भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणव सेन ने असित रंजन मिश्र के साथ टेलीफोन पर हुई बातचीत में नई सीपीआई श्रृंखला पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि पीडीएस वस्तुओं को सीपीआई से बाहर रखना सही है क्योंकि मुफ्त चीजें आय नहीं, उपभोग बढ़ाती हैं। इनको शामिल करने से दोहरी गणना होगी। बातचीत के प्रमुख अंश..
यह एक जरूरी और अपेक्षित कदम है। सीपीआई बनाना आसान नहीं है। सबसे पहले, उपभोक्ता व्यय सर्वे से वस्तुओं की सूची और उनका महत्व पता चलता है। फिर, बाजार सर्वेक्षण करके हर वस्तु की सबसे ज्यादा बिकने वाली किस्मों का पता लगाया जाता है जैसे कोलगेट का 100 ग्राम का पैकेट। इतनी बारीकी मुश्किल है, लेकिन जरूरी है। ऐसे में पुरानी सूची से कुछ वस्तुएं हट सकती हैं और नई वस्तुएं शामिल हो सकती हैं, क्योंकि लोगों की आमदनी बढ़ने से खर्च करने के तरीके बदल जाते हैं। इस बार सूची पहले से बड़ी है, क्योंकि यह 12 साल बाद अपडेट हो रहा है। यह काम हर पांच साल में होना चाहिए।
मुफ्त पीडीएस वस्तुओं को बाहर रखना सही है, क्योंकि मुफ्त चीजें आय नहीं, उपभोग बढ़ाती हैं। इन्हें शामिल करने से दोहरी गिनती होगी।
हमारे पास खाद्य कीमतों में अधिक अस्थिरता रही है। इसलिए संरचनात्मक रूप से, इस नई श्रृंखला को इस अर्थ में संभालना बहुत आसान होगा कि अस्थिरता कम है। ऐसे में अनुमान लगाना आसान है।
महंगाई दर में थोड़ी वृद्धि हुई है। लेकिन यह आरबीआई की लक्षित सीमा से ऊपर नहीं गया है। अब आरबीआई एक साल आगे का अनुमान लगा सकता है, जिसके बाद ही कोई फैसला होगा। अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
पहले इस पर बड़ी बहस हुई थी। मेरा मानना था कि मुख्य सीपीआई पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि भोजन और ईंधन की कीमतें आपूर्ति पक्ष के कारकों से प्रभावित होती रही हैं न कि मांग पक्ष के कारकों से। अब मैं इसको लेकर आश्वस्त नहीं हूं।