facebookmetapixel
Advertisement
पाबंदियों में आं​शिक ढील से फिसला रुपया, डेरिवेटिव ट्रेड ने बदली चालकोविड के बाद सबसे तेज रिकवरी: बाजार में V-शेप रैली, सेंसेक्स-निफ्टी 6 हफ्तों के हाई परओबेरॉय रियल्टी की बड़ी छलांग: Q4 में बुकिंग में 96% का भारी उछाल, एक साल में आंकड़ा हुआ दोगुनाPharma Sector: चौथी तिमाही में बनी रहेगी राजस्व की रफ्तार, पर मुनाफे पर मंडरा रहे संकट के बादलबीमा शेयरों में गिरावट, बैंकिंग-बीमा साझेदारी पर सरकार के बयान से दबावमूडीज ने भारत का GDP अनुमान 6.8% से घटाकर 6% किया, पश्चिम एशिया युद्ध को बताया बड़ी वजहStock Market: बैंकिंग शेयरों की रैली से बाजार में तेजी, सेंसेक्स-निफ्टी 6 हफ्तों के हाई परअगले दो साल में इंफ्रा सेक्टर में 50% तक बढ़ेगा निवेश, ₹24 लाख करोड़ तक पहुंचेगा आंकड़ा: क्रिसिलभारत को झटका: संयुक्त राष्ट्र ने घटाया FY26 का ग्रोथ रेट, 6.4% रह सकती है देश की विकास दरपश्चिम एशिया संकट का असर: 13 साल के निचले स्तर पर पहुंचा उर्वरक उत्पादन, खेती को झटका

‘उपयोगी ज्ञान’ के जरिए विकसित भारत: ऐसी संस्कृति बनाना जो ज्ञान का सम्मान करे

Advertisement

भारत पिछले 75 वर्षों की धीमी गति से आगे बढ़कर सरपट दौड़ने वाला देश कैसे बन सकता है? वह मोकिर के ‘उपयोगी ज्ञान’ का इस्तेमाल करके ऐसा कर सकता है

Last Updated- October 29, 2025 | 9:42 PM IST
Knowledge
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

कुछ दिनों पहले जोएल मोकिर, फिलिप एगियों और पीटर हॉविट को अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया। मोकिर की दलील है कि समाज तब फलते-फूलते हैं जब वे उपयोगी ज्ञान का पोषण करते हैं, उसका विकास करते हैं और उसे प्रसारित करते हैं। एगियों और हॉविट ने समझाया कि कैसे ज्ञान तब अत्यधिक उत्पादक हो सकता है जब वह प्रतिस्पर्धा, विनाश और पुनरुत्पादन को उन्मुक्त करता है। वे मिलकर यह स्पष्ट करते हैं कि कुछ देश लंबे समय तक विकास क्यों करते रहते हैं।

क्या भारत मोकिर द्वारा दिए गए आर्थिक प्रगति के खाके से कुछ सीख सकता है? भारतीय नीति निर्माताओं के पास आर्थिक खाकों की कमी नहीं है। इसके बावजूद हमारी प्रति व्यक्ति आय पूर्वी एशियाई देशों की तुलना में बहुत कम रही है। आर्थिक प्रगति को कई तरीकों से मापा जा सकता है लेकिन कुल मिलाकर भारत अपनी संभावनाओं की तुलना में बहुत कम गति से बढ़ रहा है। हमारी ढेर सारी प्रगति दो सुखद घटनाओं की बदौलत रही है।

एक देश का सॉफ्टवेयर उद्योग और दूसरा अनिवासी भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि। दशकों के अनियोजित कामों के परिणामस्वरूप एक मिलीजुली तस्वीर सामने आई। कुछ क्षेत्रों में उत्कृष्टता और एक समृद्ध मध्य वर्ग है लेकिन इसके साथ ही आम जनता में शिक्षा की कमी, बेरोजगारी है और 80 करोड़ लोग सरकारी मदद पर निर्भर हैं।

