नीति आयोग द्वारा इस सप्ताह प्रकाशित नए शोध से देश की दीर्घकालिक जलवायु रणनीति केंद्र में आ गई है। यह 2047 तक विकसित भारत बनाने के रास्ते बताती है और देश को 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य तक ले जाने की राह पर भी रखती है। अनुमान है कि मौजूदा नीतियों में भारत को 2070 तक 14.7 लाख करोड़ डॉलर का कुल निवेश करना होगा और नेट जीरो के लिए निवेश 22.7 लाख करोड़ डॉलर होगा। इसका मतलब है कि आने वाले दशकों में हर साल औसतन 500 अरब डॉलर निवेश करना होगा।
मगर जलवायु में इस समय सालाना 135 अरब डॉलर निवेश ही हो रहा है, जिस कारण बड़ा अंतर लगातार बना हुआ है। अध्ययन के मुताबिक घरेलू पूंजी निर्माण के आशावादी अनुमान होने पर भी भारत 2070 तक 16.2 लाख करोड़ डॉलर ही जुटा पाएगा। इसके बाद भी लगभग 6.5 लाख करोड़ डॉलर की कमी रहेगी, जिसे मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय पूंजी, रियायती कर्ज और अनुदानों से पूरा करना होगा।
इसमें चुनौतियां बुनियादी और कई तहों वाली हैं। देश की जलवायु में बदलाव की राह में पूंजी की ऊंची लागत और दीर्घकालिक रियायती कर्ज एवं अनुदान की कम उपलब्धता आड़े आ रही है। इस कारण खास तौर पर ऊर्जा भंडारण, हरित हाइड्रोजन और औद्योगिक डीकार्बनाइजेशन जैसे अधिक पूंजी खपत वाले क्षेत्रों में परियोजना की व्यावहारिकता घट जाती है।
बढ़ते संरक्षणवाद, भू-राजनीतिक तनाव, बदलती वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और बिखरे हुए नीतिगत ढांचे से उपजी वैश्विक अनिश्चितताएं भी चिंता को बढ़ाती हैं। राज्यों और क्षेत्रों में परियोजनाओं की कम और असमान आपूर्ति भी बताती है कि परियोजना तैयार करने और उसे अमल में लाने में कितना अंतर है। क्षेत्रों की तैयारी भी अलग-अलग है। नवीकरणीय ऊर्जा तेजी से बढ़ी है मगर ग्रिड विस्तार, भंडारण क्षमता और स्वच्छ औद्योगिक तकनीकों में प्रगति धीमी रही है। रिपोर्टों ने तीव्र शहरीकरण, संसाधनों की कमी और कुशल मानव पूंजी की बढ़ती मांग को भी रेखांकित किया है, जिस कारण हरित ऊर्जा की ओर सफर जारी रखने में मजबूत बुनियादी ढांचे, हरित तकनीकों तथा श्रमबल में लक्षित निवेश की जरूरत सामने आती है।
वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में भी ऐसी कई चिंताएं दी गई हैं। इसमें कहा गया है कि भारत में जलवायु के लिए कर्ज एवं सहायता सौर और पवन जैसे उन क्षेत्रों को ज्यादा मिल रहे हैं, जो पहले से तैयार हो चुके हैं। उनके उलट अनुकूलन, शहरी बुनियादी ढांचे, एमएसएमई ऋण तथा कठिनाई से घटाए जाने वाले उद्योगों को पर्याप्त रकम नहीं मिल रही। सर्वेक्षण में यह भी बताया गया कि भारत में जलवायु के लिए ज्यादातर धन देसी स्रोतों से आ रहा है। फिलहाल जलवायु को खतरे कम करने वाले उद्योगों को 83 प्रतिशत धन और अनुकूलन उद्योगों को 98 प्रतिशत धन घरेलू स्रोतों से ही मिलता है।
इसलिए नीति आयोग के अध्ययन ने संस्थागत और वित्तीय सुधार पर विशेष जोर दिया है। नीतिगत पहलू की बात करें तो यह मांग पक्ष के उपायों को अहम बताता है जैसे ऊर्जा दक्षता, व्यवहार में बदलाव और सामग्री का रूप बदलकर बार-बार काम आते रहना। इसमें मिशन लाइफ जैसी पहलें शामिल हैं, जो कम खर्च में उत्सर्जन घटा सकती हैं।
धन उपलब्ध कराने की बात करें तो अध्ययन में राष्ट्रीय हरित वित्त संस्थान बनाने की सिफारिश है, जो धन जुटाए और मुहैया कराए, जोखिम घटाए और उधारी की लागत भी कम करे। अन्य सुझावों में मिश्रित वित्त सुविधाओं का विस्तार, एकीकृत जलवायु वित्त वर्गीकरण अपनाना और कॉरपोर्ट एवं ग्रीन बॉन्ड बाजार को गहराई देना शामिल हैं। इस प्रकार भारत की नेट जीरो महत्त्वाकांक्षा के लिए विश्वसनीय वित्तीय ढांचा और संस्थागत सुधार आवश्यक हैं। कुल मिलाकर भारत को अपने जलवायु लक्ष्यों के करीब पहुंचने के लिए कई क्षेत्रों में दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है।