घरेलू और वैश्विक स्तर पर न्यूट्रास्युटिकल उद्योग तेजी से विकसित हो रहा है। बदलती जीवनशैली, तनावपूर्ण दिनचर्या और असंतुलित आहार ने लोगों को वैकल्पिक स्वास्थ्य समाधान खोजने पर मजबूर कर रहा है । बढ़ती मांग की वजह से यह उद्योग फार्मास्यूटिकल्स की तुलना में 10 गुना अधिक रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। अमेरिका सहित कई देशों के साथ हुए व्यापारिक समझौते इस उद्योग और मजबूत करेगा।
मुंबई के जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में चल रहे वीटाफूड्स इंडिया 2026 में उद्योग जगत ने इस उद्योग में अपर संभावनाएं होने और वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने पर जोर दिया। भारत का न्यूट्रास्युटिकल और आयुर्वेदिक उत्पाद बाजार तेजी से बढ़ रहा है। जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की बढ़ती घटनाओं, आयुर्वेद में गहरे भरोसे, डिजिटल पहुंच और सरकार की नीतियों में बदलाव से विकास को और मजबूती मिली है। इस क्षेत्र के 13.6 फीसदी की वार्षिक दर से बढ़कर 64.83 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि आयुर्वेदिक उत्पादों के 18.4% की और भी तेज़ गति से बढ़कर 2030 तक 22.37 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की संभावना है।
मेक इन इंडिया पहल इस सेक्टर को मजबूत बना रही है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) क्षेत्रीय निदेशक (पश्चिम क्षेत्र) प्रीति चौधरी ने भारत का न्यूट्रास्युटिकल उद्योग की वर्तमान में वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी लगभग दो फीसदी है। यूके, ईयू, यूएसए, मॉरीशस, यूएई और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख बाजारों के साथ व्यापारिक समझौते होने और अनुसंधान, मॉलिक्यूल विकास व वैज्ञानिक सत्यापन पर बढ़ते जोर के साथ, यह उद्योग अगले पांच वर्षों में वैश्विक स्तर पर प्रमुख निर्यातक बनने की राह पर है। इस क्षेत्र की दीर्घकालिक क्षमता फार्मास्यूटिकल्स से कम से कम दस गुना अधिक हो सकती है, क्योंकि स्वास्थ्य सप्लीमेंट, प्रोबायोटिक्स और प्रीबायोटिक्स के माध्यम से दैनिक निवारक स्वास्थ्य देखभाल में न्यूट्रास्युटिकल्स की बड़ी भूमिका है। भारत अपनी मजबूत फार्मा विशेषज्ञता, एफएसएसएआय के परामर्शदात्री नियामक ढांचे और गुजरात व हिमाचल प्रदेश जैसे केंद्रों में बढ़ते विनिर्माण आधार का लाभ उठा रहा है।
हेल्थ फूड्स एंड डायटरी सप्लीमेंट्स एसोसिएशन (HADSA) के महासचिव कौशिक देसाई ने कहा कि वैश्विक न्यूट्रास्युटिकल उद्योग के 2030 तक 91,900 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो कार्यात्मक खाद्य पदार्थों, आहार अनुपूरकों और व्यक्तिगत पोषण के क्षेत्र में 7 फीसदी की वार्षिक विकास दर से बढ़ रहा है। जैसे-जैसे बाजार का विस्तार हो रहा है, सुरक्षा, गुणवत्ता और नियामक अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए एफएसएसएआई और उद्योग के बीच मजबूत सहयोग महत्वपूर्ण है। साथ ही उपभोक्ता विश्वास को सुदृढ़ करने के लिए चिकित्सकीय रूप से मान्य और साक्ष्य-आधारित उत्पादों पर अधिक जोर देना आवश्यक है। टिकाऊ, प्लांट आधारित और क्लीन-लेबल समाधानों की बढ़ती मांग, ई-कॉमर्स और डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर चैनलों के विकास के साथ मिलकर नवाचार को गति दे रही है। भारत की जैव विविधता और पारंपरिक चिकित्सा विरासत वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी पेशकशों के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती है।
भारत में 2050 तक बुजुर्गों की आबादी 347 मिलियन तक पहुंच जाएगी, जिससे ऊर्जा, संज्ञान और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के लिए ‘क्लीन-लेबल’ कार्यात्मक खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ेगी। 35 फीसदी मध्यम वर्ग दैनिक वेलनेस में निवेश कर रहा है, जबकि 25-45 वर्ष के युवा सप्लीमेंट्स को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना रहे हैं। इंफॉर्मा मार्केट्स के प्रबंध निदेशक योगेश मुद्रास ने कहा कि भारत एक निर्णायक दशक में प्रवेश कर रहा है । चूंकि 2030 तक प्रति व्यक्ति खर्च करने योग्य आय लगभग 2.5 लाख रुपये तक पहुंचने का अनुमान है, उपभोक्ता सचेत रूप से निवारक स्वास्थ्य, व्यक्तिगत पोषण और रोजमर्रा की वेलनेस में निवेश कर रहे हैं। इस बदलाव को राष्ट्रीय पोषण रणनीति जैसी राष्ट्रीय पहलों और एफएसएसएआय के तहत निरंतर विकसित हो रहे नियामक इकोसिस्टम द्वारा मजबूती मिल रही है, जो जिम्मेदार उद्योग विकास के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर रहा है।
भारत सरकार ने बायोफार्मास्युटिकल उद्योग के लिए 10,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जिन्हें 2026 से 2031 तक पांच वर्षों में तैनात किया जाएगा, जो कंपनियों के लिए नवाचार और क्षमता बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। इम्यूनिटी, पोषण और वेलनेस पर बढ़ते ध्यान के कारण बाजार के अगले पांच वर्षों में कम से कम तीन गुना बढ़ने की उम्मीद है।