मेरा जन्म वैश्वीकरण से पहले हुआ और तब से दुनिया काफी बदल चुकी है। मैंने अपनी पुस्तक ‘द राइज ऑफ द नियो-लोकल्स: ए जेनरेशनल रिवर्सल ऑफ ग्लोबलाइजेशन’ में इसकी चर्चा विस्तार से की है। पुस्तक में मैंने इस बात का उल्लेख किया है कि मेरी 60 वर्षों की अब तक की जीवन यात्रा में दुनिया पूरी तरह बदल गई है। जब मैं छोटी थी तब भारत के आर्थिक विकास का दृष्टिकोण आत्मनिर्भरता और घरेलू विनिर्माण में निवेश पर केंद्रित था।
अपनी युवावस्था की शुरुआत में मैंने देखा कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) और मुक्त व्यापार के आगमन के साथ भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए खुलने लगी है। उस वक्त निर्यात आधारित वैश्वीकरण आर्थिक विकास के लिए स्वर्ण मानक बन गया। मगर अब अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में डॉनल्ड ट्रंप की वापसी के बाद वैश्विक व्यापार व्यवस्था में बिखराव शुरू हो गया है।
अब कुछ देशों ने शुल्क को हथियार बना लिया है। शुल्कों एवं गैर-शुल्क बाधाओं की आड़ में वैश्विक व्यापार और विदेश नीति नए सिरे से परिभाषित हो रहे हैं। वैश्विक व्यापार व्यवस्था इस आधार पर तैयार हुई थी कि विनिर्माण कार्य उन जगहों पर अधिक होंगे जहां श्रम लागत कम और पर्यावरणीय मानक मौजूद हैं। मगर इसमें अब बदलाव होना तय लग रहा है। हालांकि, इसे लेकर पुख्ता तौर पर अभी भी कुछ कहा नहीं जा सकता। मगर अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का अपनी बात मनवाने के लिए दृढ़ संकल्प दिखाई देता है।
उनका कहना है कि स्थानीय नौकरियां पैदा करने और दवाओं एवं उच्च-तकनीक गणना शक्ति की अहम आपूर्ति व्यवस्था पर नियंत्रण हासिल करने के लिए विनिर्माण कंपनियों को अमेरिका वापस आना चाहिए। वैश्विक व्यापार व्यवस्था से वर्षों तक फायदा उठाने और विदेश से सस्ता सामान अमेरिका पहुंचने के बाद अब ट्रंप का कहना है कि उनके देश के साथ छल किया गया और बेजा फायदा उठाया गया।
अब सवाल यह है कि दुनिया के विकासशील एवं पिछड़े देश क्या करें? सच्चाई यह है कि भारत जैसे कुछ देश घरेलू प्राथमिकताओं के साथ वैश्विक व्यापार व्यवस्था को संतुलित कर रहे हैं, वहीं कई अन्य दूसरों देशों के उपभोग पर अपनी अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण करते हुए आगे निकल गए हैं। मगर अब इस व्यवस्था के समक्ष चुनौती खड़ी हो रही है। ‘ट्रंप वैश्विक व्यापार क्लब’ का हिस्सा बनने के लिए आखिर किसी देश को क्या कीमत चुकानी होगी?