भारत पिछले 75 वर्षों की धीमी गति से आगे बढ़कर सरपट दौड़ने वाला देश कैसे बन सकता है? वह मोकिर के ‘उपयोगी ज्ञान’ का इस्तेमाल करके ऐसा कर सकता है। यानी, समाज के उत्पादन, संपर्क और नए विचारों की मदद से आर्थिक प्रगति हासिल कर सकता है। उनका कहना है कि 18वीं सदी में यूरोप का बदलाव तीन अंतर्संबंधित संस्थानों पर केंद्रित थी- प्रस्तावनात्मक ज्ञान (विज्ञान और सिद्धांत) का निर्माण, उसका तकनीक और अभियांत्रिकी में रूपांतरण और एक ऐसा नेटवर्क जो इन दोनों के बीच विचारों के मुक्त प्रवाह को संभव बनाता है।

आधुनिक चीन ने असाधारण गति से इसका अपना संस्करण तैयार किया है। उसका शोध एवं विकास व्यय उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.5 फीसदी से अधिक है, उसकी पेटेंट फाइलिंग का आंकड़ा किसी भी अन्य देश से अधिक है और उसके विश्वविद्यालयों से हर वर्ष हजारों की तादाद में इंजीनियर और वैज्ञानिक निकलते हैं। इन आंकड़ों के पीछे कुछ गहरी चीजें हैं: एक सघन नेटवर्क जो शोध संस्थानों और आपूर्ति श्रृंखलाओं के औद्योगिक क्लस्टर को जोड़ता है। यह व्यवस्था उस उदार और खुले मॉडल से काफी अलग है जिसकी सराहना मोकिर ने अपने कामों में की है।

बावजूद इसके यह उसी तरह काम करती है यानी लगातार उपयोगी ज्ञान का सृजन और उपयोग। उदाहरण के लिए यह बात लगभग सभी जानते हैं कि चीन की उड़ने वाली कारें अब संचालित होने ही वाली हैं और ड्रोन से सामान की आपूर्ति एकदम सामान्य होती जा रही हैं। एक बात जो कम लोग जानते हैं वह यह है कि अकेले इस वर्ष वहां के छह विश्वविद्यालयों ने ‘निम्न-उन्नतांश प्रौद्योगिकी और अभियांत्रिकी’ में डिग्री पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। साथ ही, एक पूर्ण और सघन आपूर्ति श्रृंखला भी अस्तित्व में आ रही है, जो इस उप-क्षेत्र को तेजी से विस्तार करने में मदद करेगी।

भारत का वैज्ञानिक अभिजात वर्ग विश्वस्तरीय है, फिर भी प्रयोगशाला और फैक्ट्री के बीच की कड़ी अब भी कमजोर बनी हुई है। देश अपने जीडीपी का केवल 0.7 फीसदी शोध एवं विकास पर खर्च करता है जो चीन की तुलना में एक तिहाई है। इसका अधिकांश हिस्सा सरकारी क्षेत्र से आता है। भारतीय विश्वविद्यालय शिक्षण में मजबूत हैं लेकिन शोध में कमजोर हैं और उद्योग जगत तकनीक को आयातित करने को प्राथमिकता देता है बजाय कि उसे अपनाने या विकसित करने के।

इसका परिणाम एक ऐसी अर्थव्यवस्था के रूप में सामने आता है जो मानव संसाधन के मामले में तो समृद्ध है लेकिन तकनीकी क्षमता में नहीं। अगर भारत में मोकिर के खाके को अपनाया जाता है तो इसका अर्थ यह मानना होगा कि आर्थिक वृद्धि के मूल में ज्ञान व्यवस्था ही है। लक्ष्य होना चाहिए ऐसी अधोसंरचना विकसित करना जो उपयोगी ज्ञान का विस्तार करे और उसे शिक्षण योग्य बनाए। ऐसा ज्ञान उस समय खासतौर पर बदलावपरक होता है जब यह स्वच्छ ऊर्जा, शहरी परिवहन, कचरा पुनर्चक्रण, जल प्रबंधन और किफायती स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने में मदद करता है।

भारत को सैद्धांतिक और तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ विज्ञान और इंजीनियरिंग शिक्षण में भारी निवेश करना होगा। उसे तकनीकी विश्वविद्यालयों और पॉलीटेक्निक के नेटवर्क का भी विस्तार करना होगा। सरकार ने हाल ही में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों का निजी-सार्वजनिक भागीदारी की मदद से आधुनिकीकरण करने का निश्चय किया। यह कदम इसी दिशा में उठाया गया है।

