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मौद्रिक नीति और ‘तीन तरफा दुविधा’ पर गंभीर व खुली बहस की जरूरत

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भले ही दुनिया में नीतियां कई लक्ष्यों पर आधारित हो रही थीं, लेकिन भारत के लिए उस समय सबसे जरूरी काम बढ़ती महंगाई को काबू में करना था

Last Updated- December 18, 2025 | 11:44 PM IST
monetary policy
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र में ‘असंभव त्रयी’ एक बुनियादी सिद्धांत है। यह कहता है कि कोई भी देश एक साथ स्थिर विनिमय दर बनाए रखना, पूर्ण पूंजी गतिशीलता की अनुमति देना, और स्वतंत्र मौद्रिक नीति का पालन नहीं कर सकता। 

मुद्रास्फीति को वरीयता: ऊर्जित पटेल कमेटी की जनवरी 2014 में आई रिपोर्ट ने भारत के मौद्रिक नीति ढांचे को आकार दिया। रिपोर्ट ने तीन तरफा दुविधा को पहचाना और लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्य को वरीयता देने की अनुशंसा की। उसने विनिमय दर निर्धारण में भी लचीलेपन को वरीयता दी तथा पूंजी प्रवाह प्रबंधन और वृहद विवेक उपायों के संयोजन की मदद से अस्थिरता को नियंत्रित करने की बात कही।

रिपोर्ट में कहा गया कि हालांकि अंतरराष्ट्रीय नीतिगत सहमति विविध लक्ष्यों, उपायों और ढांचों की ओर हो रही है लेकिन भारत को पहले उच्च मुद्रास्फीति कम करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं को स्थिर करना अंततः मूल्य स्थिरता का त्याग किए बिना अन्य उद्देश्यों को पूरा करने के लिए लचीलापन प्रदान करेगा।

इसके अलावा रिपोर्ट में यह अनुशंसा की गई कि रिजर्व बैंक पूंजी के बाहर जाने के समय बचाव के लिए बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा भंडार तैयार करे। वर्ष 2013 की ‘टेपर टैंट्रम’ ( ग्लोबल इक्विटी और बॉन्ड में तेजी से हुई बिकवाली, जब अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने कहा कि वह अपने बड़े बॉन्ड खरीद कार्यक्रम को कम करेगा) की घटना के बाद, रिपोर्ट ने असामान्य मौद्रिक उपायों के लिए लचीलापन बनाए रखने का भी आह्वान किया, जो पुनः तीन तरफा दुविधा को दर्शाता है।

मार्च 2025 तक भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार (बकाया अग्रिम बिक्री के समायोजन के बाद) मार्च 2013 की तुलना में पूर्ण रूप से दोगुने से अधिक हो गया। हालांकि, सापेक्षिक रूप से भंडार लगभग समान रहा और यह सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का लगभग 15 फीसदी था। 

एमपीसी अधिदेश: जून 2016 में रिजर्व बैंक अधिनियम में संशोधन किया गया। प्रस्तावना ने मौद्रिक नीति का उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना निर्धारित किया, साथ ही आर्थिक विकास के लक्ष्य पर भी विचार किया। अधिनियम के जरिये मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की स्थापना की गई, जिसे मुद्रास्फीति लक्ष्य प्राप्त करने के लिए नीतिगत दर तय करने का कार्य सौंपा गया। सरकार ने यह लक्ष्य 4 फीसदी निर्धारित किया, जिसमें दो फीसदी ऊपर या नीचे का सहनशीलता दायरा रखा गया।

समय के साथ, एमपीसी ने बाहरी क्षेत्र पर ध्यान दिए बिना स्वतंत्र मौद्रिक नीति अपनाई। उदाहरण के लिए, 5 दिसंबर 2025 को एमपीसी के वक्तव्य में बाहरी क्षेत्र के बारे में कोई उल्लेख नहीं किया गया, जबकि भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90 के मनोवैज्ञानिक स्तर के आसपास था। उल्लेखनीय है कि अगस्त 2025 में मौद्रिक नीति ढांचे की समीक्षा पर आरबीआई का चर्चा पत्र भी तीन तरफा दुविधा का उल्लेख नहीं करता है।

मुद्रा बाजार हस्तक्षेप: आधिकारिक रूप से रिजर्व बैंक कहता है कि वह रुपये और डॉलर के किसी विशेष स्तर को लक्ष्य नहीं बनाता है और केवल अस्थिरता दूर करने के लिए हस्तक्षेप करता है। लेकिन व्यवहार में रिजर्व बैंक भुगतान संतुलन के बड़े अधिशेषों और घाटों की भरपाई में अहम कारक है और इस प्रकार वह मूल्य और अस्थिरता दोनों को प्रभावित करता है।

इस पर बल देते हुए, वित्त वर्ष 2017-18 से 2024-25 के बीच, हाजिर और वायदा बाजारों में रिजर्व बैंक का औसत वार्षिक शुद्ध हस्तक्षेप 60 अरब डॉलर से अधिक रहा, जो सकल घरेलू उत्पाद के 2 फीसदी से अधिक है।

डॉलर और रुपये की अस्थिरता और अधिक अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। वित्त वर्ष 2017-18 से वित्त वर्ष 2021-22 तक औसत वार्षिक दैनिक अस्थिरता 5.5 फीसदी थी जो डीएक्सवाई सूचकांक की करीब 6 फीसदी वार्षिक दैनिक अस्थिरता के आसपास थी। यह सूचकांक छह प्रमुख मुद्राओं के समक्ष डॉलर के प्रदर्शन को आंकता है। इस अवधि में विशुद्ध निवेश पूंजी प्रवाह जीडीपी के 1.7 फीसदी के बराबर रहा।

