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मैक्रो और संरचनात्मक बाधाओं के बीच तेज विकास की उम्मीदें बरकरार

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अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है, लेकिन वृहद आर्थिक आंकड़े और ढांचागत बाधाएं लगातार दबाव डाल रही हैं। बता रहे हैं टी एन नाइनन

Last Updated- January 14, 2026 | 9:53 PM IST
Economy
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

लगातार तेज वृद्धि के सालों ने टीकाकारों को यह सुझाने के लिए प्रोत्साहित किया कि अर्थव्यवस्था लंबे समय तक तेज वृद्धि के पथ पर बनी रह सकती है। इसका कारण यह है कि पिछले पांच वित्त वर्षों (2021-26) में, वर्तमान वर्ष के अग्रिम अनुमान को ध्यान में रखते हुए, औसत वृद्धि शानदार 8.1 प्रतिशत रही है, जो अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

परंतु इस आंकड़े को एक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। पिछले पांच वर्षों का रिकॉर्ड एक कमजोर आधार पर टिका है, क्योंकि कोविड वर्ष यानी 2020-21 में अर्थव्यवस्था सिकुड़ गई थी। यदि कोविड से पहले के वर्ष यानी 2019-20 को आधार माना जाए, तो पिछले छह वर्षों में वृद्धि का औसत अपेक्षाकृत कम अर्थात 5.7 प्रतिशत रहा है। यह दर सदी की शुरुआत से लेकर कोविड से पहले के वर्ष तक के पिछले 19 वर्षों के विकास रिकॉर्ड से धीमी है, जब औसत वृद्धि 6.5 प्रतिशत रही थी।

अहम सवाल यह है कि ताजा वृद्धि रिकॉर्ड का कितना हिस्सा 2020-21 में आई गिरावट से हुए सुधार का प्रतिनिधित्व करता है। और अब टिकाऊ वृद्धि दर क्या है? अगले वर्ष के लिए प्रकाशित कुछ वृद्धि पूर्वानुमान लगभग 6.5 प्रतिशत के स्तर पर हैं। इस आधार पर, तीन वर्षीय चक्र (2024-27) को देखते हुए, औसत वृद्धि 6.8 प्रतिशत होगी। यह मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के समान है। इससे संकेत मिलता है कि स्थायी वृद्धि दर में अभी तक कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है।

वृद्धि के मुख्य आंकड़ों से आगे बढ़ते हुए, आर्थिक स्थिति को समझने के लिए कई अन्य आंकड़ों पर ध्यान देना आवश्यक है। क्योंकि पहले के दौर में ज्यादातर वक्त, कोई न कोई आर्थिक संकेतक असंतुलित रहता था। या तो महंगाई अधिक होती थी, या व्यापार घाटा बड़ा होता था, साथ ही राजकोषीय घाटा भी, या फिर बैंकों और कंपनियों की बैलेंस शीट समस्याग्रस्त होती थी। इसके विपरीत, आज की अर्थव्यवस्था को गोल्डीलॉक्स चरण में बताया जाता है। महंगाई कम है, व्यापार संतुलित है, राजकोषीय घाटा कम हुआ है, और बैंक तथा कॉर्पोरेट बैलेंस शीट अब तक की सबसे बेहतर स्थिति में हैं।

इसके बावजूद वृहद आंकड़े सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 4.4 फीसदी के बराबर है। इसमें लगातार कमी आ रही है लेकिन इसके बावजूद यह मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के 3.6 फीसदी से ऊंचे स्तर पर है। यह संभवतः निवेश बढ़ाने की कोशिश और अधिक ईमानदार लेखांकन को दर्शाता है। लेकिन सार्वजनिक ऋण भी ऊंचा बना हुआ है, हालांकि इसमें भी घटने का रुझान है। जीडीपी के 81 प्रतिशत के साथ यह अर्थव्यवस्था में गिरावट आने पर राजकोषीय कार्रवाई के लिए पर्याप्त गुंजाइश नहीं देता।

इस बीच, विकास के लिए अहम बचत और निवेश दरें पहले की तुलना में कम हैं। चालू वर्ष के लिए सकल स्थायी पूंजी निर्माण जीडीपी का 30 प्रतिशत बताया गया है। यह 2012-13 तक आठ वर्षों के औसत 34 प्रतिशत से कम है। यह आंकड़ा 2015-16 में 30 प्रतिशत से नीचे चला गया था, और 2022-23 में फिर से उस सीमा से ऊपर उठा। इसी दौरान, आर्थिक गतिविधि में माल निर्यात का हिस्सा समय के साथ घटा है। यह आमतौर पर तेज विकास के लिए प्रतिकूल संकेतक माना जाता है।

अगर कोई व्यक्ति विकासोन्मुखी कहानी का समर्थन करने के लिए आंकड़े देखना चाहता है, तो उसे अन्य संख्याओं पर ध्यान देना होगा। महत्त्वपूर्ण रूप से, देश इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक में मध्यम से उच्च श्रेणी में स्थानांतरित हो सकता है। जबकि दो दशक पहले यह निम्न से मध्यम श्रेणी में पहुंचा था। यह शिक्षा स्तर, जीवन प्रत्याशा और आय में निरंतर सुधार को दर्शाता है, लेकिन ध्यान देने योग्य बात है कि एक अत्यधिक उच्च श्रेणी भी है जिसमें 70 से अधिक देश शामिल हैं।

