नितिन देसाई वर्ष 1988 से वर्ष 1989 तक मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। यह वह दौर था जब आर्थिक सुधारों पर चर्चा जोर पकड़ने लगी थी। हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था उदार बनाने की औपचारिक प्रक्रिया वर्ष 1991 में पी वी नरसिंह राव सरकार ने शुरू की। असित रंजन मिश्र ने देसाई से टेलीफोन पर लंबी बात की। इस बातचीत में देसाई ने बताया कि भारत को नए लोगों और ऐसे उद्योगों को बढ़ावा देने की जरूरत है जो रोजगार के अवसर सृजित करें। देसाई ने कहा कि इन उपायों से अधिक से अधिक लोगों की रोजगार के लिए कृषि क्षेत्र पर निर्भरता कम होगी। बातचीत के खास अंश:
वर्ष 1983 में जब आप प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सचिव बने तो सब्सिडी और अधिक राजस्व व्यय की वजह से राजकोषीय घाटा काफी बढ़ गया था। क्या पीएमईएसी इस स्थिति से सहज था और प्रधानमंत्री को क्या सलाह दी जा रही थी?
मैं इसे केवल पीएमईएसी के काम से कहीं अधिक व्यापक नजरिये से बताना चाहूंगा क्योंकि सरकार के भीतर सुधारों के बारे में सोच काफी पहले यानी वर्ष 1970 के दशक के अंत से ही पनपनी शुरू हो गई थी। अगर आप उस समय तैयार कई रिपोर्ट देखें तो आपको बहुत हैरानी होगी। इनमें एक थी वर्ष 1979 की वाडीलाल डगली समिति की रिपोर्ट जिसे कई लोग अब भूल चुके हैं।
यह रिपोर्ट नियंत्रण और सब्सिडी पर थी और जनता पार्टी सरकार के समय सौंपी गई थी। इसे लगभग 12 वर्षों तक नजरअंदाज किया गया और वर्ष 1991 में जो कुछ हुआ उसके एक बड़े हिस्से का जिक्र इस रिपोर्ट में पहले से मौजूद था। इसमें पूंजी निर्गम नियंत्रक का कार्यालय बंद करने की सिफारिश भी शामिल थी।
ऐसी कई और रिपोर्ट भी तैयार की गई थी। वर्ष 1991 के बाद उठाए गए कई कदमों की जिक्र उन सभी रिपोर्ट में था और हो सकता है कि मनमोहन सिंह ने वित्तीय प्रणाली नए सिरे से तैयार करते वक्त उनसे मदद ली हो। उस दौर की दो और बातें ऐसी थीं जिनका वर्ष 1991 के बाद दर्ज भारत की आर्थिक वृद्धि पर गहरा असर पड़ा। एक थी वर्ष 1984 के आसपास बनी नई कंप्यूटर नीति जिसने तकनीक का आयात आसान बनाया, निजी निवेश को बढ़ावा दिया और सॉफ्टवेयर विकास पर ध्यान केंद्रित किया। इससे वर्ष 1990 के दशक के बाद सूचना-प्रौद्योगिकी (आईटी) के क्षेत्र में जबरदस्त तेजी आई।
वर्ष 1984 से पहले सारा ध्यान उत्पादन पर होता था। हमने चंडीगढ़ में एक सेमीकंडक्टर संयंत्र भी लगाया था जिसका मैंने यह कहकर विरोध किया था कि यह फायदेमंद नहीं है। वर्ष 1984 की नीति ने हमारी सोच बदल दी और यह महसूस किया गया कि हमारी असली ताकत कंप्यूटर बनाने में नहीं बल्कि उनके इस्तेमाल में है। इसी सोच की वजह से इन्फोसिस जैसी कंपनियों के आने के बाद हमने जबरदस्त तरक्की देखी।
भले ही लोग वर्ष 1991 को सुधारों की शुरुआत मानते हैं मगर इनसे जुड़े विचार असल में वर्ष 1970 के दशक के आखिर में सामने आने लगे थे। उस समय उन्हें उतनी मजबूती से लागू नहीं किया जा सका। इसकी एक वजह यह थी कि लोक सभा में राजीव गांधी को मिली भारी बहुमत (400 से अधिक सीटें) वी पी सिंह से अलग होने के कारण कमजोर पड़ गई थी। इससे कड़े कदम उठाने की क्षमता सीमित हो गई।
