बीमारी के समय हेल्थ इंश्योरेंस का क्लेम रिजेक्ट हो जाए और वजह बताई जाए ‘नॉन-डिस्क्लोजर’ यानी जानकारी छिपाना, तो लगता है जैसे कोई गुनाह कर दिया हो। तनाव के उस पल में यह झटका और भारी पड़ता है। लेकिन इंश्योरेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि ज्यादातर मामलों में ऐसा जानबूझकर छिपाने से नहीं, बल्कि मेडिकल रिकॉर्ड की वजह से हो सकता है।
इंश्योरेंस कंपनियां ‘नॉन-डिस्क्लोजर’ से क्या समझती हैं?
Policybazaar.com के हेल्थ इंश्योरेंस बिजनेस हेड सिद्धार्थ सिंघल कहते हैं कि कंपनियां तब ‘नॉन-डिस्क्लोजर’ का हवाला देती हैं जब उन्हें लगता है कि पॉलिसी लेते समय हेल्थ से जुड़ी कोई जरूरी जानकारी नहीं बताई गई। यह फैसला मुख्य रूप से क्लेम के साथ जमा किए गए हॉस्पिटल रिकॉर्ड पर आधारित होता है। कंपनियां पुरानी मेडिकल हिस्ट्री, चल रही दवाइयां या डिस्चार्ज समरी में लिखी टिप्पणियां बहुत बारीकी से जांचती हैं।
स्क्वायर इंश्योरेंस के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर राकेश कुमार का कहना है कि कंपनियां अक्सर ‘हिस्ट्री ऑफ’, ‘सस्पेक्टेड’ या ‘बॉर्डरलाइन’ जैसे ढीले-ढाले शब्दों पर ही क्लेम रोक देती हैं, भले ही पॉलिसी शुरू होने से पहले कोई औपचारिक डायग्नोसिस या इलाज न हुआ हो। हाइपरटेंशन, डायबिटीज, थायरॉइड या फैटी लिवर जैसी लाइफस्टाइल से जुड़ी समस्याओं को सबसे ज्यादा फ्लैग किया जाता है।
प्री-एक्सिस्टिंग डिजीज और संयोग से मिली जानकारी में फर्क
राकेश कुमार बताते हैं कि कंपनियां मुख्य रूप से तीन बातें देखती हैं:
- क्या पॉलिसीधारक को बीमारी का पहले से पता था
- क्या पॉलिसी शुरू होने से पहले लगातार इलाज चल रहा था
- क्या यह जानकारी देने पर अंडरराइटिंग के नियम बदल जाते
लेकिन कोर्ट और इंश्योरेंस ‘ओम्बड्समैन’ बार-बार कह चुके हैं कि ‘नॉन-डिस्क्लोजर’ जानबूझकर और महत्वपूर्ण होना चाहिए, बाद में पीछे मुड़कर अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
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आनंद राठी इंश्योरेंस ब्रोकर्स में एम्प्लॉय बेनिफिट्स हेड मिलिंद तायडे कहते हैं कि कंपनियां ‘रिजनेबल पर्सन’ टेस्ट लगाती हैं। अगर पॉलिसी शुरू होने से पहले कोई लक्षण नहीं थे, डॉक्टर से सलाह नहीं ली गई थी और कोई मेडिकल एडवाइस नहीं मिली थी, तो संयोग से पता चली या अचानक मिली जानकारी को प्री-एक्सिस्टिंग नहीं माना जाता।
लॉ फर्म ElpeeCo के एग्जीक्यूटिव पार्टनर आनंद आर चौधरी ने कहा कि पॉलिसी पीरियड में नई बीमारी पता चलने पर अपने आप क्लेम रिजेक्ट नहीं किया जा सकता, जब तक मेडिकल हिस्ट्री से साफ न दिखे कि वह पहले से मौजूद थी।
कौन से डॉक्यूमेंट्स गेम चेंजर बन सकते हैं?
सभी एक्सपर्ट मानते हैं कि केस का फैसला ज्यादातर डॉक्यूमेंट पर टिका होता है। राकेश कहते हैं, “इलाज करने वाले डॉक्टर का सर्टिफिकेट कि पॉलिसी लेते समय बीमारी का पता नहीं था या वह क्लिनिकली महत्वपूर्ण नहीं थी, बहुत वजन रखता है।”
मिलिंद तायडे के मुताबिक, लक्षण और डायग्नोसिस की साफ-साफ टाइमलाइन बनाना, जिसमें पॉलिसी शुरू होने की तारीख स्पष्ट हो, बहुत जरूरी है।
सिद्धार्थ सिंघल ने प्रपोजल फॉर्म, टेली-अंडरराइटिंग रिकॉर्ड, पुरानी डिस्चार्ज समरी और पॉलिसी से पहले के घोषणापत्र को अहम बताया। FatakSecure के CEO विकाश चौधरी का कहना है कि पॉलिसी लेने से पहले की सालाना हेल्थ चेक-अप रिपोर्ट में अगर सब नॉर्मल दिख रहा हो, तो वह भी कंपनी के अनुमान को गलत साबित करने में मदद करती है।
कब और कैसे आगे की शिकायत करें?
सभी एक्सपर्ट्स की यही सलाह देते है कि लिखित रिजेक्शन मिलते ही बिना देरी किए कंपनी से शिकायत करना चाहिए। राकेश कहते हैं कि अगर 30 दिन में बात नहीं बनती तो इंश्योरेंस ‘ओम्बड्समैन’ के पास जाना सबसे कारगर होता है।
जबकि आनंद आर चौधरी ने चेताया कि गलतियां जैसे कंपनी से शिकायत करना, अलग-अलग डॉक्यूमेंट जमा करना या बिना समझे ”नॉन-डिस्क्लोजर” मान लेना, केस को कमजोर कर देती हैं।
लेकिन सबसे बड़ी सीख जो एक्सपर्ट दे रहे हैं, वह यह कि हेल्थ इंश्योरेंस में जानकारी बताने के मामले में कोई रियायत नहीं होती। पॉलिसी लेते समय ज्यादा-से-ज्यादा बताना शायद थोड़ा असुविधाजनक लगे, लेकिन बाद में रिजेक्शन से लड़ने से कहीं आसान जरूर होता है।
