भारत में अपशिष्ट जल और सोलर रीसाइक्लिंग के क्षेत्र में बड़े आर्थिक अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके साथ ही इस क्षेत्र में रोजगार की भी अपार संभावनाएं हैं। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) ने सस्टेना इंडिया कला प्रदर्शनी के तीसरे संस्करण के दौरान आयोजित कार्यशाला में जल और सौर क्षेत्रों में सर्कुलर इकोनॉमी की बड़ी संभावनाओं को रेखांकित किया। CEEW के अनुसार, शोधित अपशिष्ट जल के दोबारा उपयोग और सोलर रीसाइक्लिंग मिलकर आने वाले दशकों में विशाल आर्थिक अवसर पैदा कर सकते हैं।
CEEW के फेलो नितिन बस्सी के मुताबिक, भारत में शोधित जल यानी Treated Used Water (TUW) की अर्थव्यवस्था 2047 तक 3.04 लाख करोड़ रुपये (35 अरब डॉलर) का अवसर पैदा कर सकती है। इसमें 72,597 करोड़ रुपये का संभावित वार्षिक बाजार राजस्व और 1.56–2.31 लाख करोड़ रुपये का बुनियादी ढांचा निवेश शामिल है। अध्ययन के अनुसार सही वित्तपोषण और नीतिगत समर्थन मिलने पर 2047 तक 31,265 मिलियन घन मीटर शोधित जल का पुन: उपयोग संभव है, जो औद्योगिक और सिंचाई की बड़ी मांग पूरी कर सकता है। फिलहाल देश केवल 28% अपशिष्ट जल का ही उपचार कर पाता है और 80% से अधिक शहरों में उपचारित जल का पुन: उपयोग नहीं हो रहा है।
सीईईडब्ल्यू के अध्ययन के अनुसार, उपचारित जल के दोबारा इस्तेमाल को बढ़ावा देने से 2047 तक देश भर में 1 लाख से अधिक नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं। बस्सी ने कहा कि न केवल वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट चलाने के लिए 1 लाख प्रत्यक्ष नौकरियां सृजित होंगी, बल्कि निर्माण और तकनीक सेवा क्षेत्र में भी रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। सीईईडब्ल्यू अध्ययन बताता है कि कैसे भारतीय शहरों में ‘सर्कुलर निवेश’ पहले से ही बेहतर नतीजे सामने आ रहे हैं। उदाहरण के लिए, वर्तमान में सूरत उद्योगों को 36 रुपये प्रति किलोलीटर की दर से उपचारित जल की आपूर्ति कर रहा है, जो ताजे पानी की दरों से थोड़ा कम है। इससे शहर को 2014 और 2021 के बीच 230 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त करने में मदद मिली।
CEEW के अनुसार, भारत में सौर क्षमता बढ़ने के साथ 2030 तक सोलर कचरा 3.40 लाख टन तक पहुंच सकता है। CEEW में प्रोग्राम लीड डॉ. आकांक्षा त्यागी ने बताया कि 2030 तक 3.40 लाख टन सोलर कचरे में से लगभग 10,000 टन सिलिकॉन, 12-18 टन चांदी और 16 टन कैडमियम व टेल्यूरियम जैसे महत्वपूर्ण खनिज शामिल होंगे, जो भारत के लिए बेहद जरूरी हैं। यह भारत के लिए सौर ऊर्जा क्षेत्र में ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ का वैश्विक केंद्र बनने और अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने का एक बड़ा अवसर देता है।
सीईईडब्ल्यू के अध्ययन के अनुसार, पुराने सोलर पैनलों से कीमती खनिजों को निकालकर उन्हें दोबारा इस्तेमाल करने का बाजार 2047 तक 3,700 करोड़ रुपये का हो सकता है। यदि इस क्षमता का सही इस्तेमाल किया जाए, तो रीसाइक्लिंग से निकलने वाला सिलिकॉन, तांबा, अल्यूमीनियम और चांदी 2047 तक सौर क्षेत्र की विनिर्माण जरूरतों का 38 प्रतिशत हिस्सा पूरा कर सकते हैं। साथ ही, नए संसाधनों की जगह पर रीसायकल किए गए खनिजों के इस्तेमाल से 3.7 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन रोका जा सकता है।
अध्ययन में यह भी कहा गया है कि फिलहाल औपचारिक रूप से सोलर रीसाइक्लिंग करना मुश्किल काम है, रीसाइक्लिंग करने वालों को प्रति टन 10,000 से 12,000 रुपये का नुकसान हो रहा है। सबसे बड़ा खर्च पुराने सोलर पैनलों को वापस खरीदना है (लगभग 600 रुपये प्रति पैनल), यह कुल खर्च का दो-तिहाई हिस्सा है। रीसाइक्लिंग को फायदेमंद बनाने के लिए या तो पुराने पैनल की कीमत 330 रुपये से कम होनी चाहिए, या फिर सरकार को EPR (एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी) सर्टिफिकेट, टैक्स छूट और तकनीक में निवेश के जरिए इनको प्रोत्साहन देना चाहिए।