भारतीय रिजर्व बैंक ने 23 दिसंबर को यह घोषणा की कि वह सरकारी बॉन्ड की खरीद और डॉलर-रुपये के स्वैप के माध्यम से 32 अरब डॉलर की नकदी व्यवस्था में डालेगा। सामान्य समय में ऐसी घोषणा से दलाल पथ के मिजाज में उत्साह आना चाहिए था लेकिन हुआ उलटा और शेयर सूचकांक उसी दिन गिर गए। अगले दो दिन तक उनमें गिरावट का सिलसिला जारी रहा।
पूरे वर्ष 2025 के दौरान केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करता रहा और वित्तीय व्यवस्था में नकदी डालता रहा। वह ऐसा इस उम्मीद में कर रहा था कि सस्ते ऋण और प्रचुर मात्रा में नकदी से ऋण की मांग में सुधार होगा और वृद्धि को गति मिलेगी। फिर भी बॉन्ड बाजार ने मुश्किल से ही प्रतिक्रिया दी है। भारत के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड इस साल केवल 13 आधार अंक गिरी है, जबकि शीर्ष रेटिंग वाले कॉरपोरेट बॉन्ड की यील्ड 11 आधार अंक बढ़ गई है। राज्य सरकारों के बॉन्ड का प्रदर्शन और भी खराब रहा है। ब्लूमबर्ग के अनुसार, केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों की तुलना में उनकी यील्ड का अंतर लगभग 40 आधार अंक तक बढ़ गया है। समस्या राज्यों और उनकी उधारी योजनाओं में निहित है।
वित्त मंत्री कई सार्वजनिक मंचों पर कह चुकी हैं कि एक ओर जहां भारत का ऋण-सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अनुपात कोविड महामारी के बाद सुधरा है वहीं कई राज्यों में ऋण चिंताजनक स्तर तक बढ़ा है। जहां एक ओर भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई धन के प्रवाह को आसान बना रहा है, वहीं राज्य अपनी वित्तीय जरूरतों के लिए अधिक से अधिक ऋण बाजार का सहारा ले रहे हैं। राज्यों का ऋण वित्त वर्ष 24 से 25 के बीच एक साल में लगभग 20 फीसदी बढ़कर 12 लाख करोड़ रुपये यानी 134 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।
अगली तिमाही (जनवरी-मार्च) में राज्यों के लगभग 4.5 लाख करोड़ रुपये उधार लेने का अनुमान है। इसमें आश्चर्य नहीं कि निवेशक अधिक यील्ड की मांग कर रहे हैं। भारत के 10-वर्षीय बॉन्ड की यील्ड पिछले दिनों को 6.68 फीसदी तक पहुंच गई, जो नौ महीने का उच्च स्तर है, क्योंकि राज्यों ने सप्ताह के लिए तयशुदा से भी बड़ा बॉन्ड नीलामी कार्यक्रम घोषित किया। इसकी वजह से ही, सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन ने मंगलवार को अपना बॉन्ड बिक्री कार्यक्रम रद्द कर दिया।
असल में, राज्य आरबीआई की आसान नकदी की व्यवस्था में बाधा साबित हो रहे हैं। वे बड़ी मात्रा में अपने बॉन्ड बाजार में उतारकर केंद्रीय बैंक द्वारा डाली गई नकदी का बड़ा हिस्सा खींच ले रहे हैं। 24 दिसंबर को बैंक ऑफ अमेरिका के वरिष्ठ ट्रेडर विकास जैन ने चेतावनी दी कि रिकॉर्ड स्तर की राज्य उधारी बॉन्ड पर दबाव डालेगी और ब्याज दरों को काफी ऊंचा बनाए रखेगी। उन्होंने ब्लूमबर्ग को बताया, ‘राज्य बॉन्ड की आपूर्ति निश्चित रूप से तेजी से बढ़ने वाली है और यही कारण है कि वास्तविक निवेशक इस समय बड़ी राशि लगाने के लिए तैयार नहीं हैं।’ क्या वित्त मंत्रालय इस उधारी के विस्तार को नियंत्रित कर सकता है? शायद नहीं। इसकी दो वजह हैं।
राज्यों का कर्ज बढ़ रहा है। इसकी पहली वजह यह है कि राज्यों का राजस्व निराशाजनक रूप से निचले स्तर पर है। राज्यों की शिकायत उचित ही है कि माल एवं सेवा कर में उनकी हिस्सेदारी उन शुल्कों से कम है जिन्हें प्रतिस्थापित किया जा रहा है। केंद्र से होने वाला हस्तांतरण भी कम है। परंतु यह पूरा किस्सा नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। हाल की तिमाही में जीडीपी 8.2 फीसदी की दर से बढ़ा।
