हवा में प्रदूषण से मौत होती है या नहीं? ये सवाल अगर पूछा जाए तो सरकारी विभागों के अलग-अलग जवाब मिलेंगे। दिल्ली-NCR में रविवार को एयर क्वालिटी इंडेक्स 320 के पार पहुंच गया, जो ‘बहुत खराब’ कैटेगरी में आता है। लेकिन ठीक इसके बीच, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MOEFCC) ने गुरुवार को संसद में कहा कि वायु प्रदूषण से सिर्फ मौतों का कोई पक्का डाटा नहीं है। ये बात मंत्रालय ने 2024, 2025 में भी कही थी और अब 2026 में भी दोहराई है। पर स्वास्थ्य मंत्रालय की रिसर्च विंग इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के मुताबिक, सिर्फ 2017 में भारत में 12.4 लाख मौतें प्रदूषित हवा से हुईं थीं। ये आंकड़े लैंसेट जर्नल की एक बड़ी स्टडी से लिए गए हैं।
तो फिर ये विरोधाभास क्यों है? एक तरफ पर्यावरण मंत्रालय कह रही है कि प्रदूषण से मौतों का सीधा लिंक साबित नहीं, दूसरी तरफ हेल्थ रिसर्चर्स लाखों मौतों का हवाला दे रहे हैं। दिल्ली जैसे शहरों में सांस की बीमारियां और दिल की दिक्कतें बढ़ रही हैं, लेकिन प्रदूषण को दोष देने पर बहस जारी है। आइए देखते हैं कि क्या कहते हैं फैक्ट्स और दोनों पक्षों की दलीलें।
MOEFCC ने राज्यसभा में पूछे गए सवाल पर जवाब दिया कि देश में ऐसा कोई ठोस डेटा नहीं जो ये साबित करे कि मौतें सिर्फ वायु प्रदूषण की वजह से हो रही हैं। मंत्रालय ने नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत हुए सुधारों पर जोर दिया। उनके मुताबिक, 2017-18 से कई शहरों में PM10 लेवल कम हुए हैं। PM10 वो बड़े पार्टिकल्स होते हैं जो हवा में घुले रहते हैं। मंत्रालय का कहना है कि कुछ शहर अब नेशनल एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स पर खरे उतर रहे हैं।
ये बात मंत्रालय ने पहले भी कही थी। 2024 में भी यही जवाब दिया, 2025 में भी। दिल्ली जैसे शहरों में सांस और दिल की बीमारियों से मौतें बढ़ रही हैं, लेकिन मंत्रालय का फोकस सुधारों पर है। वो कहते हैं कि प्रदूषण कम हो रहा है, तो समस्या भी कम होनी चाहिए। लेकिन क्या वाकई ऐसा है?
दिल्ली में रविवार को AQI 321 पहुंच गया, जो बताता है कि हवा अभी भी सेहत के लिए खतरनाक है। NCAP के तहत काम चल रहा है, लेकिन क्या ये मौतों को रोक पा रहा है? मंत्रालय का जोर इस बात पर है कि मौतों का ‘एक्सक्लूसिव’ कारण प्रदूषण साबित नहीं हो सकता। मतलब, डेथ सर्टिफिकेट पर सिर्फ प्रदूषण लिखा हो, ऐसा कोई केस नहीं।
Also Read: उत्तर भारत में वायु प्रदूषण: मानव जनित संकट, अस्थायी उपायों से आगे स्थायी नीति की जरूरत
ICMR ने एक RTI के जवाब में साफ कहा कि 2017 में भारत में कुल मौतों का 12.5 फीसदी, यानी 12.4 लाख मौतें, वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं। ये आंकड़े सिर्फ अनुमान नहीं, बल्कि मॉडलिंग बेस्ड रिसर्च से आए हैं। ICMR ने पब्लिक स्वास्थ्य फाउंडेशन ऑफ इंडिया (PHFI) और इंस्टीट्यूट फॉर स्वास्थ्य मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (IHME) के साथ मिलकर ये स्टडी की थी। ये ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (GBD) 2017 का हिस्सा था, जो लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ जर्नल में 2018 में छपा।
