facebookmetapixel
Advertisement
तेल, रुपये और यील्ड का दबाव: पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी अस्थिरता, लंबी अनिश्चितता के संकेतवैश्विक चुनातियों के बावजूद भारतीय ऑफिस मार्केट ने पकड़ी रफ्तार, पहली तिमाही में 15% इजाफाJio IPO: DRHP दाखिल करने की तैयारी तेज, OFS के जरिए 2.5% हिस्सेदारी बिकने की संभावनाडेटा सेंटर कारोबार में अदाणी का बड़ा दांव, Meta और Google से बातचीतभारत में माइक्रो ड्रामा बाजार का तेजी से विस्तार, 2030 तक 4.5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमानआध्यात्मिक पर्यटन में भारत सबसे आगे, एशिया में भारतीय यात्रियों की रुचि सबसे अधिकबांग्लादेश: चुनौतियों के बीच आजादी का जश्न, अर्थव्यवस्था और महंगाई बनी बड़ी चुनौतीपश्चिम एशिया संकट के बीच भारत सतर्क, रणनीतिक तेल भंडार विस्तार प्रक्रिया तेजGST कटौती से बढ़ी मांग, ऑटो और ट्रैक्टर बिक्री में उछाल: सीतारमणसरकार का बड़ा फैसला: पीएनजी नेटवर्क वाले इलाकों में नहीं मिलेगा एलपीजी सिलिंडर

कहीं 2026 में अल-नीनो बिगाड़ न दे मॉनसून का मिजाज? खेती और आर्थिक वृद्धि पर असर की आशंका

Advertisement

अभी साल शुरू हो रहा है और मॉनसून आने में लगभग छह महीने हैं। ऐसे में इतने दिनों पहले किसी भी मौसमी पूर्वानुमान के गलत होने की संभावना अधिक रहती है

Last Updated- December 31, 2025 | 10:43 PM IST
Monsoon

मौसम विज्ञानियों और जलवायु पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर दिलचस्पी बढ़ रही है कि क्या 2026 पूर्ण विकसित या उभरते अल-नीनो प्रभाव का वर्ष होगा, जिसका भारत के मॉनसून, कृषि उत्पादन एवं सामान्य आर्थिक वृद्धि पर सीधा असर पड़ता है।

अभी साल शुरू हो रहा है और मॉनसून आने में लगभग छह महीने हैं। ऐसे में इतने दिनों पहले किसी भी मौसमी पूर्वानुमान के गलत होने की संभावना अधिक रहती है। जब तक ‘स्प्रिंग बैरियर’ नहीं गुजर जाता, नि​श्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन दुनिया के कुछ मौसम विज्ञानियों ने मई और जून के आसपास अल-नीनो के विकसित होने की भविष्यवाणी करनी शुरू कर दी है। यह वही समय होता है जब भारत में मॉनसून गति पकड़ना शुरू देता है।

अल-नीनो-दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय दबाव में आने वाले प्राकृतिक और आवर्ती उतार-चढ़ाव को कहते हैं। इस ​स्थिति में समुदी तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने को अल-नीनो और ठंडे होने को ला-नीनो कहा जाता है।

वर्ल्ड क्लाइमेट सर्विस के अनुसार, ‘स्प्रिंग बैरियर’ का उपयोग अक्सर वर्ष के पहले भाग में ईएनएसओ के दृष्टिकोण में अनिश्चितता दिखाने के लिए होता है और माना जाता है कि उत्तरी गोलार्ध वसंत के संबंध में ईएनएसओ पूर्वानुमान अमूमन अनि​श्चित ही होते हैं।
यदि अल-नीनो विकसित होता है तो यह भारत में न केवल सामान्य से कम मॉनसूनी वर्षा का कारण बनता है, बल्कि कभी-कभी इस सीजन के चार महीनों यानी जून से सितंबर के दौरान लंबे-लंबे अंतराल में बारिश की ​स्थिति भी पैदा कर देता है।

लेकिन यदि वर्षा का अस्थायी और स्थानीय स्तर पर वितरण संतुलित हो तो सभी अल-नीनो का देश में कृ​षि उत्पादन पर प्रत्यक्ष रूप से असर नहीं पड़ता है। इससे पहले 2018 में भारत में मॉनसून पर अल-नीनो का कुछ प्रभाव देखने को मिला था और हिंद महासागर पूर्वी और प​श्चिमी हिस्सों यानी द्विध्रुव के सामान्य तापमान ने इसे लगभग बेअसर कर दिया था।

फिलहाल ऑस्ट्रेलियाई मौसम ब्यूरो या अमेरिका स्थित नैशनल ओशियानिक ऐंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन जैसी बड़ी वैश्विक मौसम पूर्वानुमान एजेंसियों ने अपने दिसंबर के अपडेट में केवल अगले एक या दो महीनों के लिए ला-नीना के बने रहने की भविष्यवाणी की है और इसके 2026 के जनवरी से मार्च के दौरान ईएनएसओ-तटस्थ स्थिति में बदलने की संभावना 68 प्रतिशत है।

लेकिन, ‘सीवियर वेदर यूरोप’ द्वारा अध्ययन किए गए कुछ मॉडल अल-नीनो उभार की संभावना जता रहे हैं। इन मॉडल के अनुसार यह अल-नीनो वर्ष के दूसरे भाग में मजबूत होगा और 2026 के साथ-साथ 2027 के पूरे सीजन में बना रह सकता है।

Advertisement
First Published - December 31, 2025 | 10:41 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement