जब बेंगलुरु की एक प्रोफेशनल ने इस साल की शुरुआत में एक क्विक कॉमर्स ऐप से दूध मंगवाया, तो उसके साथ एक फ्लेवर्ड दही का छोटा पैक भी आया। यह उसका प्लान नहीं था, लेकिन उसने उसे चख लिया। एक हफ्ते बाद उसने वही दही दोबारा मंगवाई, इस बार जानबूझकर। इसी तरह, दिल्ली की रहने वाली लतिशा ने इंस्टामार्ट से नोइस ब्रांड का पनीर मंगवाया। उन्होंने कहा, “मैंने पहले कभी यह ब्रांड नहीं सुना था। डिस्काउंट था, इसलिए ट्राई किया। क्वालिटी अच्छी लगी और अब मैं इसे बार-बार खरीद रही हूं।” ऐसे अनुभव बताते हैं कि ब्लिंकिट, जेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट, अमेजन नाउ और बिगबास्केट BB Now जैसे ऐप अब सिर्फ तेजी से सामान पहुंचाने के लिए नहीं हैं, बल्कि नए ब्रांड्स की पहचान बनाने का भी बड़ा जरिया बन गए हैं।
इकोसोल होम के को-फाउंडर और CEO राहुल सिंह ने कहा कि क्विक कॉमर्स ने भीड़भाड़ वाले बाजार में नए ब्रांड्स को तुरंत दिखने का मौका दिया है। उन्होंने कहा, “अब ब्रांड ठीक उसी समय और जगह पर मौजूद होता है, जब ग्राहक को उसकी जरूरत होती है।”
एडफैक्टर्स के डायरेक्टर समीर कपूर के मुताबिक, क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म नए ब्रांड्स को छोटे स्तर पर प्रोडक्ट लॉन्च करने का मौका देते हैं। ब्रांड कुछ खास इलाकों में पहले प्रोडक्ट बेचकर यह जांच सकते हैं कि डिमांड कैसी है, कीमत सही है या नहीं और ग्राहक को प्रोडक्ट पसंद आ रहा है या नहीं। इससे बड़े निवेश का जोखिम कम हो जाता है। पारंपरिक ई-कॉमर्स में खरीदारी अक्सर पहले से प्लान की जाती है, लेकिन क्विक कॉमर्स तुरंत जरूरत पर चलता है। लोग हफ्ते में कई बार इन ऐप्स को खोलते हैं, ज्यादातर रोजमर्रा के सामान के लिए। इसी दौरान नए ब्रांड्स नजर में आ जाते हैं।
पी सेफ की क्विक कॉमर्स लीड करुण अरोड़ा ने कहा कि क्विक कॉमर्स ने उनके ब्रांड को खास से आम जरूरत का ब्रांड बना दिया। वहीं, मार्स कॉस्मेटिक्स की मार्केटिंग हेड अनमोल सहाय माथुर का कहना है कि 10–20 मिनट में डिलीवरी मिलने से नए प्रोडक्ट को ट्राई करने का डर कम हो जाता है। समीर कपूर ने कहा कि जब कोई नया ब्रांड अमेजन फ्रेश या अमेजन नाउ जैसे भरोसेमंद प्लेटफॉर्म पर मिलता है, तो प्लेटफॉर्म का भरोसा अपने आप ब्रांड को मिल जाता है। अब स्टार्टअप्स क्विक कॉमर्स को सिर्फ बिक्री का नहीं, बल्कि मार्केटिंग चैनल के रूप में भी देख रहे हैं। ऐप के अंदर दिखने वाले विज्ञापन, सर्च में ऊपर दिखना और होमपेज पर जगह पाने के लिए ब्रांड अब सोशल मीडिया की बजाय क्विक कॉमर्स पर पैसा खर्च कर रहे हैं।
कई ब्रांड अब डिलीवरी बैग के अंदर पर्ची, कूपन या फ्लायर डाल रहे हैं। इससे ग्राहक सामान खोलते वक्त ही ब्रांड से जुड़ जाता है। एक ब्रांड एक्सपर्ट ने कहा, “यह डिजिटल विज्ञापन से ज्यादा असरदार लगता है।” अब बड़े और पुराने ब्रांड भी क्विक कॉमर्स की तरफ बढ़ रहे हैं। खेलों के सामान बेचने वाली कंपनी डेकाथलॉन भी कुछ शहरों में तेज डिलीवरी की तैयारी कर रही है। इससे साफ है कि क्विक डिलीवरी अब सिर्फ ग्रोसरी तक सीमित नहीं रही।
दिल्ली के एक उद्यमी, जो मखाना ब्रांड लॉन्च करने की तैयारी में है, कहते हैं कि उनकी पूरी योजना क्विक कॉमर्स पर आधारित है। उनका कहना है, “अगर ग्राहक जरूरी सामान मंगाते वक्त आपको खोज ले, तो आधी लड़ाई वहीं जीत ली जाती है।”
हालांकि, क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म अपने खुद के प्राइवेट ब्रांड्स को ज्यादा बढ़ावा देते हैं, जिससे नए ब्रांड्स को मुकाबला करना पड़ता है। फिर भी स्टार्टअप्स मानते हैं कि शुरुआत में पहचान और पहुंच ज्यादा जरूरी है, मुनाफा बाद में आएगा।
अभी क्विक कॉमर्स पर ब्रांडिंग ज्यादातर मेट्रो शहरों तक सीमित है, लेकिन अब कुछ टियर-2 शहरों में भी यह मॉडल आजमाया जा रहा है। जैसे-जैसे मुकाबला बढ़ेगा, क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के लिए विज्ञापन और ब्रांड पार्टनरशिप कमाई का बड़ा जरिया बनेंगी। ब्रांड्स के लिए 10 मिनट की डिलीवरी अब 10 मिनट की ब्रांडिंग का मौका बन चुकी है।