्ड, कंस्ट्रक्शन साइट और प्रोसेसिंग प्लांट में काम करने वाले कई कर्मचारी किसी यूनियन से जुड़े नहीं होते, जिससे पहले उनके लिए अपने दावे को साबित करना मुश्किल हो जाता था। लेकिन नए कानूनों ने सबूत की परिभाषा को काफी आधुनिक और व्यावहारिक बना दिया है।
दिलवाली के मुताबिक, कर्मचारियों को अपने दावों को मजबूत करने के लिए कुछ जरूरी डॉक्यूमेंट और रिकॉर्ड संभालकर रखने चाहिए। इनमें बायोमेट्रिक लॉग, अटेंडेंस रजिस्टर, ड्यूटी रोस्टर, शिफ्ट शेड्यूल, टाइमशीट और सैलरी स्लिप जैसे आधिकारिक रिकॉर्ड शामिल हैं।
इसके साथ ही अब डिजिटल सबूतों को भी अदालतों में पूरी कानूनी मान्यता मिल चुकी है, जिससे कर्मचारियों के लिए अपना केस साबित करना पहले से आसान हो गया है।
उन्होंने बताया कि अगर किसी सुपरवाइजर या मैनेजर ने व्हाट्सएप पर देर तक रुककर काम करने के लिए कहा है या ईमेल के जरिए एक्स्ट्रा काम, फाइलें निपटाने या देर रात तक ड्यूटी पूरी करने को कहा है, तो ऐसे मैसेज कंपनी के खिलाफ मजबूत सबूत के तौर पर पेश किए जा सकते हैं।
इसके अलावा, सहकर्मियों की गवाही और एम्पलॉयर द्वारा रखा जाने वाला ‘फॉर्म-I’ का यूनिफाइड ओवरटाइम रजिस्टर भी कर्मचारी के दावे को साबित करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
इस बदलाव का जमीनी असर और इंडस्ट्री के नजरिए पर ‘पेट्रोस स्टोन LLP’ के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) विक्रम जैन ने कुछ व्यावहारिक पहलू सामने रखा।
जैन ने बताया, “कई काम ऐसे हैं जहां ओवरटाइम से पूरी तरह बच पाना लगभग नामुमकिन है। ऑर्डर समय पर पूरा करने का दबाव, सीजन के दौरान बढ़ा हुआ काम और ट्रकों की लोडिंग व शिपमेंट के तय शेड्यूल के चलते कई बार कर्मचारियों को तय शिफ्ट के बाद भी काम करना पड़ता है। लेकिन नए नियमों ने पूरी इंडस्ट्री के काम करने के तरीके में बदलाव तो ला दिया है।
जैन के मुताबिक, कंपनियों के लिए सिर्फ सरकारी जुर्माने का डर ही सबसे बड़ी चिंता नहीं है। उन्होंने कहा कि आज कई बड़ी कंपनियां और प्रोजेक्ट प्रोक्योरमेंट टीमें सप्लायर्स से माल खरीदने से पहले उनके लेबर स्टैंडर्ड्स की सख्त जांच करती हैं। यह देखा जाता है कि कर्मचारियों को पूरा वेतन और कानून के मुताबिक ओवरटाइम का पेमेंट किया जा रहा है या नहीं। अगर किसी तरह का उल्लंघन या शिकायत सामने आती है, तो खरीदार कंपनियां करोड़ों रुपये के ऑर्डर और बिजनेस कॉन्ट्रैक्ट तक रद्द कर सकती हैं।
उनके मुताबिक, सरकारी अधिकारियों की ओर से लगाया गया 50,000 रुपये का जुर्माना उतना बड़ा खतरा नहीं है, जितना वर्षों की मेहनत से बने बड़े ग्राहकों और कारोबार को खो देना। यही वजह है कि कंपनियों के लिए अब सबसे समझदारी भरा रास्ता यही है कि वे अंदरूनी स्तर पर ही कर्मचारियों को उनका बकाया और ओवरटाइम का सही पेमेंट करें और नियमों का पूरी तरह पालन करें।
इस मुद्दे पर दोनों एक्सपर्ट्स की राय लगभग एक जैसी है। उनका मानना है कि नए लेबर कोड ने कर्मचारियों के लिए एक बड़ी खामी को दूर कर दिया है। पुराने कानूनों में 24,000 रुपये से अधिक मासिक वेतन पाने वाले कई मैनेजर और सुपरवाइजर इस सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाते थे, जिसका फायदा कंपनियां अक्सर उठाती थीं।
नए लेबर कोड के तहत इस तरह की वेतन सीमा और पद से जुड़ी मुश्किलें खत्म कर दी गई हैं। अब किसी कर्मचारी की सैलरी या पद नहीं, बल्कि उसके वास्तविक काम के घंटे सबसे ज्यादा जरूरी होंगे। यानी अगर कोई व्यक्ति अपनी तय शिफ्ट के बाद भी काम कर रहा है, तो उसे कानून के तहत मिलने वाली सुरक्षा और ओवरटाइम से जुड़े अधिकार मिलेंगे, फिर चाहे वह किसी भी स्तर पर काम करता हो या उसकी सैलरी कितनी भी हो।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, नए नियमों के तहत कर्मचारियों को एक और बड़ी राहत मिली है। अब बकाया वेतन या ओवरटाइम से जुड़े दावों को फाइल करने की समय सीमा बढ़ाकर तीन साल कर दी गई है। इसका मतलब है कि नौकरी छूटने या किसी विवाद की स्थिति में कर्मचारियों के पास अपनी कानूनी लड़ाई की तैयारी और दावा पेश करने के लिए पहले से कहीं ज्यादा समय उपलब्ध होगा।
वहीं कंपनियों के लिए भी नियम तोड़ना अब भारी पड़ सकता है। अगर कोई एम्प्लॉयर पहली बार ओवरटाइम का पेमेंट नहीं करता या वेतन में गड़बड़ी करता हुआ पकड़ा जाता है, तो उस पर 50,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
लेकिन अगर वही कंपनी 5 साल के अंदर दोबारा ऐसा उल्लंघन करती है, तो सिर्फ जुर्माना ही नहीं, बल्कि कंपनी के मालिक, डायरेक्टर या जिम्मेदार अधिकारियों को 3 महीने तक की जेल, 1 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजा भी हो सकती है।
कुल मिलाकर, दोनों एक्सपर्ट इस बात पर सहमत है कि सरकार ने इस बार कानूनों को सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रखा है। सरकार का मैसेज साफ है कि कंपनियों को अब अपनी बैलेंस शीट के साथ-साथ कर्मचारियों के अधिकारों और कानूनी जिम्मेदारियों का भी उतना ही सम्मान करना होगा।