इतिहास शायद वर्ष 2025 को एक ऐसे साल के रूप में याद करेगा जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ने दशकों के दौरान बनी विश्व व्यापार व्यवस्था को उलट-पुलट करने का निर्णय लिया। अमेरिका द्वारा कथित जवाबी शुल्क लगाने और अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ व्यापार वार्ता शुरू करने से बड़े पैमाने पर अनिश्चितता और भ्रम उत्पन्न हुआ।
अमेरिकी नीतियों में इस बदलाव का असर आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा और आने वाले कई वर्षों तक इसका विश्लेषण किया जाएगा। अभी तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था अच्छी हालत में है। कहा जा रहा है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस से संबंधित निवेश में उछाल के कारण वहां वृद्धि दर्ज की जा रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा व्यापार और भू-राजनीतिक उद्देश्यों को मिला कर भारत को खासतौर पर निशाने पर लिया गया। बिना किसी ठोस वजह के भारत पर 50 फीसदी शुल्क लगाया गया। चूंकि अमेरिका, भारत का एक महत्त्वपूर्ण कारोबारी साझेदार है इसलिए इस साल सबकी नजर साझा लाभकारी व्यापार समझौते पर होगी। वास्तव में वर्ष 2026 में व्यापार के मोर्चे पर होने वाला विकास भारत की संभावनाओं को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करेगा।
अमेरिका के अलावा भारत, यूरोपीय संघ के साथ भी व्यापार समझौते के करीब है। भारत कई अन्य देशों के साथ भी व्यापार वार्ताएं कर रहा है और इससे भारतीय निर्यातकों को मदद मिलेगी। व्यापार को लेकर नीतिगत खुलेपन का स्वागत किया जाना चाहिए और भारत को 2026 में इसे और आगे ले जाने पर विचार करना चाहिए।
सरकार ने कई गुणवत्ता नियंत्रण आदेश वापस लिए हैं। ये निश्चित रूप से आयात बाधा के रूप में काम करते थे। चूंकि भारत, अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे बड़े कारोबारी साझेदारों के साथ व्यापार समझौते करना चाहता है इसलिए उसे भी शुल्क दरों में कमी करनी होगी। ऐसा करने से उसे वैश्विक मूल्य श्रृंखला में शामिल होने का अवसर मिलेगा।
भारत को व्यापार समझौतों से तभी लाभ होगा जबकि घरेलू कारोबारी माहौल में टिकाऊ ढंग से सुधार हो। नियमन को नरम करने के लिए समितियां गठित की गईं और यह देखना दिलचस्प होगा कि इस वर्ष किस गति से और किस पैमाने पर काम होता है।
इस वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था के आकलन और उसके प्रबंधन के तरीके में महत्त्वपूर्ण बदलाव होंगे। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की नई श्रृंखला फरवरी में जारी की जाएगी। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाद्य पदार्थों का भार संभवतः कम हो जाएगा, जिससे यह अधिक स्थिर और अनुमान लगाने लायक बनेगा।
वर्तमान जीडीपी श्रृंखला में वर्षों से कई मुद्दों की ओर अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है, जिनमें अनौपचारिक क्षेत्र की गतिविधियों को मापने का तरीका और वास्तविक उत्पादन तक पहुंचने के लिए नॉमिनल उत्पादन के अनुमानों को घटाने की प्रक्रिया शामिल है। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है, और यह महत्त्वपूर्ण है कि आर्थिक गतिविधि और कीमतों को आंकने के लिए बनाए गए उपाय जमीनी स्थिति को सही ढंग से प्रतिबिंबित करें। इसलिए जीडीपी और मुद्रास्फीति श्रृंखला को नियमित अंतराल पर अद्यतन करना अत्यंत आवश्यक है।
परिणामों की बात करें तो बीती दो तिमाहियों की वृद्धि ने सकारात्मक ढंग से चौंकाया है और नीतिगत लक्ष्य यह होना चाहिए कि ये गति बरकरार रहे। भारतीय अर्थव्यवस्था अप्रैल-सितंबर 2025 में 8 फीसदी की दर से बढ़ी। 2025 में मुद्रास्फीति में कमी आई और अभी वह रिजर्व बैंक के तय दायरे के निचले स्तर के भी नीचे है।
2026 में मुद्रास्फीति के बढ़ने का अनुमान है और वह 4 फीसदी के लक्ष्य के आसपास बनी रह सकती है। इससे नॉमिनल वृद्धि को गति देने में मदद मिलेगी जो राजकोषीय प्रबंधन की दृष्टि से अहम है। केंद्र सरकार अगले वित्तीय वर्ष से ऋण-जीडीपी अनुपात को राजकोषीय आधार के रूप में अपनाएगी। यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि वित्तीय बाजार इस बदलाव पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।
व्यापक आर्थिक प्रबंधन के संदर्भ में, वर्तमान स्थिति में बाहरी खाता कुछ चुनौतियां प्रस्तुत कर सकता है। पूंजी के बहिर्गमन के कारण रुपया दबाव में है। बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता कितनी जल्दी होता है। इसके अलावा, भू-राजनीतिक घटनाक्रम भी चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।