म्युचुअल फंड

नॉमिनी के लिए राहत, सेबी ने बदली म्युचुअल फंड क्लेम प्रक्रिया; जानिए क्या बदला

सेबी ने म्युचुअल फंड ट्रांसमिशन के नियम आसान कर दिए हैं। अब निवेशक की मौत के बाद क्लेम प्रक्रिया में पता, नाम या हस्ताक्षर की छोटी गलतियों पर अनावश्यक देरी नहीं होगी।

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अमित कुमार   
Last Updated- July 21, 2026 | 5:12 PM IST

परिवार के किसी सदस्य को खोना भावनात्मक रूप से बेहद कठिन होता है। ऐसे समय में उनके वित्तीय निवेश का दावा करने के लिए लंबी कागजी प्रक्रिया पूरी करना परिवार के लिए एक नई मु​श्किल खड़ी कर देता है। कई परिवारों के लिए निवेशक की मृत्यु के बाद म्युचुअल फंड यूनिट्स अपने नाम ट्रांसफर कराना एक लंबी प्रक्रिया बन जाती थी। इसकी वजह अक्सर रिकॉर्ड में छोटी-छोटी गड़बड़ियां होती थीं, जैसे पुराना पता, नाम की स्पेलिंग में मामूली अंतर या ऐसा हस्ताक्षर जो अब रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता।

अब भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) को म्युचुअल फंड इंडस्ट्री की ट्रांसमिशन प्रक्रिया आसान बनाने का निर्देश दिया है। संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। इसका मकसद छोटे दस्तावेजी अंतर की वजह से होने वाली देरी को कम करना है, जबकि कानूनी सुरक्षा पहले की तरह बनी रहेगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि इससे वास्तविक दावों का निपटारा आसान होगा। हालांकि निवेशकों को अभी भी अपने रिकॉर्ड समय समय पर अपडेट रखना चाहिए, ताकि बाद में उनके परिवार को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।

सेबी ने क्या बदला है?

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) को हर छोटे रिकॉर्ड अंतर को असाधारण मामला मानने की जरूरत नहीं होगी। जैसेकि, अगर म्युचुअल फंड फोलियो में दर्ज पता और दावेदार के KYC रिकॉर्ड में दर्ज पता अलग है, तो अब AMC अतिरिक्त एफिडेविट या घोषणा पत्र मांगने के बजाय दावेदार के नवीनतम सत्यापित पते को स्वीकार कर सकती है, बशर्ते उसके सपोर्ट में वेलिड दस्तावेज मौजूद हों। इसी तरह नाम या हस्ताक्षर में मामूली अंतर होने पर भी अब तय प्रक्रिया के तहत सत्यापन करके दावा निपटाया जा सकेगा। पहले ऐसे मामलों में बार बार दावा खारिज हो जाता था।

1 Finance में विल और एस्टेट प्लानिंग प्रमुख श्रद्धा निलेश्वर कहती हैं कि पहले छोटी सी गड़बड़ी भी दावे को कई महीनों तक लंबित रख सकती थी। परिवारों को नोटरी से सत्यापित शपथपत्र, इंडेम्निटी बॉन्ड और कई अन्य दस्तावेज जमा करने पड़ते थे। अब संशोधित व्यवस्था के तहत AMC दावेदार के नवीनतम KYC रिकॉर्ड और अन्य सहायक दस्तावेजों के आधार पर सामान्य समय सीमा के भीतर दावा निपटा सकती है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी दिवंगत निवेशक के म्युचुअल फंड फोलियो में पुराना कार्यालय का पता दर्ज हो और नामित व्यक्ति के KYC में नया पता हो, तो पहले इस अंतर की वजह से ट्रांसमिशन में चार से छह सप्ताह की अतिरिक्त देरी हो सकती थी। अब AMC सीधे KYC में दर्ज नए पते को मानकर प्रक्रिया पूरी कर सकती है।

बार-बार दस्तावेज जमा करने से राहत

विशेषज्ञों का कहना है कि पहले समस्या सिर्फ तय समय सीमा नहीं थी, बल्कि बार-बार आपत्तियां लगने की वजह से परिवारों को कई बार दस्तावेज दोबारा जमा करने पड़ते थे। Rupeezy में म्युचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूशन प्रमुख विवेक अग्रवाल कहते हैं कि जिन मामलों में सभी दस्तावेज सही होते थे, उनमें पहले भी 10 से 15 कार्य दिवस में दावा निपट जाता था। असली परेशानी यह थी कि दावा पूरा मानने से पहले कई बार अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाते थे।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 8 लाख रुपये के म्युचुअल फंड निवेश वाले एक दावे में केवल पुराने पते और नाम में मामूली अंतर की वजह से दावा वापस कर दिया जाता था। इसके बाद परिवार को शपथपत्र और अन्य दस्तावेज दोबारा जमा करने पड़ते थे, जिससे पूरी प्रक्रिया लगभग दो महीने तक खिंच जाती थी। अब ऐसे मामलों में KYC दस्तावेज और स्वयं सत्यापित पहचान पत्र के आधार पर एक ही बार में दावा निपटाया जा सकेगा।