तेल की भी अपनी एक कहानी है। वर्ष 1979 में ईरान की क्रांति के बाद तेल की कीमतें 13 डॉलर से बढ़कर 35-36 डॉलर हो गई मगर तब तक भारत के पास ‘बॉम्बे हाई’ था और आयात पर हमारी निर्भरता शायद 40 प्रतिशत से भी कम हो गई थी। इससे विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर दबाव कम हुआ और सच कहूं तो उस दौर में हम निर्यात बढ़ाने को लेकर थोड़े लापरवाह हो गए।
1980 के दशक में राजकोषीय घाटे पर अफसरशाही और आप जैसे विशेषज्ञों में इसे लेकर सचमुच चिंता थी?
हां। आप इसे वर्ष 1988-89 और उससे भी अधिक 1989-90 में मेरी लिखी आर्थिक समीक्षाओं में देख सकते हैं। वर्ष 1991 की असल चुनौती वर्ष 1989-90 में सामने आई। सोवियत संघ के साथ हमारे गहरे व्यापारिक संबंध थे जो खास भुगतान प्रणालियों पर आधारित थे और जिनमें खुले तौर पर मुद्रा लेन-देन शामिल नहीं था। यह व्यवस्था बाद में ढह गई। इससे वर्ष 1989 के ठीक बाद हमारे विदेशी व्यापार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई।
यही एक मुख्य वजह थी कि वर्ष 1980 के दशक में जिन सुधारों की बात हो रही थी वे वर्ष 1991 में बेहद जरूरी हो गए और फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने उन पर जोर दिया।
हम आईएमएफ के पास पहले क्यों नहीं गए?
इस पर चर्चा हुई थी। एक वजह यह थी कि वर्ष 1989 में चुनाव होने वाले थे इसलिए लगा कि चुनाव से पहले ऐसा नहीं हो सकता और इसे टाल दिया गया। वर्ष 1989 के चुनाव और वर्ष 1991 में पी वी नरसिंह राव के सत्ता में आने तक बीच की अवधि में काफी असमंजस की स्थिति थी।
यहां तक कि जब वर्ष 1991 में कांग्रेस सत्ता में आई तो उसके पास पूर्ण बहुमत नहीं था और वह बाहरी समर्थन पर काफी हद तक निर्भर थी। वर्ष 1980 से भारत की आर्थिक वृद्धि दर औसत 6 प्रतिशत रही है। केवल एक बार मुझे इस रुझान में बदलाव दिखा और वह मौका था वर्ष 2004 और वर्ष 2011 के बीच का। वह सचमुच तेजी का दौर था।
इसके अलावा, पिछले लगभग 40 वर्षों में यह औसत 6 प्रतिशत ही रही है। कई बदलाव जो हुए वे पहले ही शुरू हो गए थे। वर्ष 1970 के दशक की शुरुआत में समाजवाद का जो जुनून था वह वर्ष 1970 के दशक के मध्य तक लगभग खत्म हो गया था।
उस समाजवादी सोच के तहत वर्ष 1973-74 के आस-पास गेहूं के व्यापार का राष्ट्रीयकरण किया गया था मगर वर्ष 1976 तक यह निर्णय वापस ले लिया गया। वर्ष 1970 के दशक के मध्य से लेकर आखिर तक समाजवाद के जुनून में धीरे-धीरे कमी आई और निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिए जाने की सोच बढ़ी। हालांकि निजी क्षेत्र में तेजी वास्तव में वर्ष 1990 के दशक में ही तेजी से बढ़ी। वर्ष 1980 के दशक में भी सार्वजनिक क्षेत्र का आकार बड़ा दिखता है जिसका एक कारण तेल उद्योग में भारी निवेश था।
आपके मुताबिक समाजवाद का जुनून कम हुआ मगर इसका असर सरकारी खजाने की हालत पर नहीं दिखा। सब्सिडी तो बढ़ती ही गई ?
