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Editorial: कर विवादों का हो शीघ्र समाधान

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16 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के कर विवाद किसी के काम नहीं आ रहे हैं और न्यायिक व्यवस्था को और भी ज्यादा बोझिल बना रहे हैं

Last Updated- October 28, 2025 | 9:18 PM IST
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देश के सभी उच्च न्यायालयों में कर विवादों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। हाल ही में शोध संगठन ‘दक्ष’ द्वारा किए गए विश्लेषण में पाया गया है कि 12,000 से ज्यादा कर मामले (लगभग 34 फीसदी) एक दशक से भी ज्यादा समय से उच्च न्यायालयों में बिना किसी सुनवाई के लंबित हैं। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 में भी कुछ ऐसी ही तस्वीर पेश की गई है। उसमें बताया गया है कि उच्च न्यायालयों के लगभग आधे मामले पांच साल से ज्यादा समय से लंबित हैं। कर मुकदमों में देरी लगातार जारी भारत की बड़ी संरचनात्मक बाधाओं में से एक को रेखांकित करती है जो राजस्व प्राप्ति, व्यावसायिक धारणा और कानून के शासन के लिए जोखिम पैदा करती है।

ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं। रिपोर्टों के अनुसार, 2025-26 की शुरुआत में लगभग 5,39,000 अपील लंबित थीं, जिनमें 16.6 लाख करोड़ रुपये के विवादित कर दावे थे। अकेले पंचाट स्तर पर 6.85 लाख करोड़ रुपये के विवाद लंबित हैं। ये देरी केवल सांख्यिकीय प्रकृति की नहीं हैं, ब​ल्कि ये कर मुकदमों के अंबार का प्रबंधन करने में भारत की भारी अक्षमता को उजागर करती हैं। कई उच्च न्यायालयों में अक्सर समर्पित यानी अलग से कर पीठों का अभाव होता है।

बार-बार न्यायाधीशों के स्थानांतरण और न्यायिक रिक्तियों के कारण सुनवाई और धीमी हो जाती है। यहां तक ​​कि प्रक्रिया को आधुनिक बनाने के लिए किए गए सुधार, जैसे कि 2020 में शुरू की गई फेसलेस अपील प्रणाली समस्याओं में फंस गई है। इसका असर अर्थव्यवस्था पर होता है।

लंबित मामलों का छोटे व्यवसायों पर अधिक प्रभाव पड़ता है क्योंकि उनके पास समाधान के लिए आवश्यक धन या प्रभाव का अभाव होता है। लंबी जांच और मुकदमेबाजी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था में निवेश करने की इच्छुक विदेशी फर्मों की योजनाओं को भी खराब कर सकती है। इन मामलों को शीघ्रता से निपटाना उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि प्रक्रिया में निष्पक्षता सुनिश्चित करना, विशेषकर तब जब खरबों रुपये मुकदमेबाजी में फंसे हों।

एक विश्वसनीय समाधान के लिए संस्थागत और प्रक्रियात्मक, दोनों तरह के सुधारों की आवश्यकता होगी। सबसे पहले, उच्च न्यायालयों में प्रशिक्षित न्यायिक अधिकारियों और क्षेत्र विशेषज्ञों के सहयोग से विशेष कर एवं वाणिज्यिक पीठों के विस्तार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके लिए क्षमता विस्तार की आवश्यकता होगी। अन्यथा मानव संसाधनों को विशेष कर या वाणिज्यिक पीठों में स्थानांतरित करने से अन्य मामलों में प्रगति प्रभावित होगी।

दूसरा, सरकार को अनावश्यक वृद्धि को रोकने के लिए उच्च न्यायालय स्तर से नीचे की प्रणाली को सरल और सुव्यवस्थित करना चाहिए। इसका अर्थ फिर से पंचाट स्तर पर अधिक क्षमता होगी। तीसरा, दशकों पुराने मामलों को निपटाने के लिए एक समयबद्ध अभियान को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए। अंत में, यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि कर विभाग जिस तरह से करदाताओं के साथ पेश आता है, उससे बहुत सारे मुकदमे सामने आते हैं, अक्सर आक्रामक कर संग्रह लक्ष्यों के कारण। सकारात्मक बात यह है कि आयकर कानून को सुव्यवस्थित किया गया है और इसे अगले वित्त वर्ष से लागू किया जाएगा।

उम्मीद है कि नया कानून ज्यादा स्पष्टता लाएगा और करदाताओं और कर विभाग के बीच मतभेद कम करेगा। फिर भी, बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि कर विभाग संभावित विवादों से कैसे निपटता है। इसका मतलब यह नहीं है कि कर चोरों को छोड़ दिया जाना चाहिए, लेकिन सही करदाता भी अक्सर खुद को मुकदमेबाजी और विवादों में उलझा हुआ पाते हैं। इससे बचना ही होगा।

16 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के कर विवाद किसी के काम नहीं आ रहे हैं और न्यायिक व्यवस्था को और भी ज्यादा बोझिल बना रहे हैं। अगर अनसुलझे कर विवाद बढ़ते रहे तो ये निवेशकों का भरोसा कम कर सकते हैं। लंबित मामलों को सुलझाना और यह सुनिश्चित करना कि भविष्य में ऐसी स्थिति न आए, अब सिर्फ न्यायिक व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है। यह एक ऐसे देश के लिए आर्थिक रूप से जरूरी है जो एक भरोसेमंद, नियम-आधारित निवेश स्थल बनने की आकांक्षा रखता है।

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First Published - October 28, 2025 | 9:13 PM IST

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