इसके विपरीत वित्त वर्ष 2022-23  और वित्त वर्ष 2024-25 में सालाना डॉलर/रुपया अस्थिरता घटकर 3.3 फीसदी रह गई जबकि डीएक्सवाई अस्थिरता बढ़कर 7.4 फीसदी हो गई थी। डॉलर और रुपया अन्य प्रमुख मुद्रा युग्मों की तुलना में कम अस्थिर हुए हैं। मीडिया रिपोर्ट में इसका श्रेय रिजर्व बैंक के सक्रिय हस्तक्षेप को दिया गया जिसके चलते रुपये का अवमूल्यन घटा। ध्यान देने वाली बात है कि पूंजी प्रवाह इस तीन वर्ष की अवधि में घटकर जीडीपी के 0.6 फीसदी के बराबर रह गया।

क्या भारत को हमेशा डॉलर और रुपये की गति में लचीलेपन की इजाजत देनी चाहिए? यद्यपि आर्थिक सिद्धांत बदलती बुनियादी परिस्थितियों के अनुसार मुद्रा बाजारों को समायोजित होने देने का पक्षधर हो सकता है, कुछ परिस्थितियों में सक्रिय हस्तक्षेप के लिए ठोस तर्क मौजूद हो सकते हैं, भले ही वे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के विचारों से बाहर हों।

मुद्रा बाजार स्थिरता : इस पर एक जानकारीपरक बहस की आवश्यकता है कि किन परिस्थितियों में अल्पावधि में मुद्रा बाजार स्थिरता बनाए रखना आवश्यक माना जा सकता है। यह बहस वस्तुनिष्ठ मानदंडों द्वारा निर्देशित होनी चाहिए, जो वास्तविक प्रभावी विनिमय दर और अस्थिरता से जुड़ी हो सकती है। यह ऊर्जित पटेल रिपोर्ट के उस आह्वान की ही गूंज है जिसमें कहा गया था कि ‘समय-असंगति को हतोत्साहित किया जाए, जिसमें हित समूहों के दबाव भी शामिल हैं।’ ध्यान देने योग्य बात है कि 36  देशों के व्यापार-भारित वास्तविक प्रभावी विनिमय दर के संदर्भ में, भारतीय रुपया अब कई वर्षों में सबसे कमजोर स्थिति में है।

यदि मुद्रा बाजार की अस्थिरता को नियंत्रित करना जरूरी माना जाता है, तो मौद्रिक नीति को और अधिक बारीकियों वाला होना पड़ेगा। उदाहरण के लिए, यदि तात्कालिक लक्ष्य रुपये के अवमूल्यन को रोकना है, तो नीतिगत दरों में कटौती प्रतिकूल साबित हो सकती है, भले ही मुद्रास्फीति और उत्पादन अंतराल के अनुमान इसकी अनुमति दें। दरों को कम करने से अन्य मुद्राओं के साथ ब्याज दर का अंतर घट जाएगा, जिससे रुपया आधारित परिसंपत्तियां कम आकर्षक हो जाएंगी।

इससे डॉलर/रुपया फॉरवर्ड प्रीमियम कम हो सकता है, यह आयातकों को हेजिंग के लिए प्रोत्साहित कर सकता है, निर्यातकों को हतोत्साहित कर सकता है और रुपये के विरुद्ध सट्टेबाजी को सस्ता बना सकता है। वास्तव में, बढ़ती मुद्रा चिंताएं परिसंपत्तियों की बिक्री को प्रेरित कर सकती हैं और विडंबना यह है कि इससे बॉन्ड यील्ड और अधिक बढ़ सकती है।

वर्ष 2018-19 और 2021-22 के बीच डॉलर और रुपये का एक साल का फॉरवर्ड प्रीमियम औसतन 4.3 फीसदी था। तब से यह घटकर औसतन 2.2 फीसदी रह गया है। भारत और अमेरिका के बीच मुद्रास्फीति के कम होते अंतर के कारण इसे उचित ठहराया जा सकता है लेकिन यह रुपये की गिरावट को भी गति दे सकता है।

एक बहस की ओर: इस असंभव त्रयी को देखते हुए हमें इस बात पर एक जानकारीपरक बहस की आवश्यकता है कि किन परिस्थितियों में वित्तीय स्थिरता और मुद्रा बाजार अल्पावधि में मौद्रिक नीति के संचालन को प्रभावित कर सकते हैं। ऊर्जित पटेल रिपोर्ट ने सुझाव दिया था कि अच्छी तरह से स्थिर की गई मुद्रास्फीति अपेक्षाएं अंततः अन्य उद्देश्यों को पूरा करने के लिए लचीलापन प्रदान कर सकती हैं, वह भी बिना मूल्य स्थिरता से समझौता किए।

मध्यम अवधि में, बाहरी संतुलन को संबोधित करना भी आवश्यक होगा, जिसके लिए मूलभूत कारकों यानी व्यापार और पूंजी प्रवाह आदि से निपटना होगा। यह मौद्रिक और मुद्रा नीति को और अधिक सूक्ष्म बना सकता है, जो वास्तविकता को प्रतिबिंबित करेगा। अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र की जटिलता की न तो अनदेखी की जा सकती है और न ही उसे कानून बनाकर दूर किया जा सकता है।

(लेखक सेबी के पूर्णकालिक सदस्य रह चुके हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - December 18, 2025 | 9:53 PM IST

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