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भारत में डायबिटीज के लिए एक ही जांच पर ज्यादा निभर्रता जो​खिम भरी, विशेषज्ञों ने कहा- अलग HbA1c स्टैंडर्ड की जरूरत

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एनीमिया, हीमोग्लोबिन विकार और किडनी रोगों के ज्यादा मामलों के कारण HbA1c अकेले इस्तेमाल करने पर गलत निदान का खतरा; विशेषज्ञों ने भारत के लिए बने अलग स्टैंडर्ड

Last Updated- February 12, 2026 | 3:33 PM IST
Representational Image

भारत में डायबिटीज की पहचान और निगरानी के लिए HbA1c टेस्ट को सबसे प्रमुख जांच के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन देश में एनीमिया, हीमोग्लोबिन से जुड़ी बीमारियां और किडनी रोगों का बोझ ज्यादा होने के चलते सिर्फ HbA1c पर निर्भर रहना कई मरीजों को गलत श्रेणी में डाल सकता है। प्रमुख डॉक्टरों और डायग्नोस्टिक विशेषज्ञों ने इस पर चिंता जताई है।

HbA1c लंबे समय तक ग्लाइसेमिक (ब्लड शुगर) कंट्रोल के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले और इंटरनेशनल लेवल पर माने जाने वाले मार्कर में से एक है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि भारतीय और दक्षिण एशियाई देशों में इसकी लिमिट खास तौर पर ज्यादा हैं, जिससे इस टेस्ट के अकेले इस्तेमाल करने पर कम या ज्यादा डायग्नोसिस की चिंता बढ़ जाती है।

पुणे के सह्याद्री सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में डायबिटीज, मोटापा और मेटाबॉलिक बीमारियों के विभाग प्रमुख डॉ. संजय अग्रवाल ने कहा, “HbA1c सबसे ज्यादा स्टैंडर्डाइज्ड और रिसर्च किया गया मार्कर है। खासकर लंबे समय में माइक्रोवैस्कुलर और मैक्रोवैस्कुलर जटिलताओं का अनुमान लगाने के लिए। लेकिन यह एक परफेक्ट टेस्ट नहीं है।”

डॉ. अग्रवाल ने हाल ही में लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन का जिक्र किया, जिसे डॉ. अनुप मिश्रा, डॉ. शशांक जोशी और अन्य विशेषज्ञों ने लिखा है। इसमें बताया गया है कि आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया, हीमोग्लोबिनोपैथी, क्रॉनिक किडनी डिजीज और टेस्ट स्टैंडर्डाइजेशन की कमी HbA1c की वैल्यू को काफी प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि HbA1c छोटी अवधि के ग्लूकोज उतार-चढ़ाव को भी नहीं पकड़ पाता, इसलिए इसे अकेला डायग्नोस्टिक टेस्ट मानना पर्याप्त नहीं है।

उन्होंने कहा, “कोई एक टेस्ट किसी व्यक्ति की पूरी ग्लाइसेमिक स्थिति नहीं बता सकता। क्लिनिकल प्रैक्टिस में HbA1c, ग्लूकोज मॉनिटरिंग और जरूरत पड़ने पर ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (OGTT) को साथ में इस्तेमाल किया जाता है, ताकि ज्यादा सही आकलन हो सके।”

भारत के लिए अलग HbA1c स्टैंडर्ड की मांग

मुंबई के एस.एल. रहेजा हॉस्पिटल के मानद डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. अनिल भोरासकर ने कहा कि भारत को पश्चिमी देशों के कट-ऑफ पर निर्भर रहने के बजाय अपने HbA1c रेफरेंस स्टैंडर्ड बनाने चाहिए।

उन्होंने कहा, “हमें भारत के बड़े स्तर के अध्ययन से निकले HbA1c मान चाहिए, जिसमें 20,000–25,000 मरीजों को शामिल किया जाए और अलग-अलग हीमोग्लोबिन प्रोफाइल देखे जाएं। HbA1c पर टेस्ट किट, एनीमिया और आयरन की गड़बड़ी का असर पड़ता है, जिससे इसकी व्याख्या मुश्किल हो जाती है।”