गरीबी पर ध्यान देने की बात तो तब भी बहुत अहम थी। कई मायनों में लोगों को निःशुल्क चीजें या मदद देने का सरकार का निर्णय अब लक्ष्य से काफी भटक गया है। मुझे याद है कि वर्ष 1970 के दशक के आखिर में मैंने एक लेख लिखा था जिसमें इसका जिक्र था कि सरकार निवेश के बजाय निःशुल्क मदद पर अधिक खर्च करने लगी है मगर तब यह खर्च उतना अधिक नहीं था जितना अब है।
उस समय राजकोषीय घाटा जीडीपी का 6 से 7 प्रतिशत था मगर अब यह 4 प्रतिशत के अंदर है। अगर आप सरकारी खर्च में निःशुल्क मदद का हिस्सा देखें तो आपको फर्क समझ आ जाएगा। घाटा बढ़ने के और भी कारण थे जिनमें एक अजीब कर प्रणाली भी शामिल थी। यह ठीक से काम नहीं कर रही था इसलिए सुधार जरूरी थे। मेरा कहना यह है कि सुधार की जरूरत तो हमारी सोच में पहले से ही मौजूद थी।
जब आप वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार थे तब भी औद्योगिक नीति में सुधार पर चर्चा हुई थी। क्या वित्त मंत्री मधु दंडवते इस मुद्दे पर आम सहमति नहीं बना पाए थे? किस तरह की चर्चा हुई थी?
सरकार में कुछ युवा लोगों ने लाइसेंसिंग प्रणाली पर फिर विचार करने का प्रस्ताव दिया था। मगर उस समय मुख्य बाधा वर्ष 1989 के आखिर में होने वाला आम चुनाव था। दंडवते चुनाव के बाद आए और उन्होंने अपनी सोच के हिसाब से काम किया मगर वर्ष 1989 के बाद वी पी सिंह और बाद में चंद्रशेखर के समय सरकारी प्रणाली काफी अव्यवस्थित थी।
मैं जून 1990 तक वहां से निकल गया था इसलिए उसके बाद जो भी हुआ उसमें मैं सीधे तौर पर शामिल नहीं था। उसके बाद राजनीति जिस तरह से आगे बढ़ी वह मेरी समझ से बाहर थी।
उस समय आपकी निजी राय क्या थी? क्या आप इन आर्थिक सुधारों के पक्ष में थे और क्या आपको लग रहा था कि ये सुधार होंगे?
उस समय मैं योजना आयोग में था और हैरानी की बात है कि वहां से काफी समर्थन मिला। आबिद हुसैन उस समय योजना आयोग के सदस्य थे और बहुत जोरदार समर्थक थे और उनके साथ काम करने में मुझे बहुत मजा आया। मेरा काम उस इकाई का नेतृत्व करना था जो सरकारी निवेश के लिए आवेदनों का विश्लेषण करती थी। मगर मैं कुल मिलाकर आर्थिक नजरिये से भी जुड़ा हुआ था और छठी योजना के लिए कुछ लेख भी लिखे थे। आयोग सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए काफी हद तक तैयार था।
आबिद वहां मौजूद थे और एल के झा आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों पर काम कर रहे थे। मेरे लिए दुखद बात यह थी कि चूंकि, वाडीलाल डगली को मोरारजी देसाई ने नियुक्त किया था और उनकी रिपोर्ट 1979 में आई थी, इसलिए इसे जनता पार्टी की रिपोर्ट के तौर पर देखा गया और कांग्रेस सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया। नियंत्रण व सब्सिडी के मामले में इस रिपोर्ट की सोच काफी दूरगामी थी।
कुछ लोगों का मानना है कि विमल जालान (जो उस समय वित्त सचिव थे) और आप लाइसेंस की आवश्यकता समाप्त करने और विनियमन के बहुत अधिक पक्ष में नहीं थे। क्या यह वाकई सच है?
