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Explainer: क्यों ट्रंप के जबरदस्त टैरिफ के बावजूद दक्षिण-पूर्व एशिया से अमेरिका को निर्यात नहीं रुका?

अमेरिकी व्यापार डेटा दिखाते हैं कि ट्रंप के टैरिफ के बावजूद दक्षिण-पूर्व एशिया से अमेरिका के लिए निर्यात बढ़ा, जिसके कई बड़े कारण हैं

Last Updated- January 06, 2026 | 6:00 PM IST
Trump Tariffs
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पिछले साल पारस्परिक टैरिफ (reciprocal tariffs) की घोषणा की थी, तो इसका मकसद वैश्विक व्यापार को प्रभावित करना और बड़े निर्यातक देशों को वॉशिंगटन की मांगों के मुताबिक दबाव में लाना था। हालांकि, ताजा आंकड़े बताते हैं कि अब तक दक्षिण-पूर्व एशिया ने इस टैरिफ के सबसे बुरे असर से बचाव किया है। यहां से अमेरिका को होने वाले निर्यात में गिरावट नहीं आई, क्योंकि तकनीकी मांग मजबूत रही, निर्माण लागत प्रतिस्पर्धात्मक रही और माल को चीन से अलग रास्तों से भेजा गया।

दक्षिण-पूर्व एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान क्यों हो सकता था?

अप्रैल 2025 में, ट्रंप ने कई दक्षिण-पूर्व एशियाई निर्माण केंद्रों पर “पारस्परिक” टैरिफ की घोषणा की, जिसकी दर 49 प्रतिशत तक थी। इससे क्षेत्र से निर्यात में तेज गिरावट का डर बढ़ गया। चिंता यह थी कि अधिक कस्टम ड्यूटी से दक्षिण-पूर्व एशिया की लागत लाभ (cost advantage) कम हो जाएगा, जो इसे वैश्विक कंपनियों के लिए वैकल्पिक उत्पादन आधार बनाता था।

हालांकि, बाद में ये टैरिफ लगभग 20 प्रतिशत तक कम कर दिए गए थे, लेकिन अनिश्चितता बनी रही, खासकर उन अर्थव्यवस्थाओं के लिए जो अमेरिका पर बहुत अधिक निर्भर थीं।

निर्यात के नए आंकड़े क्या बताते हैं?

आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया ने नुकसान की बजाय मजबूती दिखाई है। अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई से सितंबर 2025 के बीच दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से अमेरिका को होने वाला निर्यात 2024 की समान अवधि के मुकाबले 25 प्रतिशत बढ़ा। Financial Times में बताए गए डेटा में इसकी जानकारी दी गई।

इसके विपरीत, चीन से अमेरिका को होने वाला निर्यात काफी गिरा। 2025 के तीसरी तिमाही में चीन से भेजे गए माल में सालाना आधार पर 40 प्रतिशत की कमी हुई। हालांकि, पूरे एशिया से अमेरिका को होने वाला निर्यात आम तौर पर स्थिर रहा, जो दर्शाता है कि उत्पादन क्षेत्र के भीतर ही किसी अन्य देश के जरिए अमेरिका को भेजा गया, न कि पूरी तरह खो गया।

‘चाइना प्लस वन’ रणनीति व्यापार प्रवाह को कैसे बदल रही है?

कंपनियां अभी भी ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति अपना रही हैं। इसमें वे चीन में अपना काम चलाती रहती हैं और किसी दूसरी जगह भी अपने ऑपरेशन बढ़ाती हैं। यह तरीका ट्रंप के पहले कार्यकाल में काफी लोकप्रिय हुआ था और अब भी इस्तेमाल हो रहा है।

Capital Economics के आंकड़ों के मुताबिक, Financial Times की रिपोर्ट में बताया गया है कि सितंबर में चीन से अमेरिका जाने वाले व्यापार का रीरूटिंग 23.7 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे ज्यादा है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, अब चीन से अमेरिका के लिए अप्रत्यक्ष निर्यात सीधे व्यापार जितना ही बड़ा हो गया है।

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कौन से देश सबसे ज्यादा लाभ उठा रहे हैं?

रिपोर्ट में बताया गया है कि कंबोडिया ने सबसे तेज बढ़ोतरी दिखाई। Capital Economics के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में अमेरिका की ओर कंबोडिया के जरिए चीन से अप्रत्यक्ष निर्यात पिछले साल की तुलना में 73 प्रतिशत बढ़ गया। अप्रैल में 49 प्रतिशत टैरिफ के बावजूद बाद में इसे 19 प्रतिशत कर दिया गया, और कंबोडिया का वस्त्र क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है। कपड़े अमेरिका के लिए सबसे बड़ा निर्यात हैं, और ताशाख (knitted garments) का निर्यात तीसरी तिमाही 2024 से 2025 के बीच लगभग 25 प्रतिशत बढ़ा।

Financial Times के अनुसार, उद्योग से जुड़े अधिकारी बताते हैं कि अमेरिकी खरीदारों के डिस्काउंट की मांग के कारण मार्जिन कम हुआ है, लेकिन विदेशी निवेश जारी है, जिनमें ज्यादातर चीन के मुख्य भूमि कंपनियों से आया है।

अन्य देशों ने भी इसका फायदा उठाया। वियतनाम ने 2025 के पहले 11 महीनों में अमेरिका के साथ 121.6 बिलियन डॉलर का रिकॉर्ड व्यापार अधिशेष दर्ज किया। थाईलैंड में अक्टूबर में चीन से आयात 34 प्रतिशत बढ़ा और अमेरिका को निर्यात 33 प्रतिशत बढ़ा।

अमेरिकी तकनीकी मांग की भूमिका

अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक्स की मजबूत मांग ने दक्षिण-पूर्व एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को टैरिफ अस्थिरता में सहारा दिया। कई तकनीकी उत्पाद जैसे सेमीकंडक्टर, चिप बनाने का उपकरण, कंप्यूटर और स्मार्टफोन टैरिफ से मुक्त रहे।

Financial Times के अनुसार, एशिया से इलेक्ट्रॉनिक माल का निर्यात सालाना आधार पर लगभग 40 प्रतिशत बढ़ रहा है, जो महामारी के दौरान हुई तेजी से भी तेज है।

First Published - January 6, 2026 | 6:00 PM IST

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