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Editorial: कैसे दोहा, दुबई से बेहतर होगा दिल्ली

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अंतरराष्ट्रीय हब तैयार करना आसान नहीं है। दिल्ली के कुल टैरिफ का केवल 20 फीसदी ही एक जगह से दूसरी जगह जाने वालों का है। इसमें सुधार की बहुत अधिक गुंजाइश है।

Last Updated- January 15, 2025 | 11:37 PM IST
A charter plane grounded in France for a human trafficking
प्रतीकात्मक तस्वीर

खबरों के मुताबिक पूर्ण सेवाएं प्रदान करने वाली देश की इकलौती विमानन सेवा एयर इंडिया स्वयं को अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए और अधिक आकर्षक बनाने के प्रयास में है। इनमें भारत आने और यहां से बाहर जाने वाले यात्रियों के साथ-साथ वे यात्री भी शामिल हैं जिन्हें दो अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों की यात्रा के दरमियान भारतीय हवाई अड्‌डों को ट्रांजिट हब के रूप में इस्तेमाल करना अनुकूल लग सकता है।

विमानन कंपनी ने कहा है कि दिल्ली हवाई अड्‌डा जो देश का सबसे व्यस्त हवाई अड्‌डा है, वहां देश के हवाई क्षेत्र से हर साल गुजरने वाले 13 करोड़ यात्रियों के सौवें हिस्से से भी कम यात्री आते हैं। इसकी तुलना में दुबई में 10 फीसदी और दोहा में साढ़े सात फीसदी यात्री रुकते हैं। स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में सुधार की गुंजाइश है। विमानन कंपनी यह भी मानती है कि अंतरराष्ट्रीय केंद्रों के लिए और सीधी उड़ानें कंपनी के लाभ को बढ़ा सकती हैं। यकीनन कंपनी के पास कई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों में आकर्षक लैंडिंग स्लॉट हैं जिनका वह बेहतर इस्तेमाल कर सकती है।

घरेलू बाजार में एयर इंडिया की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी किफायती विमानन सेवा इंडिगो है। उसने भी पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय परिचालन बढ़ाया है। उदाहरण के लिए खबरों के मुताबिक नियामकों द्वारा भारतीय विमानन कंपनियों को वेट लीजिंग (चालक दल और यात्रियों सहित विमान किराये पर लेना) के प्रतिबंधों को शिथिल किए जाने के बाद इंडिगो यूरोप में कनेक्टिंग उड़ानों के लिए स्कैंडिनेवियन एयरलाइन के साथ ऐसी व्यवस्था बनाने की संभावना तलाश रही है। कंपनी ने फिलहाल टर्किश एयरलाइन के साथ एक समझौता किया हुआ है जिसके तहत वह यात्रियों को भारत से इस्तांबुल पहुंचाती है जहां से वे यूरोप के अलग-अलग शहरों में जाते हैं। वह लंदन एयरपोर्ट के लिए सीधी उड़ान शुरू करने की तैयारी में है। हालांकि ऐसा प्रतीत होता है कि शायद उसे मैनचेस्टर से ही संतुष्ट होना पड़े। अगर ऐसा होता है तो वह बड़े घरेलू नेटवर्क का लाभ लेकर यात्रियों को दिल्ली में अपने हब से ब्रिटिश एयरपोर्ट ले जा सकेगी।

क्षेत्रवार वृद्धि और यात्रियों के लिए अनुकूलता बढ़ाने का यह अवसर हवाई अड्‌डा परिचालकों और नियामकों के साथ-साथ अन्य सरकारी एजेंसियों के सहयोग की मांग करता है। एक अंतरराष्ट्रीय हब तैयार करना आसान नहीं है। दिल्ली के कुल टैरिफ का केवल 20 फीसदी ही एक जगह से दूसरी जगह जाने वालों का है। इसमें सुधार की बहुत अधिक गुंजाइश है। बहरहाल इस कम आंकड़े की वजहें और भारत के निकट दुबई और सिंगापुर जैसे ट्रांजिट हबों की लोकप्रियता को भी सही तरह से समझना होगा। वे हवाई अड्‌डे किफायती हैं, कम स्थानांतरण समय का वादा करते हैं और बहुत अधिक विश्वसनीय हैं। उनके संपर्क भी भारत के किसी भी अन्य हवाई अड्डे से बेहतर हैं। ऐसे हवाई अड्डों की कामयाबी के लिए उन एयरलाइनों को द्विपक्षीय लैंडिंग अधिकार देने के पुराने फैसलों को दोष देना बहुत आसान है जो उन्हें हब के रूप में इस्तेमाल करते हैं। प्रश्न यह किया जाना चाहिए कि यात्रियों ने विकल्प दिए जाने के बाद भी उन्हें ही क्यों पसंद किया।

प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने के काम में प्रासंगिक अधिकारियों के सहयोग के बिना इन प्रयासों को कामयाबी मिलती नहीं दिखती। ऐसी ही एक जरूरत है प्रक्रियाओं को सुसंगत बनाने की जिसमें सीमा शुल्क शामिल है। यात्रियों के सामान की जांच आसान होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय ट्रांजिट के लिए शेड्यूल में बदलाव करना होगा ताकि अनुकूल स्थानांतरण समय तय किया जा सके और सामान के निपटान के प्रोटोकॉल को दिल्ली जैसे हवाई अड्‌डों पर बेहतर बनाना होगा। हवाई अड्‌डे की क्षमता में विस्तार का वादा भी बहुत समय से लंबित है। गत वर्ष दिल्ली हवाई अड्‌डे ने कहा था कि वह व्यस्ततम समय की क्षमता में करीब एक तिहाई का इजाफा करेगा ताकि हर घंटे 110 उड़ानों और लैंडिंग की देखरेख हो सके। बड़ी विमानन कंपनियों और हवाई अड्‌डों की महत्त्वाकांक्षाएं समान हैं। नियमन, निगरानी और क्षमता को अपनाकर इन आकांक्षाओं को पूरा किया जा सकता है।

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First Published - January 15, 2025 | 11:30 PM IST

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