आर्थिक प्रबंधन की बात करें तो कर दरें (कॉरपोरेशन टैक्स, आयकर, वस्तु एवं सेवा कर आदि) अब पहले की तुलना में अधिक युक्तिसंगत हो गई हैं। जो डिजिटल सार्वजनिक अधोसंरचना स्थापित की गई है और व्यापक रूप से उपयोग में आ रही है, उससे उत्पादकता में सुधार होना चाहिए। इसी तरह, भौतिक बुनियादी ढांचे में किए गए भारी निवेश से सड़क और रेल दोनों पर माल की आवाजाही तेज हुई है। हालांकि इससे वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री पर बुरा असर हुआ है। कई क्षेत्रों को सुधारों से लाभ हुआ है, जैसे अचल संपत्ति, और विनिर्माण क्षेत्र को अंततः कुछ गति मिलती दिख रही है, जिसका नेतृत्व इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र कर रहा है। हाल ही में हुए मुक्त व्यापार समझौते भी भविष्य में लाभ प्रदान करेंगे।

खपत सबसे बड़ी संरचनात्मक बाधा है। इसकी धीमी वृद्धि ने निजी कॉर्पोरेट निवेश को पीछे धकेला है (पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन औद्योगिक क्षेत्रों में सबसे धीमी गति से बढ़ा है)। आय के निचले स्तर पर अच्छी खबर यह है कि पूर्ण गरीबी के आंकड़ों में तेज गिरावट आई है, लेकिन यह उपभोक्ता मांग में बहुत अधिक वृद्धि में परिवर्तित नहीं हो सकता। खासकर इसलिए कि रोजगार पहले से ही अत्यधिक जनसंख्या वाले कृषि क्षेत्र की ओर स्थानांतरित हुआ है, उससे दूर नहीं।

आय की श्रेणी में ऊपर जाएं तो खपत ऋण काफी अधिक है। वर्ष 2023-24 में आम परिवारों की वित्तीय देनदारी 8.99 लाख करोड़ रुपये से दोगुनी बढ़कर 18.79 लाख करोड़ रुपये हो गई। यह बात भविष्य की खपत वृद्धि को प्रभावित करेगी। ये देनदारियां पहले घरेलू वित्तीय बचत का लगभग एक चौथाई थीं। अब यह अनुपात बढ़कर एक-तिहाई हो गया है। आय प्रवाह पर ऋण चुकाने की बाध्यता के कारण यह भविष्य की खपत वृद्धि पर दबाव डालेगा। पहले से ही कई क्षेत्रों में धीमी वृद्धि देखी जा रही है। विशेष रूप से रेलवे यात्री यातायात धीमी गति पर रहा है, जहां वंदे भारत ट्रेनों की शुरुआत के बावजूद शुद्ध यात्री किलोमीटर पूरे एक दशक में जरा भी नहीं बढ़े।

ऐसे में आश्चर्य नहीं कि जब एक शीर्ष उपभोक्ता वस्तु कंपनी के मुख्य कार्याधिकारी ने एक साक्षात्कार में कहा कि वह शीर्ष 20 फीसदी उपभोक्ताओं पर ध्यान दे रहे हैं क्योंकि वृद्धि वहीं संभव है। लेकिन 2024 तक के पांच सालों में विमान यातायात भी केवल 11 फीसदी की दर से बढ़ा। हवाई अड्डों की संख्या में इजाफा विमानन गतिविधि का सही संकेतक नहीं है।

वास्तविक समस्या यह है कि 1990-91 में सुधारों की शुरुआत के बाद से अर्थव्यवस्था में पर्याप्त ढांचागत परिवर्तन नहीं हुए हैं, जबकि प्रति व्यक्ति आय लगभग पांच गुना बढ़ चुकी है। उस समय उद्योग जीडीपी का एक चौथाई हिस्सा थे, और आज भी उतने ही हैं। कृषि का हिस्सा घटा है, लेकिन कई मामलों में फसल उत्पादन विश्व मानकों से काफी नीचे है (जिसके कारण उच्च स्तर की शुल्क सुरक्षा आवश्यक हो जाती है और व्यापार वार्ताओं में कठिनाई आती है)।
सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया है, लेकिन इसका बड़ा भाग अब भी असंगठित क्षेत्र में है। गिग रोजगार उचित नौकरियों का विकल्प नहीं है।

उत्पादकता में वृद्धि तीन संरचनात्मक परिवर्तनों पर निर्भर करती है, जो अभी तक नहीं हुए हैं: एक पर्याप्त बड़ा विनिर्माण क्षेत्र, दूसरा अर्थव्यवस्था का
अधिक औपचारिकीकरण और तीसरा तेज शहरीकरण। अब तक इन तीनों में से किसी का भी पर्याप्त प्रमाण नहीं है। बल्कि, शहरीकरण धीमा पड़ गया हो सकता है। हालांकि हाल के वर्षों में कई चीजें सुधरी हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था को उल्लेखनीय गति देने से पहले अभी बहुत काम किया जाना बाकी है।


(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के संपादक और चेयरमैन रह चुके हैं)

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First Published - January 14, 2026 | 9:48 PM IST

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