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Editorial: महंगे तेल से बढ़ेंगी दिक्कतें

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सऊदी अरब ने तेल उत्पादन में रोजाना 10 लाख बैरल कमी करने की बात कही है तो रूस ने भी आपूर्ति में 3 लाख बैरल प्रति दिन कमी करने की इच्छा जताई है।

Last Updated- September 06, 2023 | 9:35 PM IST
Petrochemical Duty Exemption

आपूर्ति संबंधित चिंताओं के बीच अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में फिर हलचल मच गई है। इसे देखते हुए कच्चे तेल के प्रति बैरल दाम उन स्तरों पर पहुंच गए हैं, जो पिछले साल से नहीं दिखे थे। तेल के दामों में तेजी इस खबर के बाद आई है कि दो प्रमुख उत्पादक देश सऊदी अरब और रूस आपूर्ति में स्वैच्छिक कमी अगले तीन महीने तक के लिए बढ़ाना चाह रहे हैं।

सऊदी अरब ने तेल उत्पादन में रोजाना 10 लाख बैरल कमी करने की बात कही है तो रूस ने भी आपूर्ति में 3 लाख बैरल प्रति दिन कमी करने की इच्छा जताई है। इससे सर्दी के महीनों मे तेल की आपूर्ति कम रह सकती है। सर्दी के महीनों में उत्तरी गोलार्द्ध में ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ जाती है। तेल उत्पादन में कमी के पीछे भू-राजनीति पर भी विचार करना आवश्यक हो जाता है।

तेल की आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम होने से अमेरिका और यूरोपीय देशों के लिए परेशानी बढ़ जाती है और यह सऊदी अरब और व्लादीमिर पुतिन ने नेतृत्व में रूस के साथ नजदीकी बढ़ने का भी संकेत समझा जाता है। अमेरिका को यह बात शर्तिया पसंद नहीं आएगी।

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हालांकि, तेल के दाम अपने उच्चतम स्तर से तेजी से नीचे फिसले हैं, मगर विश्लेषकों को लगता है कि इस साल के अंत तक कच्चा तेल प्रति बैरल और महंगा हो जाएगा और यह लगभग 95 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएगा। कुछ लोग तो यह भी कहने लगे है कि दाम 100 डॉलर या इससे अधिक भी हो सकते हैं। चीन की अर्थव्यवस्था में सुधार अपेक्षा से कम रहा है मगर अमेरिका का प्रदर्शन मंदी की चिंताओं को नकार रहा है। फेडरल रिजर्व को पूरे साल के लिए वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाना पड़ सकता है।

अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन को लेकर बेहतर अनुमान अगले कुछ महीनों तक तेल के दाम को ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकते हैं। इससे पूरे विश्व में मुद्रास्फीति बढ़ेगी। 2023 की पहली छमाही में तेल के दाम पिछले साल की समान अवधि की तुलना में काफी कम रहे हैं। पिछले साल यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद तेल के दाम बढ़ गए थे। इसका असर यह हुआ था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में महंगाई की चाल थोड़ी नरम हो गई थी। लोगों को लगा था कि महंगाई थामने के लिए अब अधिक प्रयास की आवश्यकता नहीं है मगर अब तेल के दाम बढ़ने से मामला फिर बिगड़ सकता है।

तेल के दाम बढ़ने से विशेषकर भारत में कई चिंताएं सिर उठा सकती हैं। तेल के दाम ऐसे समय में बढ़ रहे हैं जब देश में एक के बाद एक चुनाव होने वाले हैं। भारत में कच्चा तेल लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। ऊंचे कर के माध्यम से प्राप्त राजकोषीय लाभ अर्जित करने के बात अब तेल के दाम बढ़ने से एक विषम परिस्थिति पैदा हो गई है।

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तेल के ऊंचे दाम का घरेलू उत्पादन पर प्रभाव और इससे कर संग्रह पर असर की अनदेखी नहीं की जा सकती है। कर राजस्व के केंद्र सरकार के नवीनतम आंकड़े असहज करने वाले हैं क्योंकि यह शुद्ध कर राजस्व में कमी आने का संकेत दे रहा है।

हालांकि, अधिकारियों ने हाल में जोर देकर कहा है कि आर्थिक वृद्धि, राजस्व और राजकोष से जुड़े बजट अनुमानों में संशोधन करने की आवश्यकता नहीं है, मगर इस बात को लेकर अधिक संदेह नहीं कि आने वाले समय में आनुपातिक आधार पर कर संग्रह नहीं बढ़ने से राजकोषीय गणित उलझन में डाल सकता है।

आम चुनाव से ठीक पहले व्यय कम करना सरकार के लिए राजनीतिक रूप से कठिन हो सकता है। प्रधानमंत्री ने हाल में एक साक्षात्कार में कहा था कि राजकोषीय उत्तरदायित्व के प्रति अडिग रुख उनकी सरकार की एक प्रमुख नीतिगत विशेषता रही है। मगर तेल के बढ़ते दाम, मुद्रास्फीति में तेजी और राजस्व में कमी सरकार के लिए कठिनतम चुनौती साबित हो सकते हैं।

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First Published - September 6, 2023 | 9:35 PM IST

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