भारत के छात्रों का विदेश में उच्च शिक्षा के लिए जाने का रुझान लगातार कम हो रहा है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, यह गिरावट पिछले तीन वर्षों में लगातार बनी हुई है।
संसद में राज्यसभा में शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत माजूमदार के लिखित जवाब में बताया गया कि 2023 में 9.08 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेश गए थे। यह संख्या 2024 में घटकर 7.7 लाख और 2025 में 6.26 लाख रह गई। तीन साल में यह करीब 31 प्रतिशत की कमी दर्शाती है।
आंकड़े बताते हैं कि महामारी के बाद छात्रों का विदेश जाने का रुझान तेजी से बढ़ा था। 2021 में लगभग 4.44 लाख छात्र विदेश गए थे, जबकि 2022 में यह संख्या बढ़कर 7.5 लाख हो गई थी।
मंत्रालय के अनुसार यह डेटा गृह मंत्रालय के प्रवासन ब्यूरो (Bureau of Immigration) से 2021 से 2025 तक की अवधि के लिए प्राप्त किया गया है।
विदेश में पढ़ाई किसी व्यक्ति की अपनी इच्छा और चुनाव पर निर्भर करती है। इसमें कई कारक अहम होते हैं, जैसे पढ़ाई की लागत, बैंक लोन की सुविधा, विदेश के समाज का अनुभव और किसी खास विषय में योग्यता। यह बात Majumdar ने कही और उन्होंने कहा कि सरकार आज के ज्ञान-आधारित युग में वैश्विक कार्यक्षेत्र की वास्तविकता को समझती है।
Majumdar ने यह भी बताया कि सफल, समृद्ध और प्रभावशाली प्रवासी भारतीय देश के लिए एक बड़ी संपत्ति माने जाते हैं। सरकार का प्रयास है कि प्रवासी भारतीयों की क्षमता का सही इस्तेमाल हो और उनका ज्ञान और अनुभव देश के विकास में काम आए।
NEP 2020 के तहत भारत में उच्च शिक्षा सुधारों पर जोर
Majumdar ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत उच्च शिक्षा के स्तर को और मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इन सुधारों में मुख्य रूप से बुनियादी ढांचे का उन्नयन, मान्यता प्रणाली को मजबूत करना, शोध और नवाचार को बढ़ावा देना तथा डिजिटल शिक्षा के विस्तार शामिल हैं।
मुख्य शिक्षा सलाहकार ने बताया कि सरकार का उद्देश्य भारत में विश्व-स्तरीय शिक्षा उपलब्ध कराना है। इसी दिशा में विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस स्थापित करने की अनुमति दी गई है। अब तक 14 विदेशी संस्थानों को इसके लिए मंजूरी दी जा चुकी है। साथ ही, पांच विदेशी विश्वविद्यालयों को गुजरात के GIFT सिटी में अपने संचालन के लिए हरी झंडी दी गई है।
भारत के छात्रों के लिए लोकप्रिय देशों में पढ़ाई की राह अब कुछ चुनौतियों से भरी नजर आ रही है। शिक्षा मंत्रालय ने हाल ही में कहा कि छात्रों के लिए देश का चुनाव व्यक्तिगत प्राथमिकता और घरेलू सुधारों पर निर्भर करता है, लेकिन 2023 से 2025 के बीच कई प्रमुख होस्ट देशों में नीति में बदलाव भी देखे गए।
कनाडा में 2024 में नई पढ़ाई परमिट्स पर रोक लगाई गई और प्राइवेट कॉलेजों व पोस्ट-ग्रेजुएट वर्क प्रोग्राम की जांच कड़ी कर दी गई। प्रांतों को छात्रों की संख्या कम करने का निर्देश दिया गया और वित्तीय प्रमाण की शर्तें बढ़ा दी गईं।
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भारतीय छात्र, जो कनाडा में सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय छात्र संख्या रखते हैं, के लिए यह बदलाव वर्क राइट्स और स्थायी निवास से जुड़े फैसलों को प्रभावित कर रहा है। प्रक्रिया में देरी और अधिक वीज़ा रिजेक्शन दर ने निवेश पर मिलने वाले लाभ (Return on Investment) पर भी असर डाला है।
विदेश में पढ़ाई: ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका में नए नियम और चुनौतियां
ऑस्ट्रेलिया:
ऑस्ट्रेलिया ने प्रवास की अनियंत्रित वृद्धि को रोकने के लिए नए कदम उठाए हैं। अब विदेशी छात्रों के लिए नामांकन पर सीमाएं लगाई जा रही हैं, अंग्रेजी भाषा की आवश्यकताएं कड़ी की गई हैं और वित्तीय दस्तावेजों की जांच बढ़ा दी गई है। इन बदलावों के चलते कुछ वीजा श्रेणियों में रिजेक्शन दर बढ़ गई है। इसके साथ ही कोर्स बदलने और काम की शर्तों पर भी सख्ती बढ़ गई है। खासकर उन परिवारों के लिए यह नियम चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं जो खर्चों को लेकर सतर्क हैं।
ब्रिटेन:
2024 से ब्रिटेन में अधिकांश अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अपने परिवार के सदस्यों को साथ लाने की अनुमति नहीं होगी, सिवाय शोध स्तर के पोस्टग्रेजुएट छात्रों के। साथ ही, वर्क वीज़ा के लिए वेतन सीमा बढ़ा दी गई है, जो पढ़ाई के बाद नौकरी की योजना पर असर डाल सकती है। हालांकि, ग्रेजुएट रूट जारी रहेगा, लेकिन प्रवासन नीति और अधिक सख्त हो गई है और राजनीतिक रूप से यह मुद्दा बन गया है।
संयुक्त राज्य अमेरिका:
अमेरिका अब भी विदेशी छात्रों के लिए प्रमुख गंतव्य बना हुआ है। लेकिन कुछ वीजा श्रेणियों में रिजेक्शन दर में वृद्धि, भारत में लंबी अपॉइंटमेंट प्रतीक्षा और H-1B वीजा सुधारों को लेकर चल रही चर्चाओं ने अनिश्चितता बढ़ा दी है।
विदेश में पढ़ाई का सपना देखने वाले छात्रों और उनके परिवारों के लिए इन बदलावों को समझना और योजना बनाना अब पहले से भी जरूरी हो गया है।