मैं उसमें सीधे तौर पर शामिल नहीं था। समस्या व्यवस्था बदलने के विरोध की नहीं थी बल्कि उससे जुड़ी राजनीति की थी। हो सकता है कि विमल अपनी निजी राय के बजाय अपने मंत्री से अधिक प्रभावित रहे हों। मैं यह नहीं कहूंगा कि मैंने लाइसेंस की आवश्यकता समाप्त करने की वकालत की। मैंने ऐसा नहीं किया।
मैंने लोगों से डगली रिपोर्ट ध्यान से पढ़ने के लिए जरूर कहा था मगर उसमें कामयाबी नहीं मिली। उस समय लाइसेंस की आवश्यकता समाप्त करना कोई ठोस, औपचारिक प्रस्ताव नहीं था। जितना मुझे याद है, यह प्रस्ताव न तो उद्योग मंत्रालय की तरफ से और न ही किसी अन्य महकमे से आया था। बहस मुख्य रूप से बौद्धिक स्तर पर थी।
जब मनमोहन सिंह ने जुलाई 1991 में वह मशहूर बजट भाषण पढ़ा तो क्या आप उनकी बातों से हैरान थे?
नहीं, क्योंकि यह तो होना ही था। मेरा मानना था कि हमें ऐसा करना ही होगा क्योंकि जब तक हम ऐसा नहीं करते आईएमएफ से हमें मदद नहीं मिलती। यह बात तो वर्ष 1989-90 में भी काफी साफ थी। हम उस समय राजनीतिक कारणों से आईएमएफ के पास नहीं जा सकते थे मगर मुझे एहसास हो गया था कि आईएमएफ यही शर्त रखेगा।
क्या वर्ष 1991 में कुछ सुधार इसलिए नहीं किए गए कि राजनीतिक व्यवस्था इनके लिए तैयार नहीं थी?
मुझे जो सुधार सबसे दिलचस्प और शायद सबसे बड़ा बदलाव लाने वाले लगते हैं वे वित्तीय क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। इन सुधारों की शुरुआत पहले ही हो चुकी थी। पूंजी निर्गम नियंत्रक हटाने की प्रक्रिया असल में तब शुरू हुई थी जब मैं वित्त मंत्रालय में था और उस समय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड बनाने का निर्णय लिया गया था। हालांकि, तब तक वह कानूनी संस्था नहीं बनी थी। यह बात 1988 की बात है।
पहले से ही यह उम्मीद थी कि शेयर जारी करने का नियंत्रण वित्त मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव के हाथ से निकलकर एक अधिक स्वतंत्र और व्यापक दृष्टिकोण रखने वाली वाली संस्था के पास चला जाएगा।
मेरे हिसाब से वर्ष 1991 के बाद सबसे बड़ा सुधार वित्तीय सेक्टर का निजीकरण है। इनमें निजी बैंकों एवं निजी म्युचुअल फंडों को मंजूरी मिलना (जो पहले केवल सरकारी यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया तक सीमित थे) और नए स्टॉक एक्सचेंज (नैशनल स्टॉक एक्सचेंज) का स्थापित होना आदि अहम सुधार शामिल थे।
लाइसेंस की जरूरत समाप्त करने के असर को लेकर मैं पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूं। मुझे ठीक से नहीं पता कि इसका कितना बड़ा प्रभाव पड़ा क्योंकि अलग-अलग रूपों में नियंत्रण बने रहे। मैं तो यह कहूंगा कि आज सरकार बड़ी कंपनियों से कहीं अधिक जुड़ी हुई है। असल में लाइसेंस की शर्त समाप्त करने का कदम इन समूहों पर नियंत्रण करने के एक तरीके के तौर पर देखा गया था।
हालांकि, वर्ष 1980 के दशक में लाइसेंस व्यवस्था की वजह से एक और बात हुई यानी नए तरह के उद्ममी सामने आए। अंबानी जैसे लोग मुख्य इसलिए आगे बढ़ पाए क्योंकि लाइसेंस व्यवस्था ने टाटा और बिड़ला जैसे बड़े और स्थापित घरानों पर नियंत्रण कस रखा था। अगर लाइसेंस व्यवस्था ने बड़ी कंपनियों को सीमित न किया होता तो रिलायंस कभी आगे नहीं आ पाती।
जब आप मौजूदा भारतीय अर्थव्यवस्था को देखते हैं तो आपको सबसे अधिक चिंता किस बात की होती है?
