सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को जाइडस लाइफसाइंसेज को कैंसर दवा निवोलुमैब के बायोसिमिलर वर्सन के निर्माण और बिक्री से रोकने से मना कर दिया। निवोलुमैब को अमेरिका की ब्रिस्टल मायर्स स्किब (बीएमएस) दुनिया भर में ओपडिवो ब्रांड के तहत बेचती है।
साथ ही, न्यायालय ने बीएमएस से कहा कि वह जाइडस के उत्पाद की उसके पेटेंट दावों के बारे में डिटेल में मैपिंग करे और उस काम के नतीजे के आधार पर दिल्ली हाई कोर्ट में अंतरिम राहत मांगे।
जब दिल्ली हाई कोर्ट ने 12 जनवरी के एक आदेश में अहमदाबाद मुख्यालय वाली दवा निर्माता कंपनी (जाइडस) को निवोलुमैब के अपने वर्जन को कमर्शियलाइज करने की अनुमति दी थी, उसके बाद बीएमएस ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था। बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी ने आरोप लगाया है कि जाइडस का उत्पाद उसके पेटेंट अधिकारों का उल्लंघन करता है।
हालांकि, जाइडस का कहना है कि उसका बायोसिमिलर इनोवेटर प्रोडक्ट की तुलना में इलाज की लागत लगभग 70 फीसदी कम कर देगा और तर्क दिया कि उसका फॉर्मूलेशन बीएमएस के पेटेंट का उल्लंघन नहीं करता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने जाइडस पर रोक लगाने से इनकार करते हुए विवाद के जनहित पहलू पर जोर दिया।
जिस दवा की बात हो रही है, वह जान बचाने वाली है, इसे ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने कहा था कि जहां मामले मुश्किल हैं और जिनके लिए पूरे ट्रायल की जरूरत है, वहां कोर्ट को जरूरी इलाज तक पहुंच रोकने के नतीजों पर विचार करना चाहिए। उसने चेतावनी दी कि मरीजों को ऐसा इलाज न देने से गंभीर और ऐसा नुकसान हो सकता है जिसे ठीक न किया जा सके।
सर्वोच्च न्यायालय ने बीएमएस के पेटेंट की शेष सीमित अवधि को भी ध्यान में रखा, जो 2 मई को समाप्त हो रही है।