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RBI और सरकार में तालमेल तय करेगा भारत के ग्रोथ की राह

केंद्रीय बैंक और देश की सरकार के बीच रिश्ते को अक्सर पारंपरिक विवाह की तरह देखा जाता है। लेकिन यह रिश्ता वित्तीय क्षेत्र को पीछे की ओर धकेल रहा है। बता रहे हैं अजय छिब्बर

Last Updated- January 07, 2026 | 8:44 PM IST
RBI and Government
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

हम साल 2026 में प्रवेश कर गए हैं और रिजर्व बैंक के गवर्नर देश की अर्थव्यवस्था को ‘गोल्डीलॉक्स’ बता रहे हैं जहां वृद्धि मजबूत है और मुद्रास्फीति कम। श्रम सुधारों के बाद अगला लक्ष्य यह होना चाहिए कि वित्तीय बाजारों की गहराई बढ़ाकर पूंजी की लागत को कम किया जाए। यह शायद वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के बीच के रिश्तों की उलझन को सुलझाने का माकूल वक्त है। दोनों के बीच हितों के टकराव के हालात बने हुए हैं और अगर भारत को वित्तीय तंत्र का आधुनिकीकरण करना है तो इसे दूर करना होगा।

इस रिश्ते को अक्सर पारंपरिक विवाह की तरह देखा जाता है जहां वित्त मंत्रालय पति और रिजर्व बैंक पत्नी की भूमिका में है। जबकि सरकार सास की भूमिका में रहती है। विवाद अक्सर घर में ही सुलझ जाते हैं और सार्वजनिक नहीं होते। तलाक का तो कोई प्रश्न ही नहीं है। अगर विवाद पैदा होता है तो सरकार यानी सास अपने बेटे यानी वित्त मंत्रालय का पक्ष लेती है। लेकिन कई बार विवाद बढ़ जाते हैं। ऐसी ही एक घटना तब हुई थी जब 2018 के आरंभ में सरकारी क्षेत्र के पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में 13,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का मामला सामने आया था। इसमें नीरव मोदी और मेहुल चौकसी शामिल थे, जो अब भी फरार हैं।

तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने रिजर्व बैंक पर आरोप लगाया था कि उसने सही नियामकीय निगरानी नहीं बरती। वहीं आरबीआई गवर्नर ने एक सार्वजनिक व्याख्यान में जवाबी हमला करते हुए कहा कि सरकारी बैंकों पर रिजर्व बैंक के नियामकीय अधिकार बहुत सीमित हैं। सरकारी बैंकों ने वित्त वर्ष 2015-16 से वित्त वर्ष 2024-25 के बीच करीब 12 लाख करोड़ रुपये के कर्ज बट्टे खाते में डाले। इससे पता चलता है कि उनमें नियमन और निगरानी संबंधी गंभीर खामियां हैं। पीएनबी में एक और धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। निजी वाणिज्यिक बैंकों में भी दिक्कत हुईं लेकिन ऐसी नहीं जैसी सरकारी बैंकों में नजर आईं।

सरकारी बैंकों पर रिजर्व बैंक की निगरानी कमजोर है क्योंकि एक ओर जहां वह निजी बैंकों के मुख्य कार्याधिकारियों की नियुक्ति की मंजूरी देता है ताकि वे सही ढंग से काम कर सकें, वहीं सरकारी बैंकों के मामले में उसके पास यह अधिकार नहीं है। सरकारी बैंकों के मुख्य कार्याधिकारी जानते हैं कि उन्हें वित्त मंत्रालय के निर्देशों का पालन करना होगा न कि अपने आधिकारिक नियामक के।

इस नियामकीय संबंध को और भी जटिल बनाने वाली बात यह है कि रिजर्व बैंक के अधिकारी हर सरकारी बैंक के बोर्ड में बैठते हैं और इस प्रकार वे बोर्ड द्वारा लिए गए निर्णयों में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होते हैं, जबकि वे स्वयं नियामक भी हैं। पीएसबी में बार-बार फंसे हुए कर्ज के मामले सामने आते हैं। इससे संकेत मिलता है कि यह व्यवस्था उनके पर्यवेक्षण कार्यों में मददगार नहीं है। कुछ आरबीआई गवर्नरों ने महसूस किया है कि यह व्यवस्था स्वस्थ नहीं है, जबकि अन्य इससे सहज रहे।

1998 की नरसिंहम समिति-2 ने एक समाधान सुझाया था, जिसमें अनुशंसा की गई थी कि रिजर्व बैंक पीएसबी बोर्डों में न बैठे और पीएसबी बोर्डों को पेशेवर बनाने को बढ़ावा दिया जाए लेकिन अब तक इसे वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक दोनों ने ही स्वीकार नहीं किया है। रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय तथा सरकार के रिश्तों में दूसरी बड़ी समस्या यह है कि रिजर्व बैंक सरकार का ऋण प्रबंधक भी है। यह बात मौद्रिक नीति से संबंधित उसकी भूमिका से हितों का भारी टकराव उत्पन्न करती है। ऋण प्रबंधक के रूप में रिजर्व बैंक ब्याज दरों को कम रखना चाहेगा ताकि सरकार न्यूनतम संभव दर पर ऋण हासिल कर सके।