किन मामलों में अब भी दिक्कत रहेगी?

विशेषज्ञों का कहना है कि नए नियम केवल दस्तावेजी अड़चनें कम करते हैं। उत्तराधिकार से जुड़े कानूनों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

Aarthiq के को-फाउंडर और डायरेक्टर मयंक प्रकाश कहते हैं कि नए नियमों में सामान्य दस्तावेजी अंतर और कानूनी विवाद वाले मामलों के बीच स्पष्ट अंतर किया गया है। लेकिन अगर कोई नॉमिनी नहीं है, कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच विवाद है या वैध वसीयत (Will) नहीं है, तो ऐसे मामलों में पहले की तरह उत्तराधिकार प्रमाण पत्र, प्रोबेट या अदालत के आदेश की जरूरत पड़ेगी।

दिल्ली हाई कोर्ट के वकील विवेक कुमार भी कहते हैं कि नए नियमों से प्रक्रिया आसान हुई है, लेकिन कानूनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया गया है। यदि निवेश के मालिकाना हक को लेकर विवाद होता है या कई उत्तराधिकारी दावा करते हैं, तो संबंधित उत्तराधिकार कानून ही लागू होंगे।

श्रद्धा निलेश्वर का कहना है कि जहां नॉमिनी नहीं होगा, वहां परिस्थितियों के अनुसार उत्तराधिकार प्रमाण पत्र, कानूनी उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र या प्रोबेट की जरूरत पड़ सकती है। अगर कई कानूनी उत्तराधिकारी हों, तो AMC सभी उत्तराधिकारियों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) या अदालत का आदेश भी मांग सकती है।

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अब निवेशकों को क्या करना चाहिए?

विशेषज्ञों का कहना है कि नए नियमों से निवेश का दावा करना आसान जरूर होगा, लेकिन इसके लिए निवेशकों को अपने जीवनकाल में रिकॉर्ड नियमित रूप से अपडेट रखने होंगे। उनकी सलाह है कि निवेशक समय समय पर नॉमिनी की जानकारी, PAN, KYC, आधार से जुड़ा पता, बैंक खाता, रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी और हस्ताक्षर की जानकारी की समीक्षा करते रहें।

साथ ही निवेश से जुड़े सभी दस्तावेज व्यवस्थित रखें, ताकि परिवार के सदस्यों को यह पता रहे कि निवेश कहां किया गया है।

नॉमिनेशन को एक बार की प्रक्रिया नहीं मानना चाहिए। शादी, घर बदलने या बैंक खाता बदलने जैसे बड़े जीवन परिवर्तन के बाद नाम, पता, PAN, बैंक विवरण और हस्ताक्षर सभी रिकॉर्ड में एक जैसे हैं या नहीं, इसकी जांच करनी चाहिए। हर बड़े लाइफ साइकल के बाद नॉमिनेशन की समीक्षा करें और कंसोलिडेटेड अकाउंट स्टेटमेंट सुरक्षित रखें, ताकि परिवार के सदस्य आसानी से निवेश का पता लगा सकें।

वे यह भी कहते हैं कि परिवार को म्युचुअल फंड निवेश की जानकारी देना उतना ही जरूरी है जितना रिकॉर्ड अपडेट रखना। अगर नॉमिनी या कानूनी उत्तराधिकारी को यह पता ही नहीं होगा कि निवेश मौजूद है, तो सबसे आसान ट्रांसमिशन प्रक्रिया भी कोई मदद नहीं कर पाएगी।

सेबी के नए नियमों से परिवारों के लिए अनावश्यक कागजी कार्रवाई जरूर कम होगी, लेकिन सबसे आसान दावा वही होगा जिसमें रिकॉर्ड अपडेट हों, वैध नॉमिनी दर्ज हो और जरूरत पड़ने पर सही तरीके से तैयार की गई वसीयत मौजूद हो।

First Published : July 21, 2026 | 5:12 PM IST