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Editorial: जापान और यूनाइटेड किंगडम की अर्थव्यवस्था में मंदी और वैश्विक खतरे

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Recession in Japan : दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं जापान और यूनाइटेड किंगडम ने कहा कि लगातार दो तिमाहियों से उनके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि ऋणात्मक है।

Last Updated- February 19, 2024 | 9:42 PM IST
जापान और यूनाइटेड किंगडम की अर्थव्यवस्था में मंदी और वैश्विक खतरे, Editorial: Recession and global threats in the economy of Japan and United Kingdom

गत सप्ताह दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं जापान और यूनाइटेड किंगडम ने कहा कि लगातार दो तिमाहियों से उनके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि ऋणात्मक है। आमतौर पर अर्थशास्त्री इसे अर्थव्यवस्था के मंदी में जाने का संकेत मानते हैं। इसकी वजह से जापान शायद सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की सूची में नीचे फिसल जाए। जर्मनी की जीडीपी जापान से अधिक हो सकती है। ऐसे में जापान अब शायद दुनिया की तीसरी के बजाय चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश होगा। ऐसा भी नहीं है कि जर्मनी बहुत अच्छी स्थिति में है।

एक समय यूरो क्षेत्र के विकास का इंजन रहा जर्मनी अब उसकी सबसे कमजोर कड़ी है। दो दशकों तक जर्मनी की निर्यातोन्मुखी, विनिर्माण आधारित अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन अच्छा रहा क्योंकि उसे चीन की उत्पादकता और मांग की मदद हासिल थी और रूस से सस्ती प्राकृतिक गैस आसानी से मिल रही थी। अब भूराजनीतिक कारणों से वृद्धि के ये दोनों कारक सीमित हो गए हैं।

वर्ष 2024 में जर्मनी के सालाना आधार पर 0.2 फीसदी वृद्धि हासिल करने का अनुमान है जबकि इसके 1.3 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान जताया गया था। इससे पिछले वर्ष 0.3 फीसदी की गिरावट आई थी। यूनाइटेड किंगडम की मंदी में राजनीति की भी भूमिका रही है। 2016 में यूरोपीय संघ से अलग होने के निर्णय के असर अब नजर आने शुरू हुए हैं। इसके अलावा दिक्कतदेह घरेलू राजनीति का एक अर्थ यह भी है कि देश नए आवास और अधोसंरचना तैयार करने में नाकाम रहा है। इससे उपभोक्ता अपेक्षाकृत गरीब महसूस कर रहे हैं। कमजोर उपभोक्ता मांग ने अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर धकेल दिया।

आज दुनिया भर में आर्थिक वृद्धि के समक्ष राजनीति एक जोखिम के रूप में उभरी है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में बेहतर प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल अमेरिका भी इस खतरे से मुक्त नहीं है। अमेरिकी बाजार जहां रिकॉर्ड ऊंचाई तक पहुंच रहे हैं लेकिन कंपनियों ने आय के इस सत्र में लाल सागर पर हो रहे हमलों तथा इजरायल और फिलिस्तीन पर मतभेद के कारण घरेलू बहिष्कार का असर अपने मुनाफे पर पड़ने के खतरे का जिक्र शुरू कर दिया है। फास्ट फूड चेन मैकडॉनल्ड के इजरायल में कारोबार के असंगठित बहिष्कार ने पिछली तिमाही में उसके प्रदर्शन पर बुरा असर डाला है।

इस बीच दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश चीन भी तेज वृद्धि के दिनों से दूर हो गया है। रविवार को पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने ब्याज दरों में कटौती नहीं करने का निर्णय लिया। हालांकि देश कमजोर मांग और अचल संप​त्ति के संकट के बीच अपस्फीति के मुद्दे से जूझ रहा है। गत माह चीन में उच्च मूल्य वाले अचल संपत्ति लेनदेन का आकार 2023 के समान महीने की तुलना में एक तिहाई कम था। चीन के जीडीपी के आकार और वृद्धि को मद्देनजर रखते हुए अगर वृद्धि को बहाल करना है तो बाजार में सुधार आवश्यक है। परंतु यहां भी राजनीति का हस्तक्षेप है।

अचल संपत्ति में सुधार के लिए चीन को दिवालिया प्राधिकारों, स्थानीय सरकारों और निजी क्षेत्र में सत्ता के स्वतंत्र केंद्र स्थापित करने होंगे। वह ऐसा नहीं करना चाहता। एकमात्र अपवाद जापान है। आखिर में उसकी अर्थव्यवस्था में गिरावट लाजिमी है क्योंकि उसके सामने जनसंख्या संबंधी चुनौतियां भी हैं। उसकी समस्याएं राजनीतिक नहीं बल्कि ढांचागत हैं, बशर्ते यह दलील न दी जाए कि देश राजनीतिक शिथिलता के कारण इतने सामाजिक सुधार नहीं कर पा रहा है ताकि लोगों को और बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित किया जा सके।

भूराजनीति के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को कई झटके लगे हैं। यूक्रेन युद्ध ने ईंधन कीमतों को प्रभावित किया, अमेरिका-चीन की प्रतिद्वंद्विता ने आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित किया। अब पश्चिम एशिया में अस्थिरता दिख रही है। कई देशों में महामारी के बाद समुचित सुधार नहीं हुआ था, वे सभी विश्व व्यवस्था को बरकरार रखने में नाकामी की वजह से मुश्किल में हैं।

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First Published - February 19, 2024 | 9:42 PM IST

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