केंद्र सरकार ने 4,531 करोड़ रुपये की जो बाजार पहुंच सहयोग (मार्केट एक्सेस सपोर्ट) योजना घोषित की है, वह एक स्वागत योग्य कदम है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि यह ऐसे समय पर आई है जब निर्यातकों को धीमी होती वैश्विक मांग के साथ प्रमुख बाजारों मसलन अमेरिका आदि में उथल-पुथल का सामना करना पड़ रहा है। खरीदार-विक्रेता मुलाकात, व्यापार मेलों, खरीदार प्रतिनिधिमंडलों का उल्टा दौरा और बाजार विविधीकरण आदि यह समझ सामने लाते हैं कि कंपनियों की मदद करके हम नए बाजार तलाश सकते हैं, अपनी मौजूदगी प्रदर्शित कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर शुल्क वृद्धि से त्रस्त क्षेत्रों से परे पहुंच बना सकते हैं।
यह योजना सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों यानी एमएसएमई की ओर खासतौर पर झुकाव रखती है। बहरहाल, एक्जिम बैंक की एक रिपोर्ट दिखाती है कि उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत एमएसएमई में से केवल एक फीसदी ही निर्यात कर रहे हैं। विदेश में मौजूद अवसरों के बारे में जानकारी की कमी, खरीदारों के साथ कमजोर रिश्ता, मार्केटिंग की चुनौतियां और ऋण की कमी आदि बाधा बने हुए हैं।
इस संदर्भ में, समर्थित आयोजनों में एमएसएमई की न्यूनतम 35 फीसदी अनिवार्य भागीदारी प्रवेश बाधाओं को कम करती है और निर्यात प्रोत्साहन में लंबे समय से चले आ रहे उस असंतुलन को दूर करती है, जिसने बड़े उद्यमों को प्राथमिकता दी है। योजना निर्यात की मांग-पक्ष को संबोधित करने में अच्छा काम करती है। जैसे बाजार खोज, नेटवर्किंग और प्रचार। लेकिन यह आपूर्ति-पक्ष की उन संरचनात्मक बाधाओं को हल नहीं कर सकती जो भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर कर रही हैं।
निर्यातकों की दिक्कतें केवल शुल्क वृद्धि तक सीमित नहीं हैं बल्कि उन पर लगाए गए एंटी-डंपिंग या प्रतिकारी शुल्क, जो शुल्क के अतिरिक्त होते हैं, वे भी उसमें इजाफा करते हैं। सूचना का अधिकार के तहत किए गए एक आवेदन पर जवाब देते हुए सरकार ने खुद कहा कि घरेलू कच्चे माल की ऊंची लागत और ईंधन की उच्च कीमतों के कारण वैश्विक स्तर से 15 से 20 फीसदी की अधिक लागत चिंता का विषय है।
कई राज्यों ने मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं की अनुपस्थिति पर चिंता जताई है, जिसके कारण निर्यातकों को नमूने अन्य राज्यों में भेजने पड़ते हैं। इससे लागत, समय और अनिश्चितताएं बढ़ जाती हैं। लॉजिस्टिक्स की बाधाएं बाजार तक पहुंच से होने वाले लाभ को और कमजोर करती हैं। कंटेनरों की कमी, ऊंचे मालभाड़े और खाली कंटेनरों पर लगाए गए शुल्क, विशेषकर समुद्र से दूर जमीन से घिरे राज्यों के लिए, प्रतिस्पर्धात्मकता पर सीधा असर डालते हैं।
इस स्थिति में, योजना को ऐसे उपायों का पूरक बनाने की आवश्यकता है जो माल भाड़ा मूल्य निर्धारण, कंटेनर उपलब्धता और अंतर्देशीय संपर्क जैसी समस्याओं को संबोधित करें। नियामकीय टकराव इन चुनौतियों को और बढ़ा देता है। निर्यातकों ने इस बात पर चिंता जताई है कि भारतीय मानक ब्यूरो के मानदंड तब भी लागू किए जा रहे हैं जब गंतव्य बाजार अलग मानकों का पालन करते हैं। इससे अनुपालन लागत बढ़ती है लेकिन कोई स्पष्ट लाभ नहीं मिलता। ऐसे वातावरण में, विदेशी मेलों में भागीदारी को सुगम बनाना उन उत्पादों की मार्केटिंग की कवायद बन जाने का जोखिम उठाता है जो पहले से ही प्रतिस्पर्धा से बाहर की कीमत पर हैं।
जहां सरकार को निर्यातकों और उद्योग संगठनों के साथ निरंतर जुड़ाव का श्रेय दिया जाना चाहिए, वहीं ये परामर्श मुख्यतः परिचालन संबंधी शिकायतों पर केंद्रित रहे हैं, बजाय इसके कि उन्हें एक सुसंगत और दूरदर्शी निर्यात रणनीति में शामिल किया जाए। इसके अतिरिक्त, ‘निर्यातित उत्पादों पर शुल्क और करों की वापसी’ तथा ‘राज्य और केंद्र करों व अधिभारों की रियायत’ जैसी योजनाएं, जिन्हें विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप निर्यातकों को सहारा देने के लिए शुरू किया गया था, अस्थायी हैं और कुछ महीनों के लिए ही बढ़ाई जाती हैं। ऐसी अस्थायी व्यवस्थाएं नीति की स्थिरता और विश्वास को कमजोर करती हैं।
निर्यात में लचीलापन हासिल करने के लिए नीतिगत प्रतिक्रिया कई परत वाली होनी चाहिए। बाजार तक पहुंच सहयोग के साथ-साथ सस्ते और अधिक विश्वसनीय कच्चे माल, कम ऊर्जा लागत, पर्याप्त परीक्षण अधोसंरचना, सुगम लॉजिस्टिक्स और गंतव्य बाजारों के साथ नियामकीय सामंजस्य भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।