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सुधार नहीं है नुकसान की भरपाई करना

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क्यूसीओ एक अच्छा केस अध्ययन मुहैया कराते हैं क्योंकि उनका उत्थान और पतन दोनों असाधारण रूप से सरल और नजर आने वाला रहा है।

Last Updated- January 07, 2026 | 9:09 AM IST
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भारत द्वारा हाल ही में गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (QCO) को वापस लेने का स्वागत राहत और कुछ क्षेत्रों में तारीफ के साथ किया गया है। सरकार ने एक ऐसे नियामक ढांचे को समाप्त करना शुरू कर दिया है जिसने आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित किया, निर्यातकों की लागत बढ़ाई और विदेश में व्यापारिक तनाव उत्पन्न किया। वस्त्र, इस्पात और रसायनों में उपयोग होने वाले कच्चे माल में सबसे पहले उलटफेर देखने को मिला। कठिन वैश्विक वातावरण में, उन नीतियों से पीछे हटना जो प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर करती हैं, निस्संदेह समझदारी भरा कदम है।

परंतु कदम वापसी को सुधार मानना नुकसान नियंत्रण को ही प्रगति समझने की भूल है। क्यूसीओ के मामले को किसी अलग-थलग गलती के रूप में नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक शासन प्रणाली की एक गहरी समस्या के लक्षण के रूप में समझा जाना चाहिए। मसलन अंदरूनी हस्तक्षेप, जिनसे नुकसान की देर से पहचान होती है और अंततः पीछे हटना पड़ता है। इसे अक्सर व्यावहारिकता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसी तरह की सक्रियता आर्थिक नीति निर्माण में भी देखने को मिली है, जैसे कि अनावश्यक रूप से जटिल माल एवं सेवा कर (जीएसटी) संरचना, जिसे अब जाकर सरल बनाया जा रहा है, या 2022-23 में रुपये का प्रभावी रूप से सॉफ्ट-पेगिंग (मुद्रा को एक तय दायरे के भीतर, कुछ हद तक ऊपर-नीचे होने देने की छूट) और उसके बाद चुपचाप इसे बंद करना। यह लेख व्यापार पर केंद्रित है, लेकिन क्यूसीओ एक व्यापक और बार-बार होने वाले नीतिगत सिंड्रोम का हिस्सा है।

क्यूसीओ एक अच्छा केस अध्ययन मुहैया कराते हैं क्योंकि उनका उत्थान और पतन दोनों असाधारण रूप से सरल और नजर आने वाला रहा है। हालांकि वे दशकों से मौजूद हैं लेकिन 2020 तक इनका इस्तेमाल बहुत कम हुआ। इसके बाद उनकी संख्या में भारी इजाफा हुआ और ये प्रभावी रूप से गैर टैरिफ व्यापारिक गतिरोध में बदल गए। आयातित मध्यवर्ती इनपुट तक पहुंच को रोककर इन्होंने उत्पादन लागत बढ़ा दी और निर्यातोन्मुखी क्षेत्रों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया।

उदाहरण के लिए वस्त्र व परिधान क्षेत्र को लेते हैं। पॉलिएस्टर और विस्कॉस पर लगाए गए क्यूसीओ ने आयात में तेज गिरावट ला दी। कंपनियों ने शुरुआत में आशंका के चलते कच्चे माल का भंडारण किया। जब भंडार समाप्त हो गया, तो कई कंपनियों को महंगे या अपर्याप्त घरेलू विकल्पों पर निर्भर होना पड़ा। स्वाभाविक रूप से उत्पादकता घट गई और निर्यात प्रभावित हुआ। ये परिणाम चकित करने वाले नहीं थे। वे बुनियादी आर्थिक तर्क के अनुसार ही थे।

वर्ष2025 के मध्य तक सरकार के भीतर आपूर्ति बाधाओं को लेकर ऐसी चिंताएं उत्पन्न होने लगी थीं जिन्हें नकारना मुश्किल था। ट्रंप के दौर में जो व्यापारिक झटके लगने लगे उन्होंने एक उत्प्रेरक की भूमिका निभाई। इसके बाद एक अंतरमंत्रालयीन समीक्षा व्यवस्था कायम की गई और उसके बाद कोई नया क्यूसीओ जारी नहीं किया गया। बाद में नीति आयोग की एक रिपोर्ट में उनमें से कई को निरस्त करने की अनुशंसा की गई। खासतौर पर उनको जो मध्यवर्ती वस्तुओं से संबंधित थे। नवंबर के मध्य से उन्हें वापस लेने की शुरुआत हो गई।

समय इसकी कहानी खुद कह रहा है। अभी नवंबर के आरंभ तक सरकार क्यूसीओ का बचाव कर रही थी और उनके विस्तार का संकेत दे रही थी। लेकिन नवंबर के मध्य तक क्यूसीओ व्यवस्था को भंग किया जाने लगा। जब किसी नीति का एक दिन जमकर विस्तार होता है और दूसरे ही दिन उसे खामोशी से भंग कर दिया जाता है तो समझा जा सकता है कि नीतिगत स्तर पर कितनी विसंगति है।

यह सिलसिला क्यूसीओ से पहले भी देखा गया। तकरीबन 2017-18 में भारत ने 1991 के बाद की व्यापार उदारीकरण की दिशा को निर्णायक रूप से उलट दिया। लगभग तीन दशकों तक शुल्कों को कम करने और गहरी एकीकरण की प्रक्रिया के बाद, नीति को अंतर्मुखी बना दिया गया। हजारों उत्पाद श्रेणियों पर शुल्क बढ़ाए गए, जिनमें सबसे अधिक वृद्धि श्रम-प्रधान विनिर्माण क्षेत्रों में हुई। ठीक वही क्षेत्र जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए सस्ते आयातित इनपुट पर सबसे अधिक निर्भर थे। इसके नतीजों का अनुमान लगाया जा सकता था। ऊंचे शुल्कों ने उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ा दीं और निर्माताओं के लिए इनपुट लागत बढ़ा दी। वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों ने, जिन्होंने इनपुट शुल्क कम रखे, उनका परिधान कारोबार फला-फूला। इसके विपरीत, भारत वैश्विक मांग को निर्यात वृद्धि में बदलने के लिए जूझता रहा।
वर्ष 2022 तक, इस अंतर्मुखी रुख की सीमाएं स्पष्ट होने लगी थीं। लागत को नियंत्रित करने के लिए 2018-19 में इस्पात पर लगाए गए एंटी-डंपिंग शुल्क वापस ले लिए गए और पीवीसी आयात पर प्रस्तावित शुल्क लागू होने से पहले ही रोक दिए गए। कई क्षेत्रों में आयात शुल्क चुपचाप कम कर दिए गए, जो 2023 में व्यापक कटौती के रूप में सामने आए।

इन घटनाओं को मिलाकर देखें तो एक परिचित पैटर्न सामने आता है। वह यह कि हस्तक्षेपों को रणनीतिक बताकर लागू किया जाता है, और जब आर्थिक नुकसान स्पष्ट हो जाता है तो पीछे हटना पड़ता है। लेकिन वह नुकसान वापस नहीं पलटा जा सकता। ऐसा नहीं हो सकता है कि कंपनियां संकेत पर रुकें और चलें। जब कच्चे माल तक पहुंच बाधित होती है, तो आपूर्ति श्रृंखलाएं बदल जाती हैं, खरीदार आगे बढ़ जाते हैं और निवेश त्याग दिए जाते हैं। सबसे उत्पादक कंपनियां जो अक्सर सबसे अधिक निर्यातोन्मुखी होती हैं, सबसे पहले प्रभावित होती हैं, और खोया हुआ बाजार हिस्सा शायद ही कभी वापस पाया जाता है।
यही वजह है कि बदलावों को सुधारों के साथ मिलाना नुकसानदायक हो सकता है। दोनों को समान मानना जवाबदेही को कमजोर करता है और पुनरावृत्ति का जोखिम बढ़ाता है। विडंबना यह है कि भारत ने इस अनिश्चितता को अपने ऊपर उस समय थोपा है जब परिस्थितियां विशेष रूप से कठिन हैं। वैश्विक व्यापार पहले से ही भू-राजनीतिक विखंडन, मांग में कमी और अन्यत्र बढ़ते संरक्षणवाद से दबाव में है। इस बीच घरेलू अनिश्चितता को वैश्विक अनिश्चितता के ऊपर परत-दर-परत जोड़ दिया गया है।

क्यूसीओ को वापस लिया जाना स्वागत योग्य है। लेकिन यह कठिन प्रश्न भी उठाना चाहिए कि नीतियां इतनी बार इस तरह क्यों बनाई जाती हैं कि अंततः पीछे हटना पड़े? क्या फ़ैसले लेने का तरीका बहुत मनमाना है, आलोचना से परे है, परामर्श की अनदेखी करता है, या तकनीकी विशेषज्ञता से बहुत दूर है? जब तक इस शासन प्रवृत्ति को संबोधित नहीं किया जाता, नीतिगत अनिश्चितता बनी रहेगी और महंगी साबित होती रहेगी।

(लेखक इनसिग्निया पॉलिसी रिसर्च के प्रबंध निदेशक और मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में विजिटिंग फेलो हैं)

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First Published - January 7, 2026 | 9:09 AM IST

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