यह बैंकों को सरकारी बॉन्ड रखने के लिए विवश करता है। यह नकदी संबंधी उनकी आवश्यकताओं के साथ हस्तक्षेप करता है। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की उधारी की आवश्यकताएं असामान्य रूप से अधिक हैं क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारें अत्यधिक घाटे में चलती हैं। उधारी की लागत को कम रखने के लिए, सरकार एक सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) लागू करती है, जिसके तहत बैंकों को सरकारी बॉन्ड रखने होते हैं जिन्हें नकदी का ही एक रूप माना जाता है।

भारत का एसएलआर 1980 के दशक के 40 फीसदी से घटकर 18 फीसदी पर आ गया है। लेकिन भारत, बांग्लादेश (13 फीसदी) और पाकिस्तान (15 फीसदी) के साथ, अब भी उन कुछ देशों में शामिल है जो इस पुराने साधन का उपयोग करते हैं। यह वाणिज्यिक बॉन्ड बाजार के विकास को नुकसान पहुंचाता है और निजी ऋण वृद्धि को बाधित करता है। भारत का निजी ऋण-जीडीपी अनुपात अब भी बेहद कम है, जीडीपी के लगभग 50 फीसदी के बराबर। यह बांग्लादेश और पाकिस्तान से बेहतर है, लेकिन वियतनाम, थाईलैंड और मलेशिया जैसे देशों से बहुत पीछे है, जहां यह जीडीपी के 100 फीसदी से भी अधिक है।

इससे संबंधित एक समस्या यह है कि रिजर्व बैंक सरकारी बॉन्ड बाजार का नियमन भी करता है और उसमें एक कारोबारी की तरह शामिल भी होता है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी सेबी वाणिज्यिक बॉन्ड बाजार का नियमन करता है। दो बार यानी पहले 2007 में और फिर 2015 में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम और जेटली ने, जो अलग-अलग दलों से थे, यह घोषणा की कि सार्वजनिक ऋण प्रबंधन का काम आरबीआई से अलग राष्ट्रीय ट्रेजरी डेट कार्यालय को सौंपा जाएगा। लेकिन दोनों बार इस घोषणा को बिना वजह बताए वापस ले लिया गया। वित्त मंत्रालय में ऋण प्रबंधन इकाई 2015 में गठित की गई ताकि ऋण संबंधी नीतियां बन सकें और जोखिम का विश्लेषण हो। साल में दो बार रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय ऋण प्रबंधन को लेकर मशविरा करते हैं। परंतु भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने इसकी खराब रेटिंग की है। चाहे जो भी हो, हितों के टकराव का प्रश्न भी बरकरार है।

सुधार इसलिए भी मुश्किल रहे क्योंकि राज्यों और केंद्र का संयुक्त घाटा बहुत अधिक है। रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने इस राजकोषीय दबदबे की लागत का दस्तावेजीकरण किया था। उन्होंने दिखाया कि यह किस तरह ऋण और बॉन्ड बाजार चैनलों के माध्यम से निजी क्षेत्र को बाहर कर देता है। यही नहीं, यह मौद्रिक प्रसारण को नुकसान पहुंचाता है तथा वित्तीय प्रणाली की गहराई को बाधित करता है। इन मुद्दों को हल करने के लिए इससे बेहतर समय नहीं हो सकता। मुद्रास्फीति घटकर लचीली व्यवस्था की निचली सीमा से भी नीचे आ गई है और ट्रंप के शुल्क थोपने के बाद भी अर्थव्यवस्था अच्छी तरह बढ़ रही है। आरबीआई ने अभी ब्याज दरें घटाई हैं, इसलिए वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए अधिक राजकोषीय खर्च अभी जरूरी नहीं है। हालांकि कारोबारी लॉबी और राजनेताओं की ऐसी ही मांग है।

आगामी बजट एक अवसर है जिसका इस्तेमाल गंभीर राजकोषीय मजबूती के लिए तथा रिजर्व बैंक और सरकार के बीच के खराब रिश्तों को ठीक करने के लिए किया जा सकता है। यह जरूरी है क्योंकि ऐसे हालात देश के वित्तीय क्षेत्र को प्रभावित कर रहे हैं। इसकी शुरुआत एसएलआर को हटाकर की जा सकती है। इससे वित्त मंत्रालय पर अतिरिक्त दबाव बनेगा कि वह राजकोषीय घाटे पर लगाम लगाए। एक सौहार्दपूर्ण तलाक हमेशा एक खराब शादी से बेहतर होता है।


(लेखक जॉर्ज वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनैशनल इकनॉमिक पॉलिसी में विशिष्ट अतिथि विद्वान हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published - January 5, 2026 | 9:35 PM IST

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