स्टडी में पाया गया कि हवा में घुले पार्टिकल्स और घरों में सॉलिड फ्यूल से निकलने वाली गंदगी से इतनी मौतें हुईं। इनमें से आधी से ज्यादा मौतें 70 साल से कम उम्र के लोगों की थीं। मतलब, प्रदूषण लोगों की जिंदगी समय से पहले छीन रहा है। स्टडी के मुताबिक, अगर प्रदूषण का लेवल मिनिमम थ्रेशोल्ड से नीचे होता, तो औसत लाइफ एक्सपेक्टेंसी 1.7 साल ज्यादा होती। उत्तर भारत के राज्यों में ये फायदा दो साल से ज्यादा का हो सकता था। प्रदूषण दिल की बीमारियों, स्ट्रोक, फेफड़ों की दिक्कतों, डायबिटीज और लंग कैंसर से जुड़ा है। स्टडी कहती है कि प्रदूषण का असर भारत में बीमारियों पर तंबाकू से भी ज्यादा है।
ये रिसर्च मॉडलिंग पर बेस्ड है, जो एक्सपोजर और रिस्क को कैलकुलेट करती है। मतलब, PM2.5 जैसे महीन पार्टिकल्स से कितना खतरा बढ़ता है, ये देखा जाता है। ICMR का कहना है कि ये तरीका दुनिया भर में मान्य है और पॉलिसी बनाने में इस्तेमाल होता है। MOEFCC की तरह ‘एक्सक्लूसिव’ कारण की मांग करना गलत है, क्योंकि पब्लिक हेल्थ में मौतें कई फैक्टर्स से होती हैं।
दिल्ली में सांस की बीमारियों से मौतें लगातार बढ़ रही हैं। दिल्ली सरकार के डायरेक्टोरेट ऑफ इकोनॉमिक्स एंड स्टेटिस्टिक्स के आंकड़ों से पता चलता है कि 2022 में 7432 मौतें हुईं, जो 2024 में बढ़कर 9211 हो गईं। दिल की बीमारियां तो टॉप किलर हैं, 2024 में 21 हजार से ज्यादा मौतें। GBD स्टडी इन बीमारियों को प्रदूषण से जोड़ती है। लंबे समय तक प्रदूषण में सांस लेने से फेफड़े खराब होते हैं, धमनियां सख्त हो जाती हैं।
NCAP के तहत PM10 लेवल कम हुए हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स कहते हैं कि ये सुधार तुरंत मौतों पर असर नहीं डालते। क्रॉनिक बीमारियां सालों में बनती हैं। साथ ही, PM10 से ज्यादा खतरनाक PM2.5 है, जो दिल और फेफड़ों को ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। स्टडी बताती है कि 2017 में 77 फीसदी भारतीय नेशनल सेफ्टी लिमिट्स से ऊपर प्रदूषण में सांस ले रहे थे। मतलब, छोटे-मोटे सुधार से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, जब तक बड़े बदलाव न हों।
ये बहस इसलिए जरूरी है क्योंकि दो मंत्रालय ज अलग-अलग स्टैंड से पॉलिसीमेकर्स, कोर्ट और आम लोगों को मुश्किल में डाल रहे हैं। एक कहता है कि मौतें साबित नहीं, दूसरा लाखों का आंकड़ा देता है। प्रदूषण धीरे-धीरे असर करता है, लेकिन लगातार जिंदगियां छोटी कर रहा है। क्या NCAP जैसे प्रोग्राम सिर्फ कंप्लायंस के लिए हैं या सेहत बचाने के लिए? ये सवाल बना हुआ है। दिल्ली जैसे शहरों में हर सर्दी में हवा जहरीली हो जाती है, और मौतों के आंकड़े बढ़ते जाते हैं। रिसर्चर्स कहते हैं कि सबूत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, वरना समस्या और गंभीर हो जाएगी।