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पक्षी क्षेत्र में अक्षय ऊर्जा संयंत्रों को मिली राहत

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उच्चतम न्यायालय ने अप्रैल 2021 में गुजरात और राजस्थान की राज्य सरकारों को आदेश दिया था कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़ी बिजली पारेषण लाइनें भूमिगत होनी चाहिए।

Last Updated- March 25, 2024 | 12:00 AM IST
Renewable Energy

राजस्थान और गुजरात में विलुप्तप्राय पक्षी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (जीआईबी) के निवास वाले क्षेत्र में काम करने को इच्छुक सौर व पवन ऊर्जा उत्पादकों को आखिरकार कुछ छूट मिल गई है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने 2021 के आदेश में संशोधन करते हुए हरित ऊर्जा उद्योग को करीब 80,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है।

इस क्षेत्र की प्रमुख कंपनियां एनटीपीसी, अदाणी ग्रीन, एक्मे, रीन्यू आदि करीब 60 गीगावॉट क्षमता के अक्षय ऊर्जा संयंत्र लगा सकेंगी। इन कंपनियों को न्यायालय के फैसले से फायदा होगा।

शीर्ष न्यायालय ने इन परियोजनाओं के लिए अनिवार्य रूप से भूमिगत केबल बिछाने के अपने पहले के आदेश में ढील देते हुए नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग के लिए संभावित क्षेत्र को खोल दिया है।

उच्चतम न्यायालय ने अप्रैल 2021 में गुजरात और राजस्थान की राज्य सरकारों को आदेश दिया था कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़ी बिजली पारेषण लाइनें भूमिगत होनी चाहिए। न्यायालय ने कहा था कि जीआईबी की प्रमुखता वाले आवास क्षेत्र में किसी भी तरह का निर्माण नहीं हो सकता है।

जीआईबी की प्रमुखता वाला क्षेत्र राजस्थान में13,000 वर्ग किलोमीटर और गुजरात में 477 वर्ग किलोमीटर है। संभावित क्षेत्र राजस्थान में 78,500 वर्ग किलोमीटर और गुजरात में 2,108 वर्ग किलोमीटर है। भारत में सौर ऊर्जा की संभावना वाले प्रमुख राज्यों में ये 2 राज्य शामिल हैं।

पूर्व अधिकारी और कार्बेट फाउंडेशन से जुड़े एमके रंजीत सिंह, राजस्थान के वन्यजीव प्रेमी पीराराम विश्नोई, गुजरात के पक्षी प्रेमी नवीनभाई बापट, कर्नाटक के वन्य जीव विशेषज्ञ संतोष मार्टिन की एक याचिका पर सुनवाई के बाद शीर्ष न्यायालय की प्रतिक्रिया आई है।

याचिका में याचियों ने अनुरोध किया था कि जीआईबी विलुप्तप्राय पक्षी है, ऐसे में इनके संरक्षण की कवायद की जानी चाहिए और इस इलाके की पारेषण लाइनें भूमिगत होनी चाहिए, न कि ऊपर खंभों पर। जीआईबी आंशिक रूप से दृष्टिहीन होती हैं और कम ऊंचाई पर उड़ती हैं ऐसे में ये पक्षी पारेषण लाइनों से टकराकर खत्म हो सकती हैं।

एमएनआरई की ओर से कराए गए एक अध्ययन और भारतीय वन्य जीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) सहित कुछ अन्य एजेंसियों के मुताबिक 1966 में जीआईबी की आबादी 1,000 (शुरुआती उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार) थी और 2014 में इनकी संख्या घटकर 200 रह गई। इन दो राज्यों में इनकी आबादी करीब 50 से 100 है। विभिन्न स्वतंत्र अनुमानों के मुताबिक इसमें जीआईबी के आवास के कुछ इलाके पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में हैं।

बाद में, 2021 में केंद्र सरकार, राजस्थान राज्य सरकार और सौर व पवन ऊर्जा क्षेत्र में काम करने वाले कई अन्य हिस्सेदार उच्चतम न्यायालय पहुंचे और उन्होंने उस आदेश में संशोधन करके राहत देने की मांग की, जिसकी वजह से जीआईबी के आवास वाले क्षेत्र में परियोजना स्थापित करने से व्यवधान आ रहा था। उद्योग ने न्यायालय से कहा कि अगर भूमिगत पारेषण लाइनें बिछाई जाती हैं तो पवन और सौर ऊर्जा की कीमत दोगुनी हो जाएगी। मंत्रालय ने अनुमान लगाया है कि भूमिगत पारेषण लाइन बिछाने से परियोजना डेवलपरों पर 1.5 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

न्यायालय ने इस सप्ताह अपनी टिप्पणियों में कहा कि हरित ऊर्जा परियोजनाओं के लिए जमीन के ऊपर पारेषण लाइनों की अनुमति देने की तुलना में कोयले से बिजली उत्पादन में देश को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है। न्यायालय ने संभावित क्षेत्रों को खोल दिया है, वहीं जीआईबी की प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में भूमिगत केबल बिछाने का आदेश लागू रहेगा।

न्यायालय ने केंद्र को यह भी निर्देश दिया है कि वह 5 सदस्यों की एक समिति बनाए। यह समिति जीआईबी के आवास क्षेत्र के संभावित इलाकों का आकलन करेगी। न्यायालय ने केंद्र को यह भी आदेश दिया है कि जीआईबी के संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं।

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First Published - March 24, 2024 | 11:39 PM IST

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