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इले​क्ट्रॉनिक उत्पादों का अड्डा बनेगा भारत, 44,000 करोड़ रुपये आवंटित करने की सिफारिश!

कार्यबल इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए PLI योजना को 2030 तक जारी रखने और अब तक मिले तजुर्बों के हिसाब से पीएलआई योजनाओं को आगे बढ़ाने की भी वकालत कर रहा है।

Last Updated- July 03, 2024 | 11:20 PM IST
semiconductor

देसी कंपनियों को इलेक्ट्रॉनिक एवं सेमीकंडक्टर उत्पाद तैयार करने और वैश्विक ब्रांड बनने में मदद करने के लिए 44,000 करोड़ रुपये आवंटित करने की सिफारिश की जा सकती है। भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सेमीकंडक्टर का अड्डा बनाने के मकसद से इले​क्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा गठित कार्यबल अपनी रिपोर्ट में इसकी सिफारिश कर सकता है। कार्यबल रिपोर्ट को अंतिम रूप दे रहा है और उसमें 2024 से 2030 के बीच आवंटन की बात होगी।

कार्यबल के एक सदस्य ने बताया कि सिफारिश के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों (सिस्टम) के लिए 15,000 करोड़ रुपये, सेमीकंडक्टर उत्पादों के लिए 11,000 करोड़ रुपये और प्रतिभा विकास, साझा बुनियादी ढांचा, लॉजिस्टिक्स एवं प्रौद्योगिकी व आईपी (बौद्धिक संपदा) जैसे प्रोत्साहनों के लिए 18,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया जा सकता है। सरकार से मंजूरी मिल गई तो तो यह आवंटन मोबाइल उपकरण एवं इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के लगभग बराबर होगा।

सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार अजय के सूद की अध्यक्षता में इस कार्यबल का गठन पिछले साल मार्च में हुआ था। इसमें एचसीएल के संस्थापक एवं एपिक फाउंडेशन के अध्यक्ष अजय चौधरी, डिक्सन टेक्नोलॉजिज के एमडी सुनील वचानी, तेजस के पूर्व एमडी संजय नायक, वीवीडीएन टेक्नोलॉजिज के सीईओ पुनीत अग्रवाल, बोट के संस्थापक अमन गुप्ता, आईसीईए के अध्यक्ष पंकज मोहिंद्रू, इले​क्ट्रिॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के संयुक्त सचिव सुशील पाल और दूरसंचार विभाग, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग तथा उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के प्रतिनिधि शामिल हैं।

कार्यबल के प्रस्ताव में केवल भारतीय कंपनियों को लाभ पहुंचाने पर ध्यान दिया गया है। इसलिए यह पीएलआई योजना से अलग है, जहां वैश्विक कंपनियों की महत्त्वपूर्ण भागीदारी शामिल है। कार्यबल ने भारतीय कंपनी की स्पष्ट परिभाषा देते हुए कहा है कि कंपनी में 51 फीसदी हिस्सेदारी भारतीयों के पास होनी चाहिए और उसका मुख्यालय भी देश में ही होना चाहिए। इसके अलावा सभी वैश्विक लाभ, उत्पादों की बिक्री से प्राप्त वित्तीय लाभ, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, आईपी लाइसेंसिंग और निवेश भारतीय मूल की कंपनी को मिलने चाहिए।

चौधरी ने कहा, ‘वै​श्विक कंपनियों के पास उत्पादों की ब्रांडिंग एवं डिजाइन के लिए पर्याप्त रकम होती है। यही कारण है कि हमने शर्तें काफी कठोर रखी हैं और पारदर्शी तरीके से बताया है कि भारतीय कंपनी क्या है ताकि कोई भ्रम न रहे।’

उन्होंने इस पहल के पीछे दूरगामी नजरिया होने की बात स्वीकार करते हुए कहा कि भारत को डिजाइन एवं उत्पाद का अगुआ बनाने में 20 साल लग जाएंगे। मगर इसकी शुरुआत अभी हो जानी चाहिए ताकि इलेक्ट्रॉनिक्स आयात में होने वाला खर्च तेल आयात के खर्च से ज्यादा न हो जाए।

कार्यबल इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए पीएलआई योजना को 2030 तक जारी रखने और अब तक मिले तजुर्बों के हिसाब से पीएलआई योजनाओं को आगे बढ़ाने की भी वकालत कर रहा है।

First Published - July 3, 2024 | 10:58 PM IST

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