भारतीय शहरों में सपनों का आशियाना खरीदना हर किसी की जिंदगी की सबसे बड़ी खुशियों में से एक होता है। हालांकि, आसमान छूती जायदाद की कीमतों के दौर में अधिकांश लोग 20 से 30 सालों के लंबे होम लोन के सहारे ही अपना घर बना पाते हैं। लेकिन इस बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या केवल एक घर की चाबी हासिल करना ही असली आर्थिक सफलता है?
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि लंबे समय तक चलने वाली होम लोन की भारी-भरकम किस्तें (EMI) आपके बुढ़ापे के सहारे यानी रिटायरमेंट कॉर्पस को धीरे-धीरे चट कर रही हैं। यदि वक्त रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो रिटायरमेंट के वक्त आपके पास रहने को एक कीमती मकान तो होगा, लेकिन हर महीने के खर्च चलाने के लिए जेब में पैसे नहीं होंगे।
तीर्थ रियलटीज के डायरेक्टर विजय रौंडल का कहना है कि भारत में घर खरीदना सिर्फ भावनाओं से जुड़ा फैसला नहीं होता, बल्कि यह रिटायरमेंट की तैयारी से जुड़ा सबसे बड़ा आर्थिक फैसला भी होता है। अगर कोई व्यक्ति अपनी हर महीने की कमाई का बड़ा हिस्सा कई सालों तक होम लोन की EMI चुकाने में खर्च करता है, तो इसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि वह भविष्य के लिए कितनी संपत्ति बना पाएगा।
रौंडल कहते हैं, “जब EMI का बोझ जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है, तो घर एक संपत्ति कम और हर महीने पैसे की बड़ी जिम्मेदारी ज्यादा बन जाता है। आज शहरों में घरों की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि 25 से 30 साल का होम लोन लेना आम बात हो गई है।”
उनके मुताबिक, असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हर महीने कितनी EMI भरनी पड़ रही है, बल्कि यह है कि EMI चुकाने के बाद क्या आप दूसरी संपत्तियां भी बना पा रहे हैं। अगर आपकी ज्यादातर मासिक बचत लोन चुकाने में ही चली जाती है, तो इक्विटी, म्यूचुअल फंड और रिटायरमेंट फंड जैसे जरूरी निवेश पीछे छूट जाते हैं। इसका नतीजा यह हो सकता है कि रिटायरमेंट के समय आपके पास एक महंगा घर तो हो, लेकिन नियमित आय देने वाला कोई मजबूत निवेश न बचा हो।
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रिटायरमेंट के बाद सबसे मुश्किल स्थिति तब होती है, जब नियमित कमाई बंद हो जाए लेकिन बैंक का लोन अभी भी बाकी हो। विभावंगल अनुकूलकरा प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर सिद्धार्थ मौर्या का कहना है कि रिटायरमेंट के बाद सबसे बड़ा जोखिम सिर्फ आय का बंद होना नहीं, बल्कि उस उम्र में भी होम लोन की EMI भरते रहना है। अगर किसी व्यक्ति का लोन उसकी नौकरी या काम खत्म होने तक चलता रहता है, तो उसे अपनी पूरी जिंदगी की बचाई गई रिटायरमेंट पूंजी का बड़ा हिस्सा बैंक का कर्ज चुकाने में लगाना पड़ सकता है।
सिद्धार्थ बताते हैं कि कई लोग 30 से 35 साल की उम्र में लंबी समय का होम लोन लेते हैं। यह वह समय होता है, जब आमतौर पर करियर में कमाई और बचत सबसे तेजी से बढ़ती है। इसी दौरान किया गया नियमित निवेश और उस पर मिलने वाला कंपाउंडिंग (ब्याज पर ब्याज) का फायदा आगे चलकर रिटायरमेंट के लिए बड़ा फंड तैयार करता है। लेकिन अगर इसी दौर में EMI की वजह से निवेश कम हो जाए, तो आने वाले वर्षों में उस नुकसान की भरपाई करना लगभग नामुमकिन हो जाता है। इसलिए होम लोन को सिर्फ घर खरीदने का साधन नहीं, बल्कि अपनी पूरी रिटायरमेंट प्लानिंग का अहम हिस्सा मानकर फैसला करना चाहिए।
प्रॉपर्टी खरीदते समय ज्यादातर लोग सिर्फ घर की कीमत और होम लोन के ब्याज का हिसाब लगाते हैं, लेकिन एक अहम पहलू को नजरअंदाज कर देते हैं। गोयल गंगा डेवलपमेंट्स के डायरेक्टर अनुराग गोयल के मुताबिक, सबसे बड़ी गलती यही होती है कि लोग घर की कीमत का आकलन तो करते हैं, लेकिन उसकी ‘अवसर लागत’ (Opportunity Cost) पर ध्यान नहीं देते।
अनुराग गोयल का कहना है कि 30 साल तक लगातार EMI भरने का मतलब सिर्फ बैंक को ब्याज चुकाना नहीं है। इसका मतलब उन निवेश के अवसरों को भी छोड़ देना है, जो इसी अवधि में आपके लिए बड़ा रिटायरमेंट कॉर्पस तैयार कर सकते थे।
उनके मुताबिक, किसी भी होम लोन का आकलन सिर्फ इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसकी ब्याज दर कम है या EMI सस्ती है। यह भी देखना जरूरी है कि वह आपकी भविष्य में निवेश करने की क्षमता को कितना सीमित कर रहा है। सही और समझदारी भरी रियल एस्टेट खरीद वही है, जो आपकी जीवनशैली को बेहतर बनाए, लेकिन आपकी आर्थिक लचीलापन (Financial Flexibility) को कम न करे।
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सभी एक्सपर्ट्स की राय का सार यही है कि संपत्ति बनाना अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए अपनी पूरी आय को कई दशकों तक होम लोन की EMI में बांध देना समझदारी नहीं है। सबसे बेहतर स्थिति वही मानी जाती है, जहां आपके पास अपना घर भी हो और साथ ही ऐसा निवेश भी हों, जो रिटायरमेंट के बाद आपके रोजमर्रा के खर्च बिना किसी तनाव के पूरे कर सकें।
तीनों एक्सपर्ट का कहना है कि इसलिए होम लोन लेने से पहले अपनी क्षमता का सही आकलन करना और हर महीने की बचत का एक तय हिस्सा दूसरे निवेशों में लगाना बेहद जरूरी है। आखिरकार, लक्ष्य सिर्फ घर की रजिस्ट्री अपने नाम कराना नहीं होना चाहिए, बल्कि रिटायरमेंट तक पहुंचते-पहुंचते कर्ज-मुक्त होकर आर्थिक रूप से सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनना भी होना चाहिए।