वर्ष 2022 के आंकड़ों के मुताबिक 36 फीसदी चीनी अंडरग्रैजुएट बच्चों ने इंजीनियरिंग की डिग्री ली। ब्रिटेन और अमेरिका में यह अनुपात केवल 5 फीसदी है। वर्ष 2025 में भारत ने विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित में उतने ही स्नातक तैयार किए जितने कि चीन ने लेकिन उनमें से अधिकांश सॉफ्टवेयर सेवाओं में चले गए। हमारे यहां स्नातकोत्तर और डॉक्टोरल स्तर पर इनकी संख्या काफी कम है जबकि मूल शोध उन्हीं जगहों पर होता है।

निजी क्षेत्र के शोध एवं विकास को प्रोत्साहित करना भी उतना ही आवश्यक है। फिलहाल बड़ी भारतीय कंपनियां अपनी बिक्री का केवल 0.2 से 0.3 फीसदी हिस्सा ही शोध पर व्यय करती हैं जो वैश्विक मानकों से बेहद कम है। कर प्रोत्साहन, लक्षित सरकारी खरीद और पीपीपी से हालात बदल सकते हैं। रक्षा शोध एवं विकास संगठन तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने दिखाया है कि कैसे सरकारी मिशन के साथ आपूर्तिकर्ता और इंजीनियर तैयार किए जा सकते हैं। असल चुनौती है इस मॉडल को असैन्य क्षेत्रों में दोहराना।

मोकिर जिस दूसरी अनिवार्यता की बात करते हैं वह है संपर्क। यानी विज्ञान को व्यवहार से जोड़ना। देश की नवाचार व्यवस्था अभी भी विभाजित है।

अकादमिक शोध का व्यवसायीकरण नहीं हुआ है। औद्योगिक क्लस्टर अक्सर बिना शोध संस्थानों की करीबी के काम करते हैं। एक अधिक एकीकृत मॉडल विश्वविद्यालयों को क्षेत्रीय विनिर्माण केंद्रों के साथ जोड़ सकता है, वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए संयुक्त नियुक्तियों को बढ़ावा दे सकता है, और ऐसी योजनाएं बना सकता है जिनमें शैक्षणिक संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग अनिवार्य हो। चीन के विश्वविद्यालय-संबद्ध विज्ञान पार्कों का नेटवर्क और जर्मनी के फ्राउनहॉफर संस्थान इस दिशा में शिक्षाप्रद उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश अर्थशास्त्री अल्फ्रेड मार्शल ने आर्थिक प्रगति को ‘ज्ञान के भीतर ज्ञान का विकास’ बताया था। उनके उस कथन में मोकिर की अंतर्दृष्टि और भारत की हालत को महसूस किया जा सकता है। हमारे पास प्रतिभा है, उद्यमशील ऊर्जा है और तेज विकास की क्षमता रखने वाला घरेलू बाजार भी है। लेकिन जो कमी है वह एक ऐसी प्रणाली की है जो स्वयं ज्ञान पर आधारित होकर इसे निरंतर विकसित होने दे। इसे कैसे प्राप्त किया जाए?

व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ है बहुत सारा अनाकर्षक लेकिन जरूरी परिश्रम। इसमें संस्थानों का निर्माण, प्रोत्साहन तंत्र और ऐसे फीडबैक तंत्र शामिल हैं जो परिणामों में निरंतर सुधार करें और साथ ही दस्तावेजीकरण, पुनरावृत्ति और प्रसार भी जरूरी हैं। यह सब तब तक असंभव है जब तक एक ऐसी संस्कृति विकसित न हो जो उपयोगी ज्ञान का सम्मान करे और उसका उत्सव मनाए। यह निश्चित रूप से एक कठिन कार्य है।


(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के संपादक और मनीलाइफ फाउंडेशन के ट्रस्टी हैं)

Advertisement
First Published - October 29, 2025 | 9:36 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement