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भारत-अमेरिका समझौते में क्यों हो रही देरी? जानिए अड़चनें और वजहें

व्यापार नीति नहीं बल्कि सुरक्षा की निर्भरता यह बताती है कि अमेरिका दूसरों के साथ किस तरह शीघ्रता से समझौते कर ले रहा है और भारत क्यों अपनी बात पर अड़ा हुआ है

Last Updated- January 07, 2026 | 9:12 PM IST
India- US Trade Deal
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

भारत और अमेरिका दोनों ने अन्य देशों के साथ शीघ्र समझौतों पर हस्ताक्षर किए लेकिन वे आपस में द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर क्यों नहीं कर सके? बीते चार साल में भारत ने आठ व्यापार समझौते किए हैं। ये समझौते मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ओमान, यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन, ब्रिटेन और हिंद प्रशांत आर्थिक ढांचा (आईपीईएफ) के सदस्यों के साथ किए गए हैं जिनमें अमेरिका भी शामिल है। अमेरिका ने भी विगत छह महीनों में जापान, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, वियतनाम और मलेशिया के साथ समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। ऐसे में भारत-अमेरिका समझौते में इतना समय क्यों लग रहा है?

दो मुख्य वजहें: पहली वजह, अधिकांश देश जिन्होंने अमेरिका के साथ शीघ्र व्यापार समझौते किए हैं वे अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर बहुत अधिक निर्भर हैं। भारत की ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। दूसरा, अमेरिका-भारत व्यापार समझौता व्यापार से परे सामरिक और नीतिगत क्षेत्रों तक विस्तृत है।
ये दो कारण वार्ताओं को जटिल बनाते हैं और यह स्पष्ट करते हैं कि आखिर क्यों समझौता कई लोगों की उम्मीद से अधिक वक्त ले रहा है।

सुरक्षा प्रदाता के रूप में अमेरिका: अमेरिका के साथ शीघ्रता से व्यापार समझौते करने वाले देशों में एक समानता है। वे सभी अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए जापान और दक्षिण कोरिया अमेरिका के औपचारिक संधि साझेदार हैं और उनके यहां बड़ी तादाद में अमेरिकी सैनिक हैं। अमेरिका के साथ उनके व्यापारिक संबंध सुरक्षा पर निर्भरता से जुड़े हुए हैं, खासतौर पर उत्तर कोरिया और चीन के खतरों को देखते हुए।

यूरोप में भी ऐसा ही देखने को मिलता है। ब्रिटेन नॉटो के जरिये अमेरिका का सबसे करीबी रणनीतिक साझेदार बना हुआ है। यूरोपीय संघ का बड़ा हिस्सा, खासतौर पर रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के बाद काफी हद तक अमेरिकी सेना की मदद पर निर्भर है। ऐसे मामलों में व्यापार वार्ताएं रणनीतिक पहलू से तय होती हैं। ऐसे में अमेरिकी मांगों के आगे झुकना एक तरह की मजबूरी है। दक्षिण पूर्व एशिया में भी हालात ऐसे ही हैं। फिलिपींस साझा रक्षा संधि से बंधा हुआ है। हाल के वर्षों में उसके यहां अमेरिकी सेना की पहुंच बढ़ी है। थाईलैंड एक अन्य साझेदार है जो अमेरिकी सुरक्षा ढांचे से बंधा है। इन देशों के लिए व्यापार समझौते व्यापक भू-राजनीतिक मोलभाव का हिस्सा हैं जिसकी जड़ें सुरक्षा निर्भरता में निहित हैं।

दूसरी तरफ, भारत अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर नहीं है और सैन्य दबाव के माध्यम से उस पर दबाव नहीं डाला जा सकता। यह सामरिक स्वायत्तता व्यापार वार्ताओं की प्रकृति को मूल रूप से बदल देती है। चीन भी अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भर नहीं है और उसके पास रणनीतिक लाभ है, विशेष रूप से दुर्लभ खनिजों के मामले में, जो अमेरिकी रक्षा और उच्च-प्रौद्योगिकी उद्योगों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। परिणामस्वरूप, अमेरिका-चीन व्यापार समझौते, चाहे कितने भी तनाव हों, कभी एकतरफा नहीं होते। शक्ति संतुलन वार्ता को मजबूर करता है, अनुपालन को नहीं।

भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के लिए वार्ताएं फरवरी 2025 में शुरू हुईं, लेकिन वे अटकी हुई हैं क्योंकि बातचीत केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। अमेरिका भारत पर दबाव डाल रहा है कि वह अपनी प्रमुख घरेलू नीतियों को अमेरिकी हितों के अनुरूप ढाले। इनमें विनियमन और प्रौद्योगिकी से लेकर ऊर्जा और भू-राजनीति तक शामिल हैं।

अमेरिका चाहता है कि भारत अधिक अमेरिकी तेल और रक्षा उपकरण खरीदे, डेटा और डिजिटल नियमों को शिथिल करे, और ब्रिक्स साझेदारों से दूरी बनाए, विशेषकर रूस और चीन से, जिन्हें अमेरिका डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने वाला मानता है।

अमेरिका अबाध सीमा-पार डेटा प्रवाह, डिजिटल सेवाओं पर करों की समाप्ति, और अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनियों को सीमित बाजार के बजाय इन्वेंटरी-आधारित मॉडल चलाने की अनुमति देने के लिए भी दबाव बना रहा है। अमेरिका ने भारत में सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सेवाएं प्रदान करने के लिए स्टारलिंक के प्रवेश के लि​ए दबाव बनाया। अमेरिका ने भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद के जवाब में भारतीय निर्यात पर अतिरिक्त 25 फीसदी शुल्क लगाया है। उसने रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार चीन या कई रूसी उत्पाद आयात करने वाले यूरोपीय संघ पर ऐसे दंडात्मक शुल्क नहीं लगाए हैं। अमेरिका व्यापार साधनों का उपयोग राजनीतिक दबाव बनाने के लिए कर रहा है।

दोनों देशों के व्यापक संबंधों में भी तनाव है। वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी लगातार भारत की सार्वजनिक आलोचना कर रहे हैं। एच-1बी वीजा शुल्क बढ़ गए हैं। कई भारतीय पेशेवर अब जब घर लौटते हैं तो अचानक वीजा रद्द हो जाता है जिसे दोबारा पाने में बहुत समय लगता है। भारत पहले ही कई छूट दे चुका है। अमेरिका से होने वाला तेल आयात गत वर्ष 80 फीसदी तक बढ़ गया है। स्टारलिंक को संचालन की इजाजत दी गई है। भारत ने डिजिटल लेनदेन कर भी समाप्त कर दिया है।

व्यापार पहुंच के मामले में भी, भारत ने लचीलापन दिखाया है। वह अमेरिकी औद्योगिक निर्यात के लगभग 95 फीसदी पर शुल्क समाप्त करने और बादाम, सेब और एवाकाडो जैसे उत्पादों पर शुल्क कम करने के लिए तैयार है। लेकिन अमेरिका डेरी और जीन संव​र्धित फसलों के लिए, जिनमें मक्का और सोयाबीन शामिल हैं, बिना किसी रोक-टोक के पहुंच पर जोर दे रहा है।

अगला कदम: फिलहाल दोनों पक्ष खामोश हैं और कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं है। ऐसा लगता है कि वार्ताकार समझौते की सीमा तक पहुंच चुके हैं, और अब राष्ट्रपति ट्रंप के निर्णय की प्रतीक्षा है। यह विलंब भारत से और अधिक रियायतें निकालने के उद्देश्य से हो सकता है।

भारत पहले ही कई रियायतें दे चुका है। उसे समझौते के लिए और अधिक रियायत देने से बचना चाहिए क्योंकि इन्हें मान लेने पर नई मांगें सामने आएंगी। हालांकि, भारत को रूसी कच्चे तेल पर स्पष्ट निर्णय लेना होगा। 4 जनवरी को राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि भारत रूसी तेल की खरीद बंद नहीं करता है, तो भारतीय निर्यात पर अमेरिकी शुल्क बढ़ सकते हैं।

यदि भारत रूसी तेल खरीद बंद करना चाहता है तो उसे यह निर्णायक रूप से करना होगा। यदि वह गैर-प्रतिबंधित आपूर्तिकर्ताओं से खरीद जारी रखने की योजना बनाता है, तो उसे इसे खुले तौर पर बताना चाहिए और आंकड़ों के साथ अपने पक्ष का समर्थन करना चाहिए। यदि वह प्रतिबंधित संस्थाओं से भी खरीदने का विकल्प चुनता है, तो उस स्थिति को भी स्पष्ट रूप से अपना पक्ष बताना होगा।

रूसी तेल आयात को कम करने से अमेरिकी दबाव समाप्त होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। यहां तक कि रूसी तेल को पूरी तरह रोक दिया जाए तो भी फिर अमेरिका अपनी मांगों को कृषि, डेरी, डिजिटल व्यापार और डेटा शासन की ओर मोड़ सकता है। व्यापार समझौता तभी सार्थक है जब वह न्यायसंगत और पारस्परिक हो। यदि इसकी कीमत रणनीतिक निर्भरता या नीतिगत स्वतंत्रता का नुकसान है, तो प्रतीक्षा करना ही समझदारी भरा विकल्प है।


(लेखक जीटीआरआई के संस्थापक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published - January 7, 2026 | 9:05 PM IST

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