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समान अवसर का मैदान: VI को मिलने वाली मदद सिर्फ उसी तक सीमित नहीं होनी चाहिए

वोडाफोन आइडिया को एजीआर बकाया चुकाने में दी गई मोहलत को टेलीकॉम सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बचाने की कोशिश बताया गया है लेकिन समान अवसर का सवाल भी उठाया गया है

Last Updated- January 04, 2026 | 10:50 PM IST
Vodafone Idea
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

वोडाफोन आइडिया (वीआई) को सरकार को अपने समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) का बकाया चुकाने के लिए मिली पांच साल की मोहलत, वित्तीय संकट से जूझ रही इस दूरसंचार सेवा प्रदाता के लिए एक बड़ी राहत है। इस रियायत के बाद वीआई के पास यह अवसर होगा कि वह अपने 87,695 करोड़ रुपये के एजीआर बकाये का भुगतान मार्च 2026 से शुरू करने के बजाय 2031-32 से 2040-41 के बीच कर सके। इससे कंपनी को धन जुटाने, अपने कारोबार को मजबूत करने और इस बीच ग्राहकों के पलायन को रोकने का अवसर मिलेगा।

हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा वीआई के एजीआर बकाये को पांच साल के लिए स्थगित करने की मंजूरी सरकार का एक अहम कदम है ताकि दूरसंचार क्षेत्र में दो कंपनियों का दबदबा (डुओपोली) बनने से रोका जा सके। यह ऐसे समय में हुआ है जब इंडिगो की उड़ानों के रद्द होने से नए पायलट विश्राम नियमों पर उत्पन्न अराजकता के बाद विमानन क्षेत्र में लगभग डुओपोली की स्थिति पर ध्यान केंद्रित हुआ है। भारतीय विमानन में इस डुओपोली चरित्र को उलटने के प्रयास में सरकार ने कई कंपनियों को एयरलाइन शुरू करने के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र भी जारी किए हैं।

बहरहाल, यह बात ध्यान देने लायक है कि डुओपोली रोकने की कोशिश में किसी भी क्षेत्र में समान कारोबारी हालात के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। दूरसंचार भी इससे अलग नहीं है। अभी कुछ वर्ष पहले तक इस क्षेत्र में कई सेवा प्रदाता थे और फिर 2 जी घोटाला सामने आने के बाद इनमें से कई कंपनियां कारोबार से बाहर हो गईं। ऐसे में अगर वीआई को, जिसमें सरकार की 49 फीसदी हिस्सेदारी है,  अगर बकाया एजीआर चुकाने के लिए समय दिया जाता है तो एक अन्य निजी कंपनी भारती एयरटेल भी ऐसी ही मदद की हकदार है। भले ही उसकी वित्तीय हालत कहीं अधिक मजबूत है। तीसरी निजी दूरसंचार कंपनी रिलायंस जियो ने 2016 में ही सेवा देनी शुरू की है और इसलिए उसका कोई एजीआर बकाया नहीं है।

एजीआर बकाया वह राशि है जिसे सभी दूरसंचार कंपनियों को सरकार को देनी है। इनमें भारत संचार निगम लिमिटेड और महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियां भी शामिल हैं। यह राशि लाइसेंस शुल्क और स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क के रूप में होती है। पिछले मॉडल में कंपनियां दूरसंचार लाइसेंस के लिए एक निश्चित शुल्क अदा करती थीं। इसके विपरीत, 1999 में राजस्व-साझेदारी का प्रारूप लागू किया गया, जिसमें दूरसंचार कंपनियों को अपने सकल राजस्व का एक निश्चित प्रतिशत हिस्सा सरकार के साथ लाइसेंस शुल्क और स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क के रूप में साझा करना अनिवार्य किया गया। लेकिन एजीआर की परिभाषा लंबे समय से विवाद का विषय रही है।

विवाद यह है कि कंपनी के पूरे राजस्व को गिना जाए या केवल दूरसंचार राजस्व को। इसने हितधारकों को वर्षों तक अदालतों में अटकाया। अक्टूबर 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने, जिसे एक महीने बाद कुछ संशोधित किया गया, 31 दिसंबर को वीआई को दी गई पांच साल की मोहलत पर केंद्रीय मंत्रिमंडल के निर्णय की पृष्ठभूमि तैयार की। अदालत ने केंद्र सरकार को वित्तीय वर्ष 2016-17 तक वीआई के एजीआर बकाये का पुनर्मूल्यांकन और सामंजस्य करने की अनुमति दी।

यह पहला मौका नहीं है जब वीआई को सरकार से राहत मिली है। इससे पहले, भारी कर्ज में डूबी इस दूरसंचार कंपनी को दूरसंचार क्षेत्र के लिए बनाए गए राहत पैकेज का लाभ मिला था। सरकार ने वीआई के बकाये को किस्तों में अपनी हिस्सेदारी में बदल दिया, जो अब 49 फीसदी पर है। इससे आगे बढ़ने पर सरकार कंपनी में बहुल शेयरधारक बन जाएगी।

यह मोहलत वीआई की वित्तीय और कारोबारी स्थिति को एक हद तक स्थिर बनाने की संभावना रखती है, जबकि सरकार इस वर्ष की शुरुआत में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई अनुमति के अनुसार बकाये की मात्रा का पुनर्मूल्यांकन कर रही है। चूंकि अदालत ने अधिकारियों को अन्य दूरसंचार कंपनियों को मोहलत या राहत देने से नहीं रोका है, सरकार को व्यवसायों के साथ समानता सुनिश्चित करने के लिए इस संभावना को भी तलाशना चाहिए।

First Published - January 4, 2026 | 10:49 PM IST

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