डॉ. भोरासकर ने कहा कि वे कई मरीजों में HbA1c पर भरोसा नहीं करते, सिवाय कुछ खास स्थितियों जैसे गर्भावस्था या कुछ चुनिंदा क्लिनिकल कंडीशन के। उन्होंने यह भी कहा कि ग्लूकोज-6-फॉस्फेट डीहाइड्रोजनेज (G6PD) डिफिशिएंसी वाले मरीजों में HbA1c का उपयोग सावधानी से होना चाहिए, क्योंकि यह कुछ आबादी में आम है और HbA1c रीडिंग बिगाड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि जो मरीज नियमित रूप से ग्लूकोमीटर से शुगर चेक करते हैं, उनके रोज के रीडिंग्स का कुछ हफ्तों का औसत HbA1c जैसी जानकारी दे सकता है।

मल्टी-पैरामीटर मॉडल की जरूरत

डॉक्टरों ने जोर देकर कहा कि डायबिटीज सिर्फ ब्लड शुगर का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर को प्रभावित करने वाली बीमारी है। डॉ. भोरासकर ने कहा कि जांच में किडनी फंक्शन टेस्ट, लिपिड प्रोफाइल, ब्लड प्रेशर, मोटापे के मापदंड, ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया की स्क्रीनिंग, हृदय जांच और न्यूरोलॉजिकल आकलन भी शामिल होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि डायबिटीज दिल और किडनी से लेकर नसों और दिमाग तक लगभग हर अंग को प्रभावित करती है। इसलिए मल्टी-पैरामीटर जांच जरूरी है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि कुछ स्थितियों में, जैसे जटिल आंखों की सर्जरी, HbA1c का सख्त टारगेट अभी भी जरूरी होता है।

क्या कहते हैं डायग्नोस्टिक विशेषज्ञ

डायग्नोस्टिक्स क्षेत्र से जुड़े एवं न्यूबर्ग डायग्नोस्टिक्स के चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. सुजय एस. प्रसाद ने कहा कि लंबे समय से क्लिनिकल प्रैक्टिस में एक HbA1c वैल्यू के आधार पर डायबिटीज का इलाज शुरू कर दिया जाता रहा है, लेकिन अब धीरे-धीरे यह तरीका बदल रहा है।

उन्होंने कहा कि लाइफस्टाइल और डाइट में बदलाव से हाई ब्लड शुगर को डायबिटीज बनने से पहले ही नियंत्रित या उलटा भी किया जा सकता है। दिन के अलग-अलग समय पर और लंबे समय तक शुगर स्तर की निगरानी अक्सर ज्यादा भरोसेमंद तस्वीर देती है।

डॉ. प्रसाद ने माना कि आयरन की कमी या G6PD डिफिशिएंसी के कारण HbA1c के झूठे कम या ज्यादा होने की जानकारी मौजूद है, लेकिन रोजमर्रा की जांच में इन बातों को हमेशा ध्यान में नहीं रखा जाता। इससे अंडर-डायग्नोसिस या गलत इलाज का खतरा बढ़ सकता है।

भारत में अनुमान है कि 14–15 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज या बिना पहचानी हुई हाइपरग्लाइसीमिया से प्रभावित हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय दिशानिर्देशों को अब ज्यादा व्यापक और मल्टी-पैरामीटर ढांचे की ओर बढ़ना पड़ सकता है।

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि HbA1c एक अहम टूल है, लेकिन इसे क्लिनिकल जांच और अन्य टेस्ट के साथ मिलाकर ही समझना चाहिए। सिर्फ एक नंबर पर निर्भर रहना भारतीय आबादी में डायबिटीज की जटिलता को नहीं दिखाता।

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First Published - February 12, 2026 | 3:08 PM IST

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