विनिर्माण क्षेत्र का बहुत कमजोर है। विनिर्माण में सार्वजनिक निवेश से निजी निवेश की ओर तेजी से बदलाव हुआ है मगर अब निजी क्षेत्र बहुत सतर्क दिख रहा है। जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी कम होकर 14 प्रतिशत रह गई है। पिछले दशक में इसमें गिरावट आई है। साथ ही, अगर आप राष्ट्रीय लेखा के आंकड़े देखें तो इस क्षेत्र में निजी कंपनियों से आने वाले निवेश का अनुपात भी कम हुआ है।
सेवा क्षेत्र, खासकर आईटी सेवाओं के तेज विस्तार की वजह से यह बात दबी रही मगर अब हम ऐसी स्थिति का सामना कर रहे हैं जब इस क्षेत्र में वृद्धि सीमित होने वाली है।
इस साल पहली बार बड़ी आईटी कंपनियों में रोजगार कम हुआ है। लिहाजा, अब विनिर्माण क्षेत्र की रफ्तार तेज करने पर ध्यान देना और भी जरूरी हो गया है, खासकर रोजगार के लिहाज से। आईटी क्षेत्र स्नातक पास युवाओं को रोजगार देने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा था मगर हमारी असल चुनौती कृषि पर निर्भर 40-45 प्रतिशत लोगों को दूसरे कार्यों में लगाने की है।
यह काम विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार के जरिये ही हो पाएगा। वर्ष 2050 तक भारत की कामकाजी आबादी में होने वाली बढ़ोतरी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार आदि) में होगा इसलिए समय रहते सचेत होना जरूरी है।
इसके पीछे एक गहरी वजह भी है। विकास की असलियत वही है जिसे जोसेफ शुम्पीटर ने ‘क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन’ यानी रचनात्मक विनाश कहा था यानी नए लोग उभरती हुई तकनीक को सलाम करते हैं और पुरानी को खास तवज्जो नहीं देते हैं। आईटी क्षेत्र का ही उदारण लें। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस के अलावा इन्फोसिस और विप्रो जैसी नई कंपनियां ही इसमें आगे आईं न कि पहले से स्थापित बड़े कारोबारी समूह।
आज अंतरिक्ष क्षेत्र पर विचार करें तो इससे जुड़ी सेवाएं देने वाली निजी कंपनियों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। इसकी शुरुआत किसी बड़े औद्योगिक समूह ने नहीं बल्कि दो इंजीनियरों ने की थी जिन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) छोड़ दिया था।
भारत में जिस चीज की अदद कमी है वह है नए लोगों को बढ़ावा देना। यहां तक कि ऐसे साधारण उद्योगों को भी बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है जो इतनी आकर्षक नौकरियां पैदा कर सकें कि लोग खेती-बाड़ी छोड़कर उनकी ओर मुड़ सकें।