उदाहरण के लिए इस समूह में शामिल होने की शर्त के रूप में इंडोनेशिया (जहां अपेक्षाकृत गरीब लोगों की बड़ी तादाद है) ने मूल्य-वर्द्धन के जरिये अपनी संपत्ति का स्थानीयकरण करने के अपने प्रयासों से पीछे हटते हुए अमेरिका को निकल (दुर्लभ मृदा खनिज) के निर्यात पर प्रतिबंध हटाने पर सहमति व्यक्त की है। इसके अलावा, ट्रंप के सोशल मीडिया पोस्ट के अनुसार इंडोनेशिया अमेरिका से जीवाश्म ईंधन, प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम के साथ-साथ कृषि वस्तुओं को खरीदने पर सहमत हो गया है। बदले में इंडोनेशिया पर कम शुल्क लगाया गया है जिसका उपयोग वह उन उत्पादों का निर्यात बढ़ाने के लिए कर सकता है जो अमेरिकी उपभोक्ता पसंद करते हैं।
अमेरिका इन सौदों में अपनी बात मनवाने में इसलिए कामयाब हो रहा है क्योंकि उसके उपभोग करने वाले वर्ग का आकार बहुत बड़ा है। अमेरिका में दुनिया की कुल आबादी का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा रहता है मगर यह उपभोग कहीं अधिक है। आंकड़ों के अनुसार वैश्विक घरेलू खपत में अमेरिका का हिस्सा लगभग 30 प्रतिशत है और यह अपने उत्पादन से दोगुना या उससे अधिक खपत करता है इसलिए उसे व्यापार घाटे का सामना करना पड़ता है। मगर भारी भरकम मांग के कारण ही दुनिया के देश अमेरिकी बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की गुंजाइश खोजते रहते हैं। उन्हें हर चीज के लिए अमेरिकी बाजार में हिस्सेदारी की सख्त जरूरत है और वे कॉफी से लेकर कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक्स बहुत कुछ वहां खपाना चाहते हैं। ट्रंप प्रशासन इसी बात का फायदा उठा रहा है।
अमेरिका में अत्यधिक उपभोग का उसकी आर्थिक समृद्धि से सीधे तौर पर कोई लेना-देना नहीं है। यह जरूरी नहीं है कि कोई देश अमेरिकी शैली का सामान उपभोग करने वाला बन जाएगा क्योंकि वह अमीर है। चीन दुनिया दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और दुनिया के 17 प्रतिशत लोग वहां रहते हैं मगर वैश्विक उपभोग में उसकी महज 12 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
उपभोग की इस पहेली को समझना जरूरी है क्योंकि यह इस बात का निर्धारण करेगा कि हमारा भविष्य क्या होगा। मूल बात यह है कि अमेरिका के लोग जिस शैली में उपभोग करते हैं वह कार्बन एवं सीमित संसाधन वाली इस दुनिया में काम नहीं करेगी। अक्सर कहा जाता है कि अगर हर कोई अमेरिका के लोगों की तरह रहने लगे तो ऐसी कई और दुनिया की आवश्यकता होगी। यह बात बिल्कुल सच है। हम उपभोग उन्मुख आर्थिक प्रारूप को रोके बिना जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के समाधान की बात नहीं कर सकते। मगर यह भी सच है कि आर्थिक विकास के लिए वस्तुओं की खपत भी आवश्यकत है। पेच यहीं फंस जाता है।
तो, आगे का रास्ता क्या है? इस उपभोग की पहेली को हल करने के दो भाग हैं। पहला, और सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है किसी देश के भीतर धन का वितरण बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना ताकि उपभोग कुछ लोगों की संपत्ति से जुड़ा न रह जाए बल्कि अधिकांश लोगों की भलाई से जुड़ जाए। तथ्य यह है कि जब तक गरीबों के हाथों में पैसा रहेगा वे वस्तुओं के ‘उपभोक्ता’ बन जाएंगे। दूसरा, हमें अर्थव्यवस्था का स्थानीयकरण करने की आवश्यकता है यानी जनता द्वारा स्थानीय उत्पादन को सक्षम करना न कि स्थानीय लोगों के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन (हमारे राष्ट्रीय नायक महात्मा गांधी के शब्दों का दूसरे रूप में प्रकटीकरण)।
यह एक आधुनिक, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की नींव होनी चाहिए। हम जितना अधिक नीचे से ऊपर की ओर बढ़ेंगे हमारे समुदाय उतने ही अधिक लचीले बनेंगे और जलवायु परिवर्तन के झटकों का सामना कर पाएंगे। अब सवाल यह है कि क्या हम उस नए हरित भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जो स्थानीय उत्पादन और आजीविका को बनाए रखता है लेकिन धरती का दोहन नहीं करता है। साल 2026 और उसके बाद की चुनौती है।
(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से जुड़ी हैं)