अधिकांश अनुमान लगाने वालों को अगले वर्ष करीब 7 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है। इसके बावजूद जैसा कि हमने पहले भी कहा है शीर्ष जीडीपी वृद्धि कारोबारी आय में परिलक्षित नहीं होती। और अब तो यह राज्यों के राजकोष में भी नहीं दिख रही। या तो वृद्धि को बढ़ाचढ़ाकर दर्शाया जा रहा है या फिर यह उतनी सक्षम नहीं जितना बताया जा रहा है।
समस्या का दूसरा आधा हिस्सा व्यय है। रिजर्व बैंक का अनुमान है कि राज्यों का कुल व्यय अब उनके राज्य सकल घरेलू उत्पाद यानी जीएसडीपी का 27 से 28 फीसदी है। यह 20 फीसदी की अनुशंसित सीमा से काफी अधिक है। 10 राज्यों का ऋण अनुपात 30 फीसदी से भी अधिक है। देश की संघीय व्यवस्था में अधिकांश लोक सेवाओं के लिए राज्य जिम्मेदार हैं। कई केंद्रीय योजनाओं की आपूर्ति भी वही करते हैं। लेकिन उनके व्यय का बड़ा हिस्सा स्थायी खर्चों में फंसा हुआ है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, वर्ष 2023-24 में ब्याज भुगतान, वेतन, पेंशन और सब्सिडी ने राज्यों की आय का 62 फीसदी हिस्सा ले लिया। उस वर्ष राज्यों का राजस्व घाटा जीएसडीपी का 0.4 फीसदी रहा, जिसका अर्थ यह है कि वे केवल दैनिक खर्चों को पूरा करने के लिए उधार ले रहे थे।
मुफ्त उपहारों का जाल
लोकलुभावनवाद की होड़ और अधिक चिंता का विषय है। चुनाव जीतने के लिए बिहार, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में नकदी हस्तांतरण, कृषि ऋण माफी, मुफ्त बिजली और मुफ्त परिवहन जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं। इसके चलते राज्यों का घाटा बहुत अधिक बढ़ गया है।
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च का अनुमान है कि वर्ष2025-26 में, 12 राज्य जो महिलाओं को नकद हस्तांतरण प्रदान करते हैं, मिलकर इस पर लगभग 1.68 लाख करोड़ रुपये खर्च करेंगे। इनमें से छह राज्यों में पहले से ही राजस्व घाटा है। कोई भी राजनीतिक दल इससे बचा नहीं है। गत 26 दिसंबर को पंजाब ने घोषणा की कि जनवरी से प्रति परिवार लगभग 10 लाख रुपये तक का मुफ्त चिकित्सा उपचार उपलब्ध कराया जाएगा। पंजाब भारत के सबसे अधिक ऋणग्रस्त राज्यों में से एक है, जिसका ऋण-जीएसडीपी अनुपात 46 फीसदी है, जबकि महाराष्ट्र में यह 19 फीसदी, गुजरात में 18 फीसदी और ओडिशा में 16 फीसदी है।
निवेशकों को इस सबका क्या अर्थ निकालना चाहिए? बाजारों ने अपने गंभीर निष्कर्ष स्वयं ही निकाल लिए प्रतीत होते हैं। मजबूत जीडीपी आंकड़े और आरबीआई की आसान नकदी नीति विस्फोटक साबित होनी चाहिए थी। लेकिन इसके बजाय, सभी प्रमुख सूचकांक मुश्किल से ही हिले हैं। वास्तव में, छिपे हुए राजकोषीय जोखिम और भी बड़े हैं।
राज्यों के आधिकारिक घाटे के आंकड़े बड़ी आकस्मिक देनदारियों को शामिल नहीं करते। जैसे घाटे में चल रही बिजली वितरण कंपनियां, परिवहन फर्में और बुनियादी ढांचा परियोजनाएं। इन्हें जोड़ने पर वास्तविक बोझ और भी भारी दिखाई देता है। भारत के बॉन्ड और इक्विटी बाजार राज्य की बेतहाशा उधारी के बोझ को तभी झटक पाएंगे जब कोई और अधिक प्रभावशाली कारक उन्हें विचलित करने के लिए सामने आए।
(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के संपादक और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं)